क्रिसमस पर दो शब्द – मंडली
मंडली

क्रिसमस पर दो शब्द

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भारत में क्रिसमस पर्व का योगदान देश के धार्मिक सौहार्द को दृढ़ रखने व बढ़ाने का है। निश्चित ही यह पढ़कर थोड़ा अटपटा लगा होगा। अब निबंध ना तो लिखा जा रहा है और ना पढ़ने की उम्मीद से आप सब यहाँ तक आये होंगे। आज के जन-जीवन में क्रिसमस के प्रभाव की बात करते हैं।  वह जीवन जो करोना काल के रहते भी अब तक बचा हुआ है।

10-15 वर्ष पूर्व तक साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखते हुए सभी धर्म के लाखों लोग इस पर्व को ख़ुशी से मनाते दिखते थे। वैसे तो साम्प्रदायिक सद्भाव भारी शब्द लगता है पर क्या फ़र्क पड़ता है कि यह भाव दिमाग में रखकर तो भारत की अधिकांश मध्यम वर्गीय जनता इसे नहीं मनाती है। कुछ वर्ष और पीछे चलें तो यह त्योहार मनाने वाले लोग और कम होंगे। आने वाले दशकों में शायद बचे-खुचे लोग भी इने मनाने लगें। यह बात अलग है कि मूल रूप से इसे हमलोग बड़ा दिन कहा करते थे। अब हम क्रिसमस ही कहकर खुश हैं।

कई लोगों का कहना है कि भारतीयों का पाश्चात्य सभ्यता के प्रति नतमस्तक होना भी देश में क्रिसमस पर्व की प्रसिद्धि को बढ़ाता है। आज से कुछ वर्ष पूर्व जब मैं स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। एक मित्र ने मुझे इस पर्व के उपलक्ष्य में चर्च जाने के लिए पूछा। मैंने असहज होते हुए कहा कि आज तक मैं कभी चर्च नहीं गयी। इस बात पर उसके चेहरे पर आए भावों से लग रहा था कि जैसे मैंने मध्यमवर्गीय होते हुए कोई मध्यमवर्गीय बात कर दी हो। हम में से कई लोग तो आज भी इस शंका में चर्च नहीं जाते कि पादरी पानी पिलाकर धर्म परिवर्तित ना कर दे।

भारतीय सिनेमा ने क्रिसमस को मध्यवर्ग के पर्व के रूप में ही चित्रित नहीं किया बल्कि  इस विषय में भी अपना अभिन्न योगदान दिया है जिसके तहत आज अन्य धर्म की कुंवारी महिलाओं का ही नहीं पुरुषों का भी एक सपना चर्च में विवाह करने का है। टीन ऐज की बालिकाओं में भी क्रिसमस का ‘क्रेज’ ज़बरदस्त है, ख़याली संता के आने का सपना भी लाल टोपी, लाल टॉप और लाल स्कर्ट पहन कर देखा जाता है। संता आएं या नहीं भी आएं पर फोटोज़ अच्छे आ जाते हैं।

लोकतांत्रिक देश में ट्विटर पर मचे हुए कट्टर आर डब्ल्यू और एकदम लचीले एल डब्ल्यू ने एक सप्ताह पहले से ही अपने-अपने तरफ से मोर्चा संभाल लिया है। हम सेंटर राइट में हैं इसलिए एल डब्ल्यू को विपक्ष का पद देते हैं। विपक्ष की महिलाओं ने अभी से लाल लिपस्टिक लगा के क्रिसमस के संदर्भ में पक्ष के कट्टर संघी पुरुषों पर चोट करने का सिलसिला शुरू कर दिया है और संघी पुरुष भी इसका मुँहतोड़ जवाब ‘हमको लगी ही नहीं’ कहकर दे रहे हैं। ट्विटर के कुछ मध्यमवर्गीय हत्थों का कहना है कि हमको किसी भी पक्ष-विपक्ष से लेना देना नहीं है हम तो क्रिसमस का पेड़ लाएंगे, सजायेंगे और पर्व मनाएंगे। बस फ़ोटो अपलोड नहीं करेंगे। कुछ मनाएँगे पर न मनाने का स्वाँग करके महान बनेंगे पर यकीन मानिए कि आज भी भारतीय मानस का एक बड़ा हिस्सा इससे अनभिज्ञ ही है लेकिन वह हिस्सा डिबेट के राडार पर होता ही कब है।

पर्व तो सभी अच्छे ही होते हैं। अब किसी के चाहने ना चाहने से उसे मनाना या ख़ारिज़ करना हमारे बस में तो नहीं है। लेकिन इस पर भी सतर्क रहते हुए कम कट्टर आर डब्ल्यू के लोग अपने तरीके से पर्व की बधाई दूसरी ओर तक पहुंचाने में प्रयासरत रहेंगे। मीडिया इस पर किस प्रकार आग में घी डालेगी। मुझे लगता है विपक्ष के चैनल के एंकर ‘उप्र के गौप्रेमी मुख्यमंत्री किस प्रकार क्रिसमस मनाएंगे’ हैडलाइन सुर्खियां बटोर सकते हैं। उसी प्रकार पक्ष के चैनल के एंकर ‘क्या इस पर्व का भी नाम बदल देंगे महाराज’ हैडलाइन से इस मुकाबले को जीत सकते हैं।

ट्विटर पर आधे लोग पेटा से सवाल करेंगे और आधे किसी की ह्यपोक्रिसी साक्ष्य सहित ट्वीट करेंगे। पर्यावरण पर चिन्तन परवान चढ़ेगा औक कईयों को एक्सपोज किया जाएगा। कन्याएं कोई ना कोई ट्रेंड का जुगाड़ कर फोटोज़ अपलोड कर लेंगी। उत्सुकता इस बात की है कि क्या चीम्स विधायक पर्व मनाकर अपने आपको विपक्ष का चहेता बनाएँगे या टीके के साथ पक्ष का मार्गदर्शन करेंगे। लोगों में यह जानने की उत्सुकता भी होगी कि कँगना रानोत के इस मामले में क्या विचार होंगे जो अवश्य ही विस्फोटक होंगे।

आम शहरी जनजीवन खूब प्रभावित होगा। दुकानों पर भव्य सजावट के साथ-साथ मॉल और आम बाज़ार भी सजे-धजे नज़र आएंगे। बाजार से धड़ाधड़ क्रिसमस-ट्री सजाने के समान बिकेंगे। जगह-जगह संता क्लॉस बने हुए लोग बच्चों के मन को बहलायेंगे। आम लोग कितने ख़ुश व कितने दुःखी रहेंगे यह हम अपने-अपने घर पर बैठे ठंड के मौसम में नहीं भांप पाएंगे। इसके लिए घर से और सोच से सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा। सभी पर्वों को हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाना चाहिए। सभी धर्मों व संस्कृति के प्रति आदर रखना चाहिए। अच्छी बात है।

आशा है क्रिसमस के मौके पर हम सब एक दूसरे को हार्दिक बधाई देते हुए नज़र आएंगे। ठीक भी है। जिस काम में ख़ुशी मिले करते रहिए। मेरी ओर से भी पूरे मन से क्रिसमस की बधाईयां स्वीकार करें। अब बधाइयों की लड़ी यहीं समाप्त करनी पड़ेगी वरना मुझी से सवाल होने लगेंगे कि इससे कुछ माह पूर्व दीपावली पर आप कहाँ थी और आपका लेख कहाँ था। उत्तर में कह सकती हूँ कि ह्यपोक्रिट नहीं हूँ, हिन्दू आतंकवादी बन त्योहार मना रही थी।

धन्यवाद।

लेखिका कहानियाँ और मुक्त छन्द कविताएँ लिखती हैं। कथा चरित्रों की सजीव कल्पना से उनकी कहानियाँ जीवन्त और मार्मिक बनती है। कहानियों और कविताओं के अतिरिक्त वह जीवन शैली, फैशन और मनोरंजन आदि विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। फेमिनिस्ट मुद्दों पर उनके आलेख बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। लेखिका ने लोपक.इन के लिए कई कहानियां और अन्य आलेख लिखे हैं। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं।

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