मंडली

वो जा चुकी थी …

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बहुत रात बीत गई थी। सुधा की आँखों में नींद नहीं थी। जाग तो रमेश भी रहा था पर आँखें मूँदे चुपचाप बिस्तर पर पड़ा था।

सुधा उसके बाजू पर सिर टिकाए छाती पर उँगली फिराते हुए धीमे से बोली, “ए जी! सही में चलना है का? मने एतना दूर? पैदल? कैसे होगा?”

रमेश आँख मूँदे ही बोला, “अकेले थोड़े ना जाएंगे पगलेट! बहुत लोग जा रहे हैं। अवध काका भी बाले बच्चों समेत निकलेंगे। तनी दिक्कत होगा पर एक साथ पहुँच जाएँगे।”

सुधा गहरी साँस लेकर सोने की कोशिश करती है। नींद की जगह यादें उमड़ कर आती हैं। कैसे बिना माँ बाप की बच्ची को ब्याहने आया था रमेश। भाई भाभी ने अपनी हैसियत से ब्याह किया था। लड़का दिल्ली में काम करता है। यही बहुत बड़ी बात थी।

छ: वर्ष के वैवाहिक जीवन में होली, दीवाली, ब्याह-शादी में ही रमेश का घर आना होता।

परिवार में बहुत गरीबी तो नहीं थी पर पैसा भी उतना नहीं था। दो बहनों को ब्याहना और एक भाई को पढ़ाना सब रमेश की ही ज़िम्मेदारी थी। बारहवीं पास कर वह गाँव के केदार चाचा के साथ दिल्ली आ गया था। यहाँ उसे प्रिटिंग प्रेस में खाने कमाने लायक काम मिल गया।

पहले बरस से ही जब जब रमेश गाँव आता सास की उम्मीद बढ़ जाती कि वह अब आजी बन जाएँगी। ईश्वर ने हर बार अनसुनी कर दी। बहनों के विवाह के बाद छोटके का भी ब्याह हो गया। छोटका बी ए पास कर ब्लॉक पर ही कृषक मित्र का सहायक लग गया। नवकी बहुरिया कुछ ही महीनों में पेट से हो गई।

अब सुधा के लिए घर के साथ गाँव जवार की बात सुनना मुश्किल हो गया। इस दीवाली रमेश के आते ही वह फूट पड़ी। बरसों से सुने तानों का ज़हर रमेश के आगे उगल दिया। रमेश ने उसे बाँहों में भर माथे पर एक चुम्बन से शांत किया।

अगले दिन तय हो गया कि अबकी सुधा भी रमेश के साथ दिल्ली जाएगी। पहली बार ट्रेन देख वह छोटे बच्चे सी उछल पड़ी। पूरे रास्ते नई दुनिया के सपने देखती रही। बस डेढ़ साल पहले ही तो वो दिल्ली आई थी।

यहाँ आकर उसे टीवी वाली दिल्ली और असल वाली दिल्ली का अंतर समझ आया लेकिन गाँव के कड़वे तानों से कहीं ठीक ये जीवन लगा। धीरे-धीरे वो इस माहौल में जीना सीख गई। घर बैठे मोती वाला काम करने लगी तो दो पैसा और आने लगा। रमेश सुबह का निकला रात तक ही आ पाता, ओवरटाइम के चक्कर में।

पड़ोसन के कहने पर सुधा एक साल से दवा दारू के साथ देवता पित्तर भी करवाने लगी। हर हाल में उसे माँ बनकर ही गाँव लौटना था। राम जाने दवा का असर हुआ या दुआ का पर नया साल उसके लिए खुशियाँ लेकर आया था। इसी दिसंबर के तीसरे सप्ताह में उसे पता चला कि वो गर्भवती है। रमेश ने उसका और भी ध्यान रखना शुरू कर दिया।

मार्च के महीने ने भारत में अपना डरावना मजमा लगाया। महामारी ने कई सपने लूट लिए। सब कुछ सहेजते समेटते एक महीना बीत गया पर आगे का समय बहुत कठिन रहा। मकान का किराया, जरूरत का सामान, दवाई … कुछ दिन तो गुजर बसर हो गई। महीने भर बाद कभी राशन की लाइन में तो कभी खाने के पैकेट के लिए मुँह छुपा के जाना पड़ता।

दोनों ने जीवन में कभी हाथ नहीं फैलाया था, एक दूसरे से आँखे चुराते, लजाते जी रहे थे। पर कब तक?

और आज अचानक मोहल्ले के सभी बाहर से आए लोगों ने पैदल यात्रा का निर्णय ले ही लिया। रमेश के पास कोई चारा नहीं रहा। मन मजबूत कर सुधा को मना लिया था। भोर के तीन बजे सब रवाना हुए। बारह लोगों का समूह, एक या दो कमरों की गृहस्थी को दो हाथों में थामे, एक दूसरे को हौंसला देते आगे बढ़ते रहे।

चलते चलते दोपहर हो गई। सुधा देख रही थी कि सड़क पर उन जैसे सैकड़ों लोग चले जा रहे हैं। लंबे सफर पर, कोई साइकिल तो कोई मोटर साइकिल, कोई पैदल, कोई अकेला तो कोई सपरिवार। नन्हे बच्चे माँ-बाप का हाथ थामे चले जा रहे थे। बचपन सड़क पर झुलस रहा था। जवानी ज़िम्मेदारी का बोझ लिए पलायन कर रही थी,  मातृत्व गहरी सिसकियाँ ले रही थी। पेट की आग और महामारी का डर उनके लिए उर्जा का काम कर रहे थे।

महामारी ने मानवता के चेहरे से मुखौटा हटा एक नया रूप दुनिया को दिखा दिया था। सुधा को घबराहट होने लगी। वह एक पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गई। उसका शरीर अब दोहरा था, भूख से बिलख उठी। कुछ भुने चने खाकर पानी पिया तो जान में जान आई।

आगे बढ़ने पर किसी गैर-सरकारी सस्था वालों की तरफ से खाना मुहैया कराया गया। लाइन में लगते ही कैमरे चमकने लगे। इस प्रकार से फोटो लेते देख सुधा ने साड़ी के पल्लू से मुँह ढक लिया पर रमेश की ओर देख उसका दिल बैठ गया। अपने पति को इतना लाचार उसने कभी नहीं देखा था।

सुधा ने तय कर लिया कि अब रास्ते भर वो रमेश कोई परेशानी वाली बात नहीं कहेगी। पीड़ा चाहे शारीरिक हो या मानसिक, स्वयं पर आए तो व्यक्ति सहज ही झेल लेता है पर अपने स्वजनों को किसी बुरी स्थिति में देखने की कल्पना मात्र से मन अधीर हो उठता है।

अपनी हर पीड़ा को हृदय के रसातल में दबाए सुधा आज सीता मैया सी अपने पति के संग मुस्कुराते हुए चलती रही। रास्ते बदलने भी पड़ते। कभी सरपट भागते सूने हाईवे पर चलना होता तो कभी उबर-खाबर और वीरान रेल पटरियों पर। कोई मालगाड़ी गुजरती तो मुँह कलेजे को आ जाता, पुलिस वाले दिखते तो यात्रा अधूरी रह जाने का डर होता। रास्ते में कभी ट्रक, ट्रॉली जैसे वाहन मिल जाते तो रास्ता छोटा लगने लगता। हर ठौर पर रमेश उसका पीला मुँह देख सांत्वना देता, “बस कुछ दूर और!”

शाम होने लगी थी। सुधा आज अच्छा महसूस नहीं कर रही थी। अचानक वह बीच सड़क पर चक्कर खाकर गिर पड़ी। सबने उसे पेड़ के नीचे लिटा दिया। रमेश को लगा थकान होगी। उसके सिर पर हाथ फेर कर बोला, “आज यही रुक जाते हैं, सुबह ही अब रवाना होंगे!” सुधा ने पीले पड़े चेहरे पर मुस्कुराहट थोपी।

“ए जी! बबुआ या बुचिया जो भी होगा ना,  उसको हम ये कहानी सुनाएँगे। तुमको लेकर इतने दूर का यात्रा किए थे।”

“हाँ! सब ठीक हो जाएगा तो हम फिर आयेंगे, उसे शहर के स्कूल में ही पढ़ाएँगे।”

“नहीं जी! ऐसा समय अपने बच्चों के जीवन में कभी नहीं आए।” कहते हुए पहली बार सुधा रमेश को पकड़ ज़ोर से रो पड़ी। उसके भीतर का सारा दर्द आज पारे सा पिघल कर बह निकला। रमेश बेबस सा उसे चुप कराता रहा। वो रात रोते रोते जाने कब सो गई।

आधी रात को अचानक सुधा की हल्की चीख सुन रमेश जाग गया। वो दर्द से तड़प रही थी। साथ के कई लोग पास इकट्ठा हो गए, मोबाइल और टॉर्च की रोशनी की गई। सुधा के कपड़े ख़ून से सन चुके थे। असह्या वेदना से उसके होंठ सूख गए।

रमेश अपने एक साथी के साथ डॉक्टर खोजने निकल पड़ा। अवध बो काकी, दो औरतों के साथ सुधा को संबल दे रही थीं लेकिन अनहोनी अपना खेल दिखा चुकी थी। सुधा दर्द के बीच भी रह रह कर अपने गुज़रे हुए अच्छे दिनों को याद कर लेती। उसकी आँखें रमेश को खोज रही थीं लेकिन वो नहीं दिखा। उसे अपनी साँसें उखड़ी सी लगने लगीं। वह काकी के हाथ को कस कर पकड़े थी, नज़र सड़क के उसी ओर थी जिधर से उसका पति उसके लिए ‘जीवन’ लाने गया था।

एक टक निहारती उसकी आंखों में दर्द, इंतज़ार, उम्मीद, प्यार सब कुछ था। उसने देखा रमेश को लौट कर आते हुए, उसी तरह जैसे उसे ब्याहने आया था, सजा धजा और थोड़ा लजाते हुए।

वो धीमे से मुस्कुरा दी।

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रमेश बगल के गाँव से डॉक्टर लेकर लौटा, पर सुधा की प्रतीक्षा इतने लंबे समय को नहीं झेल पाई। वो जा चुकी थी अनन्त यात्रा पर … अनथक …

लेखिका कहानियाँ, संस्मरण और कविताएँ लिखती हैं। इनकी कहानियाँ कभी मर्म उकेरती हैं, कभी इनसे मृदुल भावनाएँ टपकती है और कभी पलकें भिंगोने वाली करुणा। उनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखिका पेशे से शिक्षिका होते हुए भी एक कुशल गृहिणी हैं।

4 thoughts on “वो जा चुकी थी …

  1. एक पल को तो रोंगटे खड़े हो गए। इस पीढ़ी ने जो कुछ कष्ट देखा है ईश्वर वो कष्ट भरे दिन किसी को न दिखाए

  2. हम तो ये पढ़ कर भी नहीं झेल पा रहे। उन लोगों ने कैसे झेला होगा सब। भगवान इतने दुखद दिन फिर कभी किसी को ना दिखाए। आपकी लेखनी दिल छू गई गरिमा जी 🙏

  3. उफ्फ!! हृदय विदीर्ण होगया ये कहानी पढ़कर! सच में बहुत कुछ सहना पड़ा है घर लौटने के लिए लोगों को!! ओ 2 हज़ार बीस…गेट लॉस्ट प्लीज़!!

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