मंडली

तुम जो मिल गये हो

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वो मुझे याहू चैट रूम में मिली थी। किशोर कुमार के गाने का ग्रुप था, या लता मंगेशकर का, यह याद नहीं पर हम १५-२० मिनट से हम वन टू वन चैट  कर रहे थे। मुझे पुराने और नए गानों की जानकारी बहुत थी – सहगल से ले कर शान तक। बात चल पड़ी – एक गीत की सीढ़ी बन कर दूसरे गीत तक। हम दोनों जैसे जुगलबंदी कर रहे थे, अपने हिंदी फिल्म संगीत के ज्ञान की। अचानक मैंने पूछा, “अभी कौन सा गाना है दिमाग में?” उसने तुरंत टाइप किया, “तुम जो मिल गए हो, तो ये….” वैसे तो करीब ९० प्रतिशत हिंदी गाने परिणय और विरह पर ही आधारित होते हैं पर न जाने क्यों उस समय मेरी साँसे भारी हो गयीं और कान लाल। मैंने पूछा; “सच में?” कोई जवाब नहीं आया। १० मिनट तक मैं स्क्रीन निहारता रहा। फिर कंप्यूटर बंद करके खाना खाने खाने चला गया।

उस जमाने में इस बात से किसी लड़की को बुरा लग सकता था। मुझे लगा कि अब फिर कभी बात नहीं होगी। मैने मन को समझाया कि भाई उसका नाम भी नहीं पता, उम्र या शहर भी नहीं पता। जाने दो, होता है। अगले दिन फिर याहू पर लॉगिन किया तो देखा उसका ऑफलाइन मैसेज है, “हेलो! सॉरी, कल डी सी हो गया था।” मैंने जवाब दिया, “नो प्रॉब्लम। इट इज ओके। वैसे ये डी सी क्या होता है?” पाँच मिनट बाद ऑनलाइन आकर एक स्माइली के साथ उसने जवाब दिया, “डिसकनेक्ट।” मैं सिर्फ ओह कर सका। तब शायद हम्म का रिवाज़ नहीं था। खैर, बातों का सिलसिला निकल पड़ा। बातें अब सिर्फ गानों तक सीमित न हो कर एक दूसरे के बारे में भी होने लगीं।

उसका नाम अर्चना था। वह दिल्ली में ही एक सॉफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर थी। मुझसे दो साल छोटी, आगरा की रहने वाली। मैंने जब अपना नाम बताया तो बोली “अच्छा तुम भी ब्राह्मण हो। मेरे पापा मेरी शादी किसी ब्राह्मण लड़के से ही करना चाहते हैं।” मन में आया कह दूँ कि मिलवा दो पर सिर्फ ‘आजकल इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है’ कह कर चुप हो गया। करीब हफ्ता दस दिन, हर रोज एक समय हमारी बात होती थी। रंगों की, खाने की और बीच बीच में एक दूसरे से पूछ बैठते, “अभी कौन सा गाना है दिमाग में?” दिमाग के गाने एक दिशा में आगे बढ़ रहे थे, और मन के अरमान भी।

मिलने की बात हुई और तय हुआ कि निजामुद्दीन स्टेशन पर सुबह मिला जाए। वो ताज एक्सप्रेस से घर जा रही थी। दिसंबर का महीना था। मैं जैकेट और टोपी पहन कर पहुँचा। वो हँस कर बोली, “तुम सच में यूएस से आये हो।” मैंने झेंप कर जवाब दिया, “मैं टेक्सास में था, वहाँ ठण्ड नहीं पड़ती।” उसने कहा कि अच्छे दिखते हो तो मैं शरमाया। फिर एक डिब्बा थमाते हुए वह बोली, “ये लो कुम्हड़ा पूड़ी है। तुम्हे अच्छी लगती है। इसलिए सुबह सुबह बनाकर लायी हूँ, खा लेना।” वो ट्रैन मैं बैठ गयी।

बातें बढ़ीं, मुलाक़ातें भी और दोस्तों की फब्तियाँ भी। उस ज़माने का सबसे महंगा शौक़ मोबाइल फ़ोन खरीदकर गिफ्ट भी कर दिया। मुलाक़ातें स्टेशन से बाहर निकल कर प्रिया सिनेमा और उस के आस पास के इलाकों तक होने लगीं। मैं ज्यादा बोलता था, वो कम। मैं उसे सपने बताता और वह मुस्कुरा के बस “अच्छा” बोल देती।

एक बार लेट नाईट शो के बाद रिक्शे में मैंने फिर वो बात शुरू कर दी, “मैं शादी के बाद बाहर रहना चाहता हूँ। अच्छा घर, अच्छी गाडी, अच्छा जीवन …” “नहीं हम इंडिया में ही रहेंगे”, ये कहकर वो चुप हो गयी। मेरा दिल धड़ककर सीने से टकरा रहा था। हम दोनों चुपचाप एक दूसरे को देखते रहे। मैं झुका। हमारे होंठ जैसे छू कर अलग हो गए। “मैं तुमसे प्यार करता हूँ अर्चना, मुझसे शादी करोगी?” “हम बाद में बात करेंगे”, यह कह कर वो थोड़ा खिसक गयी। मैं थोड़ा सकपका गया। अमेरिका रिटर्न होने के बावजूद इन सब चीज़ों का अनुभव नहीं था मुझे। “सॉरी मैं बुरा आदमी नहीं हूँ”, कह कर चुप हो गया मैं। “जानती हूँ”, ये कह कर वो रिक्शे से उतर गयी। उसका हॉस्टल आ गया था।

तीन चार दिन तक मैं फ़ोन करता रहा पर कोई जवाब नहीं आया। मैं खुद को कोसने लगा, “किस-विस की क्या जरूरत थी, वैसे भी बोल सकते थे, टॉम क्रूज़ समझते हो खुद को?” अचानक एक दिन उसका फ़ोन आया। मैं एक मीटिंग में था, फटाफट बहार निकल कर कॉल उठाया। “आज शाम को मिलोगे?”, उसने पूछा. मैंने जवाब दिया, “हाँ, जहाँ बोलो आ जाऊँगा।” “मैं नयी दिल्ली स्टेशन जा रही हूँ। टिकट करवानी है घर की वहीँ मिलते हैं ५ बजे।”, उसने मेरी बात काटते हुए कहा। मैं चार बजे ही पहुँच गया था। वो आयी और बोली, “बहुत जल्दी आ गए बिजी आदमी?” मैं बस मुस्कुराया। ‘चाय पियोगे?’, उसने पूछा। “कुछ खाऊंगा भी, चलो CP में कॉफ़ी हाउस में बैठते हैं”, मैंने बहुत ही नर्वस अंदाज़ में कहा।

हम कॉफ़ी हाउस में आ गए। उसने कॉफ़ी ली और मैंने इडली जो मेरे हलक के नीचे नहीं उतर रहा था। मैंने फिर माफ़ी माँगनी चाही तो उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे काटते हुए बोला, “देखो अक्षत, मैं जानती हूँ तुम क्या सोचते हो। तुम बहुत अच्छे हो। मैं भी तुम्हे चाहती हूँ पर मैं अभी बहुत कन्फ्यूज्ड हूँ। मैं शायद तुमसे शादी नहीं कर सकती।” मैंने कहा, “मैं बहुत अच्छा कमाता हूँ। पढ़ा लिखा हूँ। बाहर नौकरी है। और तो और तुम्हारे पापा को भी कोई परेशानी नहीं होगी।” “बात पापा की नहीं है, बात मेरी है। मैं किसी और को प्यार करती हूँ।”, उसने हाथ हटाते हुए कहा।

मेरी आँखें छलक आयीं। वो मेरा सबसे बड़ा सपना थी। सब कुछ था मेरे पास, उसके आने से मैं पूरा हो जाता पर वो सपना आज टूट रहा था। मैंने खुद को सँभालते हुए पूछा, “कौन है, क्या करता है, मुझ से अच्छा है?”

“बात अच्छे-बुरे की नहीं है बाबा। मुझे उससे सच्चा प्यार है। वो न जो दिल से होता है और बस हो जाता है।”

मैंने फिर पूछा, “क्या करता है?”

“आगरा में रिपोर्टर था जागरण में। पापा के साथ ही काम करता था। घर आता था और बस …”

मैंने बात काटी, “तो अभी कुछ नहीं करता”?

“नहीं पर उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।”

मैं कुछ नहीं कह सका, बस उसे कॉफ़ी पीते देखता रहा। आखिर सच्चे प्यार की मेरी भी परिभाषा वही थी। अचानक वो बोली, “चलें?” मैंने बिल भरा और हम बाहर आ गए। मेरी आँखों में आँसू थे। शायद उसे बुरा लगा और वो ठहर गई।

“मैं जानती हूँ कि तुम्हारे साथ सब कुछ अच्छा होगा।”, ये कहते हुए उसने मुझे गले लगा लिया।

पीठ पर उसका हाथ ऐसे लग रहा था जैसे मैं गिलहरी हूँ और भगवान रामजी हाथ फेर रहे हों। अचानक कॉफ़ी हाउस की बातें फिर सामने कौंध गयीं और मैंने दुखी होकर हटते हुए बोला, “कुछ अच्छा नहीं होगा मेरे साथ, मेरी किस्मत ही ख़राब है, तुम करो जो करना है।” कहकर मैंने ऑटो पकड़ा और निकल गया।

पता नहीं क्यों इस बात से प्रेम के प्रति जो मन में कड़वाहट हो गयी जो कभी नहीं गयी। बीच में कई लड़कियों से मिला, पर किसी से प्यार नहीं हो पाया। आखिर मेरे प्यार की परिभाषा ही ऐसी थी कि अर्चना दिल दिमाग से जाती ही नहीं थी। सच्चा प्यार तो एक बार होता है। धीरे धीरे जमाना भी याहू चैट से ऑरकुट होते हुए फेसबुक तक आ गया था। मैं अपने करियर में बहुत अच्छा कर रहा था, हालाँकि मन एकाकी था और दुखी भी। मैं बोस्टन साउथ स्टेशन से निकल रहा था कि अचानक उसे सामने देखा। “अर्चना!”; मैंने उससे करीब करीब टकराते हुए कहा। “ओह हाई, व्हाट ए प्लेसंट सरप्राइज”, उसने कहा। समय कम था। हमने फ़ोन नम्बरों का आदान प्रदान किया और अपने अपने रास्ते निकल गए।

रास्ते में मैं सोचता रहा कितना बदल गयी है, कपडे, भाषा सब कुछ। उसे सच्चा प्यार और किस्मत सब कुछ मिल गया है। मीटिंग से निकल कर बात हुई और उसने घर पर खाने पर बुलाया। मैं शाम को उसके घर गया। वो अपने बच्चे को सुला रही थी। मैं उसके परिवार की फोटो देख ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आयी, “पिछले साल हम यूरोप गए थे तब की है।” मैं मुस्कुराया, “ऑफिस से नहीं आये तुम्हारे हस्बैंड?” “बाहर गए हैं, मैनेजिंग डायरेक्टर हैं बिग फाइव कंसल्टिंग में”, उसने मुझे किचन में आने का इशारा करते हुए कहा।

मैंने इम्प्रेस होते हुए कहा, “वाकई सच्चे प्यार में ताकत होती है अर्चना। तुमने आगरा के एक बेरोजगार पत्रकार को इतना बड़ा आदमी बना दिया।” वो कुम्हड़ा काटते हुए बोली, “सच्चा प्यार-व्यार कुछ नहीं होता अक्षत। वो तो कुछ महीने बाद ही किसी लड़की के साथ भाग गया, बताकर भी नहीं गया लूज़र। अजय के साथ मेरी अरेंज्ड मैरिज है।“ समय और उम्र के साथ परिपक्वता आ गयी थी थोड़ी। मैंने संयम रखते हुए कहा, “मैं याद नहीं आया?” उसने बड़ी अजीब निगाहों से देखते हुए जवाब दिया, “आए थे, तुम्हे कितनी ईमेल भी लिखीं पर तुमने जवाब भी नहीं दिया।” मैं हॉटमेल का पासवर्ड भूल चुका था और अब जीमेल पर था। मेरे मुँह से शिट निकल गया। वो कुछ पल चुप रही और बोली, “पंडितजी खाना बना रही हूँ। ये सब न बोलें।”

खाना आज फिर मेरे हलक के नीचे नहीं उतर रहा था। मानो निजामुद्दीन, नयी दिल्ली, बोस्टन साउथ की रेल की पटरियाँ सब मेरी ओर हैं और सभी ट्रेनें आवाज़ करते हुए मेरी ओर आ रही हैं, चीखती हुई, चिल्लाती हुई कि सच्चा प्यार हो न हो पर बुरी किस्मत जरूर होती है, और वो तुम्हारी है अक्षत।

मैं अपने ही ख्यालों के दलदल में धँसा जा रहा था कि अचानक उसकी आवाज आयी, “अभी कौन सा गाना है दिमाग में?”

“तुम्हारे साथ गानों का शौक़ भी छूट गया। जिन्दा हूँ कुछ इस तरह कि गमे ज़िन्दगी नहीं …”, यह कहते हुए मैं हाथ धोने को उठ गया।

दावात्याग – यह कहानी lopak.in पर भी प्रकाशित हुई थी।

एक तकनीकवेत्ता और विपणन विशेषज्ञ होते हुए भी लेखक भावनात्मक कहानियाँ लिखते हैं। इसके अतिरिक्त वह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। तकनीक, विज्ञान और अर्थव्यवस्था भी उनके आलेख के विषय हैं। लेखक की अनेक रचनाएँ 'ऑप इंडिया' और 'लोपक.इन' पर प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखक आइआइटी मुम्बई अलुमनस हैं और संप्रति एक टेक्नोलॉजी कंपनी में कार्यरत हैं। साथ ही वह एक नव-उद्यम के प्रणेता हैं।

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