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जनता कर्फ्यू – न भूतो न भविष्यति

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22 मार्च 2020। संकट से निबटने के एक अनूठे तरीके का अभूतपूर्व दिन। दौड़ती सड़कें रुक गयीं, बाजार बंद रहे। स्कूल-कॉलेज और संस्थानों पर ताला लगा रहा और अधिकांश जगहों पर परिवहन सेवाएँ ठप्प रहीं। गाँव, मुहल्ले, बस्तियाँ और घर ऐसे दिखे जैसे सारे निवासी परदेस चले गये हों। वातावरण में ऐसा सूनापन दिखा कि पशु-पक्षी गण और पेड़ पौधे तक विस्मय में होंगे कि आखिर हो क्या रहा है। जी नहीं, यह किसी राजनीतिक दल द्वारा आहूत भारत बंद का दृश्य नहीं है और न ही यह उद्वेलित जनता का स्वत: स्फूर्त बंद है। यह वैश्विक महामारी से निकलने की एक नवीन संकल्पना का मूर्त रूप है: ‘जनता कर्फ्यू’, जनता का जनता द्वारा स्वयं जनता पर लगाया गया कर्फ्यू। पूरा दिन घरों में अपने परिजनों के साथ आस का दामन थामे और मन में संकल्प व संयम लिए लोग आशंकाओं के भँवर से निकलने की जद्दोजहद करते रहे। वहीं दूसरी तरफ हमारे चिकित्साकर्मी, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस व अर्द्ध सैनिक बल, सफाईकर्मी, आवश्यक सेवाओं के कर्मचारी गण और मीडियाकर्मी इस बंदी से इतर अपने घरों से दूर अपनी कर्तव्यपरायणता से लोगों का दिल जीतते रहे।

पृष्ठभूमि यह है कि चीनी वायरस वुआन में महामारी बनकर फैला। वहाँ से इसका संचरण पूरे विश्व में ऐसा हुआ कि लगभग पूरी दुनिया इस ‘विश्वमारी’ की चपेट में है। भूमंडलीकृत ग्राम बने विश्व में भारत भी इससे अछूता नहीं रह सका। यहाँ भी अनेक लोग काल के गाल में समा गये हैं, सैकड़ों जीवन की जंग लड़ रहे हैं और करोड़ों आशंका के भँवर से घिरे हैं। पूरी दुनिया में मचे हाहाकार के बीच विभिन्न देश कोरोना वायरस से अपने अपने तरीकों से लड़ रहे हैं। भारत के चिकित्सा कर्मी, प्रशासनिक अधिकारी, राजनीतिक नेतृत्व, मीडिया, स्वयंसेवक, गैर-सरकारी संगठन और आम नागरिक भी इस जानलेवा वायरस से लोहा ले रहे हैं। इस क्रम में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित कर देश को संबल दिया। साथ ही उन्होंने आम जनों से संकल्प एवं संयम से वायरस संचरण रोकने के लिए एक दिन के ‘जनता कर्फ्यू’ का आह्वान किया। परिणामस्वरुप भूमंडलीकृत गाँव बने विश्व में भारत का एक-एक गाँव, एक-एक मोहल्ला, एक-एक शहर ही नहीं बल्कि इनका एक-एक घर पूर्वाह्न 7 बजे से अपराह्न 5 तक स्वयं में भूमंडल बन गया। यह अद्भूत है।

यह तय है कि संचरण रोकने के लिए सिर्फ एक दिन के सांकेतिक ‘जनता कर्फ्यू’ से बात नहीं बनेगी। इसे बहुत आगे ले जाना होगा। संयम और संकल्प को और ढृढ़ करना होगा। कोरोना का संचरण और संक्रमण रोकने के लिए हर स्तर पर प्रयास करने होंगे। आज रेल-मेट्रो, सड़क परिवहन सेवाओं और उड्यन सेवाओं को बंद करने और अन्य प्रकार के लॉक़ाउन के आदेश दिए गए हैं – केन्द्र और विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर। वायरस के संचरण और संक्रमण को रोकने में इससे प्रभावी मदद मिलेगी लेकिन इन सबके अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण है जन भागीदारी। ‘जनता कर्फ्यू’ ने  जन भागीदारी से कोरोना से लड़ने का संकल्प दिखाया है और लोगों के संयम का परिचय दिया है। आम जन उनलोगों से क्षमा प्रार्थी हैं जिन्हें इस ‘जनता कर्फ्यू’ से किसी तरह की कोई परेशानी हुई है। बड़े संकट से निबटने के लिए छोटे या कभी-कभी बड़े मूल्य समाज को देने ही पड़ते हैं।

राष्ट्र का कोरोना संकट में एकजुट होकर उससे निबटने के लिए कृतसंकल्प होना आवश्यक है लेकिन राष्ट्र कृतघ्न  कहा जाएगा यदि उसने अपने उन नायकों का आभार ज्ञापन नहीं किया जो इस संकट को दूर भगाने के लिए अपनी जान पर खेलकर कर्तव्य पालन की मिसाल पेश कर रहे हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री ने यह भी आह्वान किया था कि ‘जनता कर्फ्यू’ की समाप्ति पर लोग अपने घरों के दरवाजे व खिड़कियाँ खोलकर और ताली-थाली बजाकर ‘युद्धरत’ चिकित्साकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस व अर्द्ध सैनिक बल के जवानों और अधिकारियों का अभिनन्दन करें।

कृतज्ञ जनता ने राष्ट्र की ओर से इन योद्धाओं का शाम 5 बजे अद्भूत, अनूठा, अद्वितीय और अभूतपूर्व अभिनन्दन किया। समवेत ताली बजी, थाल पीटे गये, घंटी बजी, शंखनाद हुआ और ढ़ोल तक बजे। इसमें आम जन के अलावा नेता और अभिनेता, पुलिसकर्मी, मीडियाकर्मी और उद्योगपति तक शामिल हुए। इस शब्दहीन किन्तु मुखर आभार प्रदर्शन से गाँव-गाँव और शहर-शहर गूँज उठे। मेरे लिए ये पाँच मिनट भावनात्मकता के अविस्मरणीय पल थे। पूरे परिवार ने ‘नागरिक सेना’ के रूप में ‘युद्धरत’ योद्धाओं और नायकों का साभार अभिनन्दन किया। सेना की इस टुकड़ी का नेतृत्व मेरी 75 वर्षीय माँ कर रही थीं। माँ ने हमारे योद्धाओं को आशीष दिया, “हमार बाबू लोग लखिया होखे।“ अंत में माँ के चेहरे पर रोष भी आया, “दूर दफ्फे जो रे करोना, तोरा लुत्ती लागे।“

कुछ लोग कहेंगे कि यह सब देश के सबसे बड़े नेता की लोकप्रियता का एक पैमाना है। अधिकांश यह मानेंगे कि यह संकट के समय देश की एकता और एकजुटता एवं नागरिकों के जीवट और जिजीविषा का प्रतीक है। कुछ ऐसे भी मिल जाएंगे जो इसे आस्तिव के संघर्ष के लिए ‘मरता क्या न करता’ जैसा संघर्ष बता देंगे। मैं इसे तीनों का समवेत रूप मानता हूँ। जो इसे दुष्प्रचार से अंधविश्वास बताकर खारिज कर रहे हैं, उन्हें यह बताया जाए कि थाली-ताली कोरोना भगाने के लिए नहीं बल्कि कृतज्ञता ज्ञापन में बजे थे। थाली-ताली बजाना एक सांकेतिक युद्धघोष है। युद्ध एकान्त में रहकर और स्वच्छता एवं संयम से जीता जाएगा। एक छोटा संस्मरण भी सुना दूँ। हमारे घर में किसी को चेचक होता तो मेरे पापा उसकी वैज्ञानिक चिकित्सा करवाते थे लेकिन वह मेरी माँ को मइया पूजन और उसके विधि विधान से नहीं रोकते थे। वह अक्सर कहा करते थे, “विज्ञान की भी एक सीमा तो है ही। कोई फर्क नहीं पड़ता यदि हम इस दुविधा में पड़ जाएँ कि समाधान किस विधि से निकला है।“

दिल्ली के कनॉट प्लेस में पुलिस कर्मियों द्वारा सफाई कर्मचारियों को गुलाब दिए जाने में इस कृतज्ञता ज्ञापन का एक और स्तर दिखा। समाज पर लग चुके संवेदनहीनता के ठप्पे को पटना में एक युवक ने पुलिसकर्मियों को सेनेटाइजर बाँटकर थोड़ा कमजोर किया। ऐसे और भी उदाहरण होंगे जो करुणा की इस घड़ी में बता गए कि गलाकाट प्रतियोगिता और व्यवसायिकता के इस चंट युग में समाज में अभी भी बहुत कुछ शेष है। सनद रहे, इस ‘विश्वमारी’ से वह देश अधिक कुशलता से निबटेगा जिसके नागरिक संयम, संकल्प और संवेदनशीलता दिखाएँगे, जिसके चिकित्साकर्मी और अधिकारी कर्तव्यपरायणता के पुराने कीर्तिमान ध्वस्त करेंगे, जिसके राजनीतिज्ञ मतभिन्नता त्याग कर नैतिक बल के साथ एकता का प्रदर्शन करेंगे और जिसका मीडिया सनसनी के हनी को पटखनी देगा। आइए, आशा करें कि भारत अब भी ऐसा ही देश है और वह कोरोना को भारत से ही नहीं बल्कि पूरे विश्व से खदेड़ कर मानवता, संवेदना और करूणा के नये मूल्य स्थापित करेगा।

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लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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