चालान पर चर्चा – मंडली
मंडली

चालान पर चर्चा

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बचपन से सुनते आ रहे हैं कि अनुशासन ही देश को महान बनाता है लेकिन अनुशासन से देश अब तक महान नहीं बन सका। अलबत्ता शासन विधान और दंड के प्रावधान से अनुशासन लाने की कोशिश करता रहा है। बहस इस पर भी हो सकती है कि शासन स्वयं कितना अनुशासित रहा है। अनुशासन समाज की स्पिरिट में होता तो दंड का विधान ही नहीं करना पड़ता। आदर्श समाज तो तब बनता जब न कोई जुर्म होता और न जुर्माना, न कहीं हर्ज होता और न कोई हर्जाना लेकिन ऐसा न होना था, न हुआ और न ही होने की गुंजाइश दिखती है। ऐसा आदर्श समाज बनाने की जिम्मेदारी किसकी थी – सरकार की या समाज की या समाज के अराजनीतिक नेतृत्व की? प्रश्न यह भी है कि समाज का कोई अराजनीतिक नेतृत्व है भी?

हर मुद्दे की तरह मोटर वाहन संशोधन विधेयक 2019 पर भी देश ‘शोले’ के जेलर जैसी बात कर रहा है – आधे अंध-समर्थन करो, आधे अंध-विरोध और शेष वस्तुनिष्ठ हो जाओ। हमेशा की तरह यह समर्थन या विरोध मुद्दे का कम है और सरकार का अधिक। समर्थन सिर्फ विधेयक का होता तो कम से कम ‘डेढ़ रुपया के बबुआ के लिए पौने तीन रुपये के झुनझुना’ की तर्ज पर कट रहे चालानों पर तरस तो आ ही जाती। विरोध सरकार का नहीं होता तो यातायात के नियमों की उड़ती धज्जियाँ दिखतीं और सड़क सुरक्षा की लापरवाही में जाती हजारों जानों पर भी रहम आती।

बड़े भैया के दहेजुआ मोटरसाइकिल पर छोटे भाई ही नहीं, पूरा टोला दशकों से ड्राइविंग सीखता रहा है पर लाइसेंस तो बड़े भैया भी नहीं बनवाते। सब सवारी भी करते हैं। चेकिंग होने पर सड़क से उतर कर पतली डगर सरासर सरासर भागते हैं। खेत वाला रास्ता अभी भी है और यह विकल्प भी कि 5000/ का जुर्माना भरने या सिपाही जी की जेब गर्म करने की जगह कुछ ले देकर लाइसेंस ही बनवा लें। बिना लिए दिए लाइसेंस बनने की व्यवस्था सरकार अब तक नहीं करवा सकी, करवा दे तो सोने पर सुहागा। जुर्माने की रकम उँची होने का रोना न रोएं। विकसित देशों में यह और भी अधिक है। विकसित देशों जैसा फील करें और आशा करें कि देर-सवेर हमारी नागरिक सुविधाएं भी वैसी ही हो जाएंगी।

सुरक्षा के लिए हेल्मेट पहनना और सीट बेल्ट बाँधना आवश्यक है। इतना कुछ पहनकर घूमते हैं, हेल्मेट लगा लेने पर कयामत नहीं आ जाएगी। बेल्ट पहन सकते हैं, बेल्टे-बेल्ट कर सकते हैं, बिलो द बेल्ट हिटिंग से भी परहेज नहीं पर सीट बेल्ट नहीं बाँध सकते। वाह जी वाह! हेल्मेट पहनकर और सीट बेल्ट बाँधकर भी इच्छा होने पर किसी को अपना भुभुन या ठेहुन फोड़ लेने की स्वतंत्रता है पर किसी और को उसके कारण खरोंच भी आना स्वीकार्य नहीं हो सकता। ‘पापा जल्दी आना’ और ‘कोई आपका इंतजार कर रहा है’ जैसे बोर्ड सरकार ने लगवाए थे। फिर भी सड़क पर बिना बात हवा से बात करने वाले जाँबाज हैं ही। बोर्ड को पढ़ा सबने, समझा बस कुछ ने। ये बचे हुए सुधरें या दें खाली पीली 5000/।

बिना पिए भी हवाई किला बनाने से किसी को रोका नहीं जा सकता। दारु पीकर सूखे में नाव चलाना तक ठीक है, गाड़ी चलाना नहीं। 10000/ के टल्ली ड्राइविंग चालान को अधिक मत कहिए। बिहार के मुख्यमंत्री इसे कम मानते हैं। इसमें वह पूरे देश में शराबबंदी की आहट सुनते है। उन्हें हर समस्या का समाधान शराबबंदी में ही दिखता है। उनके ‘सच्चे’ सहायक उपमुख्यमंत्री तो यहाँ तक कह रहे हैं कि बिहार में शराबबंदी के बाद दूध का उत्पादन 19 प्रतिशत बढ़ा है। उन्हें इस सूचना के लिए धन्यवाद कि बेवड़े दारु नहीं मिलने पर या 500 की दारू 1500 में खरीद कर पीने पर इतने दुधारु हो जाते हैं।

देश पर जनसंख्या का ओवरलोड कम नहीं हो रहा पर वाहनों पर ओवरलोडिंग तो कम हो। तो क्या हुआ जो इससे वाहनों पर व्यापार करने वाले छोटे लोगों को वैकल्पिक रोजगार देखना पड़ेगा। सरकार बीमा पर इतनी गंभीर है कि रेल यात्रियों तक का बीमा करा रही है। आप वाहन का करा लीजिए। बीमा कंपनियों की दूकान भी तो चलती रहनी चाहिए ना। इतना प्रदूषण फैलाते हैं तो जाँच भी करवा लीजिए। लाइसेंस है, हेल्मेट है, आरसी है, प्रदूषण प्रमाण पत्र है पर लाना भूल गये? निकलते हुए मोबाइल लेना तो नहीं भूलते। विस्मृति दूर करने के लिए ब्राह्मीविटा का सेवन करिए या जुर्माना भरिए।

सबसे अधिक मुखर विरोध या समर्थन मीडिया और सोशल मीडिया पर है। विरोध या समर्थन में आपा खोते कुछ लोग ऐसे हैं जिन पर इन माध्यमों के लिए आवश्यक आचार संहिता लागू कर दी जाए तो दिन भर में कई बार इनका चालान कटेगा। कुछ पर तो जुर्माना इतना भारी होगा कि ये स्कूटी छोड़ भाग खड़े होंगे। वहीं यदि जुर्माने पर बनते जोक रोके नहीं गए तो ‘जुर्माना पर जोक’ जैसा महाग्रंथ आकार ले सकता है।

मंदी के आलोक में बढ़े हुए जुर्माने देश की अर्थव्यवस्था के लिए रामवाण सिद्ध होंगे। घूम फिरकर सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से लिए एक लाख पचहत्तर हजार करोड़ पर मत जाइए। सरकार का अमला फमला और देश में फुटानी का स्तर देखते हुए यह रकम ऊँट के मुँह में जीरा जैसी है। हो सके तो इस पर एक बहस हो कि पुराना कानून लचर था और दंड के प्रावधान कमजोर थे या कानून को मानने और कानून को लागू करने की इच्छाशक्ति में कमी थी। यह बहस नहीं भी हुई तो भी भय से थोड़ी प्रीत का जन्म तो होगा ही। यदि यह भय दिखाने के नाम पर कुछ लोगों की पाँचों उंगलियाँ घी में डूबती हैं तो उसे नजरअंदाज करिए।

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