मंडली

मैं चला जाऊँगा

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“तेरे को पता है, रोहित ने लास्ट एग्जाम के दिन पायल को प्रपोज कर दिया और वो भी मान गई।”

“तू फट्टू ही रह गया। पायल ने पहले तुझे प्रपोज किया था और तू लजा गया था….. उल्लू!”

“यार! लड़कियों से डर लगता है।”

“हमसे तो कभी ना डरा?”

“अबे तू तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। तेरे से सब कह लेता हूँ पर बाकी लड़कियों से डर लगता है।”

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“यार! मुझे छत पे अकेले नहीं आने देते।”

“बोल दिया कर कि कोई मुझे डिस्टर्ब ना करे।”

“जैसे तू घर में किसी को जानता ही नहीं?”

“गीत! तेरे से ही बात करने का मन होता है और किसी से नहीं!”

“ना रे पागल! तुझे सब प्यार करते हैं।”

“जानता हूँ पर अम्मा के जाने के बाद किसी का प्यार समझ ही नहीं आता।”

“कोशिश तो कर!”

“नहीं होता”

“अच्छा चल! जाती हूँ”

“जा …”

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“ये देख तूने जो किताब भेजी थी – ‘मैं चला जाऊँगा’। इसे सिरहाने लेकर सोती हूँ, कोई चुरा लेगा तो?”

“तेरे से सब जलते हैं ना!”

“हाँ! क्योंकि तू मुझे सबसे ज्यादा मानता है ना!”

“पर वो सब तेरे जैसी हैं भी तो नहीं, तू कितना समझती है मुझे!”

“देख! तू ऐसी दुखी करने वाली किताबें ना भेजा कर। मुझे रोना आता है।”

“ठीक है। तुझे बचपन में ही कूट कूट कर कितना रूलाया है, अब नहीं रुलाना चाहता।”

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“बचपन ही अच्छा था ना! हम कितने खुश थे।”

“हाँ! कितने मज़े किए हैं।”

“मैं तुझे कितना मारता था।”

“मैं भी तो चुन-चुन के गालियाँ देती थी।”

“एक बात बोलूँ? मैं कभी-कभी तेरे से जलता भी था।”

“क्यों?”

“तू पढ़ने में अच्छी थी और मैं गधा, सब तेरी तारीफ़ करते।”

“पर तू चैंपियन था। क्रिकेट में मास्टर, शूटिंग में उस्ताद, साइकिल के स्टंट करता और बाइक पर भी।”

“वो कोई नहीं देखता, नंबर अच्छे आने चाहिए।”

********

“मैं पिता जी के सामने नहीं जाना चाहता।”

“वो तुझे बहुत प्यार करते हैं।”

“पर उनकी उम्मीदें? पी.सी.एस. ऑफ़िसर बनाना चाहते थे और मैं बारहवीं भी पास नहीं कर पाया?”

“तेरा ‘होना’ ही ज़रूरी है, ‘पीसीएस’ होना नहीं।”

“मैं नज़र नहीं मिला पाऊँगा।”

“तू सच में फट्टू रह गया। हुंह!”

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“आज तू कितने दिन बाद आया है। वो भी आधी रात को!”

“तू दिन भर भीड़ में रहती है। तुझसे कितनी बातें करनी है।”

“पहले ये देख, मैंने चाकू से ‘A’ लिखा, तेरा नाम।”

“अबे! तुझे दर्द नहीं हुआ?”

“पता ही नहीं चला के कब और कैसे कर बैठी!”

“किसी ने डाँटा नहीं?”

“अब तक किसी ने देखा ही नहीं।”

“मेरे साथ चलेगी? फिर से बचपन में?”

“चल …”

********

गीत!

और उसने पलट कर देखा और आवाज की दिशा में चलती रही पर सफेद टी शर्ट और काला लोअर पहनने वाला अमन दूर-दूर तक नहीं दिखा। घुप्प अंधेरी रात में अब वो पोखरा के किनारे खड़ी थी।

पीछे से माँ और मामा टॉर्च लिए आ रहे थे।

********

आँख खुलने पर उसने ख़ुद को पलंग पर पाया।

सुबह हो चुकी थी, सब उसे घेरे हुए थे।

मामा ने सबको बाहर भेज दिया।

दरवाज़ा बंद करके बोले, “तुम अमन से चार महीने ही बड़ी थी। कभी तुम्हारी माँ ने उसे दूध पिलाया तो कभी उसकी माँ ने तुम्हें। साथ पले और बढ़े। तुम दोनों को बचपन से ही विशेष लगाव था, तुम रोती तो वो भी रोता और वो पिटता तो तुम्हें दर्द होता। अपनी सगी चार बहनों से पहले वह तुमसे राखी बँधवाता। तुम दोनों जुड़वा ना होकर भी जुड़वा ही थे।

अब जो कहूँगा वो सुनो! उसने तुमसे कहा था कि वो फ़ेल हो गया तो मुझे चेहरा नहीं दिखाएगा। तुमने उसे पूना जाने से रोकना चाहा पर मेरी ज़िद थी, उसे हॉस्टल भेज कर तैयारी कराना।

और इस भूल की सज़ा उसने हमें दी। अपने इन्हीं कंधों पर पाँच फुट दस इंच के जवान बेटे को श्मशान तक ले गया था। ज़हर से उसका गेहुँआ रंग काला पड़ गया था। डॉक्टर कह रहे थे कि वे रात भर ज़हर निकालने की कोशिश करते रहे। उसे तकलीफ़ हो रही थी और वो जीना चाहता था पर वे उसे बचा नहीं पाए। मैने जब उसे देखा तो उसकी आधी आँख खुली थी, जैसे मुझसे कुछ कहना चाहती हों। उसके होंठों पर पपड़ी जम गई थी। अपने इन्हीं हाथों से मैंने उसे मुखाग्नि दी।

गीत! फाड़ दो ये किताब – ‘मैं चला जाऊँगा’। वो जा चुका है। दूर … बहुत दूर। वो हमारा दुश्मन था, मोह लगाने आया था।”

आज अमन के जाने के चार माह बाद गीत फूट-फूट के रोई। अमन के जाने से भी बड़ा दुख उसे एक पिता की बेबसी और बेचारगी को देखकर हो रहा था। मामा ने उसे चुप नहीं कराया … वो रोती रही … रोती रही।

उस दिन उसी सफ़ेद टी शर्ट और ब्लैक लोअर में अमन फिर आया। खिड़की से झाँकते हुए वह उसे बुला रहा था पर गीत ने नज़र फेर ली। आँसू पोंछ कर वह काम में लग गई।

लेखिका कहानियाँ, संस्मरण और कविताएँ लिखती हैं। इनकी कहानियाँ कभी मर्म उकेरती हैं, कभी इनसे मृदुल भावनाएँ टपकती है और कभी पलकें भिंगोने वाली करुणा। उनकी रचनाएँ समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखिका पेशे से शिक्षिका होते हुए भी एक कुशल गृहिणी हैं।

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