मंडली

एक तीर्थ जिसे हम भूल गये!

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भीड़-भाड़ वाले रास्ते से ऑटोरिक्शा आगे बढ़ रहा था। रिक्शा में बैठे मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी कि आज दीपावली की छुट्टियों का रविवार है और जिन पवित्र स्मृतियों को देखने के लिए यहाँ तक आया हूँ, वह देख पाऊँगा या नहीं। लेकिन खचा-खच भरे बाजारों से होते हुए जब हम गंतव्य पर पहुँच ही गये। एक जीर्ण-शीर्ण से दरवाजे और उसके बाहर मुँगफली का ठेला लगाए खड़े एक वृद्ध ने झुर्रियों भरी मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया। दरवाजे के अंदर खुले मैदान में शांति पसरी हुई थी। दोनों ओर नये पुराने मकान जमे हुए थे। मैदान के दूसरे कोने में स्थित था एक एकाकी और मौन मन्दिर। यह कोई प्राचीन मन्दिर नहीं था। इसे नब्बे वर्ष पूर्व रत्नागिरी, महाराष्ट्र के श्रीमान भागोजी कीर ने एक लाख रुपए के अनुदान से निर्मित कराया था।

ना तो यह पौराणिक देवालय था ना ही इसमें कोई कला स्थापत्य का दर्शन था। फिर इस लक्ष्मी नारायण मन्दिर में ऐसा क्या था जिसने मुझे सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला भेद कर यहां तक आने के लिए विवश किया? इसका उत्तर दरवाजे की एक ओर लगे आदम-कद प्रतिमा-समूह में था। इस प्रतिमा-समूह में एक पतला सा व्यक्ति जन-समूह को बेड़ियों से मुक्त कराने की कोशिश करता दिखाया गया है। यह प्रतिमा और सामने खड़ा अनूठा मन्दिर आज से शताब्दी पूर्व सह्याद्रि में हुए एक अभूतपूर्व जनजागृति अभियान की मूक-गवाही देते स्मारक हैं।

जब मैं मन्दिर के करीब पहुँचा तो पास के मकान से एक महाशय मन्दिर की चाबी के साथ प्रकट हुए। उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से मेरा परिचय और यहाँ आने का प्रयोजन पूछा। बाहर से छोटा लग रहा मन्दिर अंदर से काफी बड़ा था। यहाँ ऊपरी भाग में संत तुकाराम, नारदजी, तुम्बुरू की मूर्तियाँ उकेरी गई थीं। मन्दिर की दीवारों पर कुछ चित्र लगे हुए थे। गर्भगृह में लक्ष्मी नारायण की संगमरमर की प्रतिमा शोभायमान थी जिसकी आभा देखते ही बनती थी। हम लोग सीधे गर्भगृह की ओर आगे बढ़े और बेझिझक गर्भगृह में स्थापित लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा का चरण स्पर्श किया। लक्ष्मी नारायण देव के पीछे भगवा ध्वज धारण किए भारत माता की आकृति बनाई गई है।

मन्दिर का शांत परिसर अचानक एक छोटे-से बच्चे की किलकारियों से गूँज उठा। एक महिला ने अपने बालक के साथ मन्दिर में प्रवेश किया। बालक कौतूहल से भरे मासूम से प्रश्नों से अपनी माता को परेशान कर रहा था और यह देख कर मुझे मन ही मन बड़ा आनन्द आ रहा था। दीवार पर लगा एक महाराष्ट्रीय काली-टोपी पहने सज्जन का चित्र देख कर बालक ने मराठी में प्रश्न दागा: “आई, हे आजोबा कुण आहेत?” मुझे मज़ा लेते हुए देख कर महिला ने बच्चे के प्रश्नों की नोंक मेरी ओर घुमाई, “इनसे पूछो, यह तुम्हारे सभी प्रश्नों के उत्तर देंगे।” मैं थोड़ा सकपकाया लेकिन अब प्रश्नों की गोलाबारी से बचना मुश्किल था। मैंने कहा, “बेटा, यह चित्र स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी का है। और सामने लगा दूसरा चित्र श्रीमान भागोजीसेठ कीर का है।” बालक ने तुरंत अगला प्रश्न दागा, “यह दोनों कौन थे?”

आज दलितोद्धार के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर और महात्मा गाँधी जैसे नामों को श्रेय दिया जाता है लेकिन समय-रेखा पर थोड़ा पीछे जाएं तो समाज की अन्तिम पंक्ति को समांतर धारा में लाने के प्रयास इनसे भी पहले स्वामी दयानंद सरस्वती, वडोदरा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़, कोल्हापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज और अन्य महापुरुषों ने शुरू कर दिए थे। श्रीमंत सयाजीराव ने अंत्यज पाठशाला और शिष्यवृत्ति जैसे अभियान चलाए। इन्हीं प्रयासों में से एक प्रयास था यह लक्ष्मी नारायण देव का पतित पावन मन्दिर।

अंडमान के कालापानी की जेल से वीर सावरकर को रत्नागिरी भेजा गया। यहाँ उनके किसी भी प्रकार के राजनैतिक कार्य को निषेध किया गया था। यहाँ रहते हुए उन्होंने सामाजिक जागृति के कार्यों का बीड़ा उठाया। अंडमान जेल से सन 1920 में लिखे एक पत्र में सावरकर कहते हैं, “मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे क्रांति यज्ञ के साथ साथ मुझे वर्ण व्यवस्था के बंधनों को तोड़ने के लिए भी मुहिम शुरू करनी होगी।”

सावरकर जी ने वर्ण व्यवस्था की असमांतर रेखाओं को समांतर करने के प्रयास में रेखाओं को मरोड़ने या मिटाने का प्रयास नहीं किया बल्कि जन-मानस में सभी वर्गों को समान आदर प्राप्त हो इसलिए सहभोजन, सह-साक्षरता और पतित पावन मन्दिर जैसे सार्थक प्रयास किए। समाज में व्याप्त असमानता को दूर करने के लिए उन्होंने सामाजिक जागृति का रास्ता चुना, ना कि सामाजिक क्रांति का।

1929 में उन्होंने सामूहिक यज्ञोपवीत समारोह और वेद-पाठ, सह-भोजन और मंदिर प्रवेश का आयोजन किया। सामाजिक कुरीतियों के शिकार बालकों के माता-पिता को मौद्रिक प्रोत्साहन दिया और इनके बच्चों को स्लेट और चॉक जैसे प्राथमिक शिक्षा साधन उपलब्ध कराए। सावरकर ने कहा, “एक बार सभी वर्गों के बच्चों को एक साथ विद्यालयों में शिक्षित करना शुरू कर दें तो ये बच्चे जीवन में कभी किसी से भेदभाव नहीं करेंगे।” यह सही सोच थी और इसी सोच को साकार करने के लिए श्रीमान भागोजी कीर ने पतित पावन मन्दिर का निर्माण कराया। यहाँ समाज के सभी जातियों और वर्गों के लोग प्रवेश और पूजा कर सकते थे। 1930 में यह एक बड़ा और इस तरह का प्रथम प्रयोग था। गणेशोत्सव के त्योहार पर यहाँ अंतिम पंक्ति के कथाकार मंच से कीर्तन करते और श्रोताओं में बैठे ब्राह्मण इन कीर्तनकारों का पुष्प माला से अभिवादन करते। आज शायद हममें से अधिकांश लोग इस प्रसंग का महत्व नहीं समझ पाएंगे।

मन्दिर के बगल में ही एक छोटा सा ‘सावरकर स्मारक संग्रहालय’ बनाया गया है। यहाँ प्रथम तल पर ‘बलिदानों की गाथा’ प्रदर्शनी में 1857 से 1947 तक के उन क्रांतिकारियों के चित्र और परिचय दिए गए है जिनके बारे में हमारे पाठ्यक्रमों में कभी जिक्र तक नहीं किया गया। यहां बाबा साहेब आंबेडकर, पण्डित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरोजिनी नायडू जैसे महानुभावों के हाथों की छाप संभाल कर रखी गई है।

इसके अलावा इस प्रदर्शनी में स्टीमर मारिया का भी छोटा-सा प्रतिरूप है। अंग्रेजों के राक्षसी जबड़े से निकल भागने के प्रयास में मार्सिले बंदरगाह से अभूतपूर्व साहस का प्रदर्शन करते हुए इसी स्टीमर मारिया से सावरकर ने अगाध समुद्र में छलांग लगाई थी। इसी खंड में सावरकर जी के ऐनक, लाठी, कपड़े और पुस्तकों की स्मृतियां भी प्रदर्शित हैं। इन्हीं के साथ एक कोने में वीर सावरकर के क्रांतिकारी जीवन में उपयोग में लिए गए व्यायाम के साधन, पिस्टल और पिस्टल की छुप कर हेर-फेर के लिए अंदर से पिस्टल के आकार में कुतरे गए पन्नों वाली पुस्तक भी प्रदर्शित की गई है। सोलापुर मार्शल लॉ, दिल्ली बम धमाके, क्रांतिवीर बिरसा भगवान मुंडा, फड़के बंधुओं का बलिदान और अन्य कथाओं को पढ़ने के बाद अंग्रेजी सत्ता से जूझने वाले इन महापुरुषों के त्याग और बलिदान पर शत शत नमन करने का मन करता है।

जब मैंने वहाँ से प्रस्थान किया तब मन्दिर के प्रांगण में नजदीकी पाठशाला के कुछ छात्र सहभोजन कर रहे थे। मैंने पतित पावन मन्दिर को अन्तिम बार प्रणाम किया और सहभोजन कर रहे छात्रों की ओर हाथ हिलाकर अलविदा कहते हुए मुख्य दरवाजे से बाहर क़दम रखा।

#VeerSavarkar                                                                                                              #सावरकर_जयन्ती                                                                                                                      #सावरकरजयन्ती                                                                                                              #वीरसावरकर                                                                                                                          #वीर_सावरकर

 

 

लेखक पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संदर्भों के पार्श्व में सामयिक और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढने की कोशिश करती कहानियाँ लिखते हैं। उनके कुछ वृत्तांत उनकी अनवरत चलने वाली यात्राओं के भाग हैं। इसके अलावा उनकी रुचि लघुकथा, भारतीय मंदिर स्थापत्य और ललित कला से संबद्ध लेखन में भी है। उनकी शब्दावली में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त गुजराती और मराठी का पुट भी होता है। लेखक पेशे से एक फ्रीलांस आइटी कंसलटेंट और डेटाबेस आर्किटेक्ट हैं।

5 thoughts on “एक तीर्थ जिसे हम भूल गये!

  1. Excellent. Mayawatiji, Uidt Raj like leaders never accept and spread this true story to their Core voters.

  2. उत्कृष्ट रचना!! एक बार दलितों का झंडा उठाकर घूमने वाले तथाकथित नेताओं को पढ़वाना चाहिए ये!

  3. सावरकर जी जानते थे कि इस देश को आगे बढ़ने के लिए किन उपायों की आवश्कता है किंतु दुख की बात ये कि स्वतंत्र्योत्तर राजनीति ने उनके विचारों को हाशिए पर डाल दिया।

  4. इतनी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए लेखक का सहर्ष धन्यवाद ।
    वीर सावरकर की सही गाथा विद्यालय में पढी नही इसलिए उनके इस महानता का ज्ञान ही नही था, अटलजी की कविता सावरकर माने… और आपकी इस लेख के जरिए उनके बारे पढने-जानने की उत्सुकता जरूर जगी है

  5. देश के प्रगति में जाति प्रथा और अशिक्षा मुख्य बाधक रही है। इस बात को वीर सावरकर शताब्दी पूर्व समझते थे। दुर्भाग्य से उनके व्यक्तित्व को पूर्ववर्ती सरकारों ने मलिन ही किया है। आज जन सामान्य में इनके विचारों को पहुँचाने की जरुरत है ताकि छद्म दलित हितैषियों का पर्दाफ़ाश हो सके।

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