तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद – मंडली
मंडली

तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद

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उन दिनों दीपावली से लेकर छठ पूजा तक बिहार में अनेक गाँवों की नाट्य समितियाँ नाटकों का मंचन करती थीं। एक नाट्य समिति मेरे ननिहाल में भी थी – तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद। परिषद के सचिव मेरे मामा थे। अंतिम नाटक शायद 1990 में हुआ था पर मामा जी आज भी सचिव साहब ही कहे जाते हैं। तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद का सिर्फ नाम ही साहित्यिक नहीं था बल्कि परिषद में कलात्मकता भी कूट कूटकर भरी थी।

परिषद के नाटकों के स्थायी निर्देशक हुआ करते थे सुरेन्द्र प्रसाद, बीए। उनके नाम के साथ बीए लिखा जाना उन्होंने स्वयं ही अनिवार्य किया था। उनके खलिहरई की व्यथा ‘बीए बेरोजगार’ नामक नाटक में उभरी थी। सुरेन्द्र प्रसाद को उनके घर वाले ‘बीए बैल’ कहा करते थे क्योंकि बीए पास होने के बावजूद उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली थी। दर्जनों नाटकों का निर्देशन भी उन्हें बैल के तमगे से मुक्त नहीं करा सका। तब मेरी जितनी समझ थी, उससे लगता था कि वह कला के लिए समर्पित थे पर दुनिया में सफलता का पैमाना हमेशा आर्थिक ही रहा है। अस्सी का दशक भी भिन्न नहीं था।

परिषद को दो स्थायी नायक थे: 1- शशिभूषण सिंह, जो अब नहीं रहे और 2- नन्दकिशोर सिंह जो माउथ कैंसर के सर्वाइवर हैं। ऐसा कहा जाता था कि दोनों कमाल के अभिनेता हैं। देखने में दोनों हीरो जैसे थे। नाटकों के दौरान एक-एक कलाकार के लिए आगन्तुक वीआइपी द्वारा पुरस्कार घोषित किए जाते थे। इन दोनों की राशि 501/ और 1001/ तक होती थी और उन्हे यह पुरस्कार कई लोगों से मिलते थे। शशिभूषण सिंह ने एक नाटक में नायक कुणाल का किरदार निभाया, इतने लोकप्रिय हुए कि आस-पास के गाँवों में भी वह कुणाल सिंह कहे जाने लगे। इसी प्रकार नंदकिशोर सिंह ने ‘दानवीर कर्ण’ में कर्ण की भूमिका निभायी तो उन्हे करन भैया, करन चाचा या करन बबुआ कहा जाने लगा।

मेरे मामा अच्छे अभिनेता नहीं थे पर परिषद के सचिव पद पर संभवत: परिवार के प्रभाव से स्थायी स्थापित हो गये थे। हर नाटक में उनकी एक भूमिका होती थी, लगभग वैसी ही जैसी सुभाष घई की फिल्मों में उनकी होती है। मामा जी उस छोटी भूमिका को भी बहुत गंभीरता से लेते थे और रिहर्सल में एक दिन भी नागा नहीं करते थे।

लड़की या महिला के लिए तब नाटकों में काम करने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। इसलिए हर बार ले देकर नायिका के लिए लंबे बालों वाला हजरिया चुना जाता जो नाच का लवंडा था, उसकी खूबसूरती का तो पूछिए मत। परिषद के नाटकों की सबसे कमजोर कड़ी यही थी पर हजरिया कभी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटा। हजरिया की पत्नी भी नाटक देखने आती थी। हमलोग उस बाल कौतूहल में हमेशा रहते कि हजरिया की पत्नी को अपने पति को स्त्री रुप में देखकर कैसा लगता होगा।

परिषद का अपना एक संगीत मंडल भी था जो नाटक शुरु होने से पहले गवनई करता व नाटक के दौरान पार्श्व संगीत देता था। संगीत मंडल का नेतृत्व स्व. राजहंस सिंह करते थे जो बहुत अच्छे गायक और हारमोनियम वादक थे। नाटक दल व संगीत मंडल में ईगो क्लैश भी होता था। दोनों स्वयं को दूसरे से बढ़िया मानते थे। संगीत मंडल अपनी प्रस्तुति के लिए अधिक समय माँगता और नाटक के निर्देशक नाटक जल्दी शुरु करने की चेष्टा में रहते। अंतिम निर्णय मोहन मामा करते जिनकी चर्चा नीचे की गयी है।

परिषद से जुड़े एक अनोखे चरिॆत्र थे मोहन मामा। मामा भी बीए बेरोजगार थे। साहित्य पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी। परिषद को तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद का नाम उन्होंने ही दिया था। उनकी लिखावट भी बहुत अच्छी थी। नाटकों के चयन से लेकर उनके पोस्टर्स बनाने की जिम्मेदारी मोहन मामा की थी। मोहन मामा को निर्देशक सुरेन्द्र प्रसाद, बीए से हमेशा नाटकों के दौरान भोजपुरी एक्सेन्ट में बोले जाने वाले हिन्दी संवादों पर शिकायत रहती। कभी कभी ऐसा भी लगता कि मोहन मामा स्वयं ही निर्देशक बनना चाहते हैं।

नाटक का मंच दीपावली से दो दिन पहले ही तैयार हो जाता। नाटकों का रिहर्सल महीने भर पहले शुरु हो जाता, जिसे हमलोग छिप छिपकर देखा करते थे। पहला नाटक छोटी दीपावली को खेला जाता। प्रखंड कार्यालय के नौकरशाह और थाना स्टाफ से लेकर सांसद और विधायक भी नाटक देखने आते। नाटक शुरु होने से पहले मंच से भी अधिक हॉट एंड हैपेनिंग जगह था कलाकारों का ग्रीन रुम, जहाँ प्रवेश निषेध था। मैं गाँव का भाँजा था, इसलिए मुझे सीमित समय के लिए प्रवेश मिल जाता। मैं जितनी देर वहाँ होता, उतनी देर मेक-अप करते हजरिया की भाव-भंगिमा ही देखता।

दूसरा नाटक दिवाली और छठ पूजा के बीच किसी दिन खेला जाता। नाटक की रात अगल-बगल के चार-पाँच गाँव नाटक देखने आते। गाँव में पुलिस प्रशासन भी होता था लेकिन इन गाँवों में चोरी न हो, इसकी अनौपचारिक जिम्मेदारी गाँव के ही चोर शिवदत्तवा की थी। छठ पूजा के पारन के दिन पुरस्कार वितरण होता और परिषद की गतिविधियाँ एक साल के लिए ठप्प हो जातीं। गाँव में तरह तरह की लड़ाईयाँ थीं लेकिन कोई लड़ाई किसी भी भोज में ‘भाई के भात’ पर हावी नहीं होती थी। इसी प्रकार तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद भी एक ऐसा साझा मंच था जो गाँव वालों को संपत्ति या अन्य विवाद कुछ समय के लिए भुला देने को बाध्य करता था।

परिषद की बातें पूरी नहीं होगी यदि इसमें आदरणीय स्व. तोता पंडिज्जी का नाम न आए। उनका असली नाम जानने की जरुरत कभी नहीं पड़ी क्योंकि मैं तो उन्हें पंडिज्जी नाना कहता था। परिषद के कामों में उनकी बेहद रुचि रहती। वह गाँव के ठाकुरबाड़ी के पुजारी थे और गाँव के सबसे सम्मानित व्यक्तियों में से एक थे। आज गाँव का ठाकुरबाड़ी भव्य बन गया है पर पंडिज्जी नहीं रहे और वैसी रौनक भी नहीं। तरुण भवतारिणी नाट्य कला परिषद के पोशाक, मुकुट, तलवारें, मंच के पर्दें और तमाम प्रशस्ति पत्र आदि अब भी हैं, कुछ कलाकार हैं, कुछ चल बसे, निर्देशक हैं, नाम है, लेकिन न मंच है और न नाटक। गाँवों में तब से अधिक लोग हैं अर्थात दर्शक हैं पर नाटक देखने की रुचि भी शेष है, इसका पता नहीं।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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