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गौरवान्वित करती वीरगाथा: तानाजी, द अनसंग वॉरियर

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दीपिका पादुकोण जेएनयू गईं। वहां काफी ‘क्रांतिकारी’ बातें हुईं। देश में क्रांति तो नहीं आई लेकिन ट्विटर पर हाहाकार जरूर मच गया। दीपिका पर कई आरोप लगे और उनकी फिल्म ‘छपाक’ के बहिष्कार का आह्वाहन हुआ। दीपिका भी शायद कुछ ऐसा ही चाहती थीं। कई बार ऐसा होता है कि फिल्म का सत्कार जो कर पाए, उसका बहिष्कार कर गुजरता है। कुछ लोगों ने ‘ताना जी’ फिल्म को ‘छपाक’ के काट के रूप में पेश किया। ट्विटर पर फिल्म की टिकटें बँटने लगीं और एक दूसरे को चुनौती देने का दौर आरम्भ हो गया। मैं हमेशा फिल्मी सितारों के बयानों और एक्टिविज्म को पीआर स्टंट मानता हूँ। दीपिका के बयान को भी मैंने उसी परिपेक्ष्य में लिया था। किसी से आपत्ति होने पर उसका बहिष्कार करना उचित है और कुछ हद तक जरूरी भी लेकिन बहिष्कार के लिए दूसरी फिल्म प्रमोट करना मुझे गलत लगा था।
 

खैर, मैंने कल रात ‘तानाजी : द अनसंग वॉरियर’ देखी। फिल्म देखने के बाद मैं फिर यही कहूँगा कि सिर्फ ‘छपाक’ के विरोध में तानाजी देखना गलत ही होगा। यह कसे हुए कथानक के साथ बहुत ही मेहनत से बनाई गयी फिल्म है।  इसे इसके मेरिट पर देखा जाना चाहिए न कि ‘छपाक’ के बहिष्कार के लिए। तानाजी का एक्शन व छायांकन विश्व स्तरीय है, कैनवास वृहद है और कुछ छोटी मोटी त्रुटियों को अनदेखा करें तो यह निश्चय ही भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ पीरियड एक्शन फिल्म होगी। एक पैकेज के रूप में तानाजी, बाहुबली से कहीं बेहतर निकल कर आई है। आगे बॉक्स ऑफिस में यह कैसा प्रदर्शन करती है, ये वक़्त ही बताएगा।

शिवाजी के सिपहसालार, सूबेदार तानाजी मलसुरे पर बनी यह फिल्म इतिहास नहीं कहती। यह रुपहले पर्दे पर उनकी वीरगाथा सुनाती है और इसमें कतई कोई बुराई नहीं है। फिल्म मनोरंजन का साधन हैं, अध्ययन और शोध का स्रोत नहीं। कथाकार व निर्देशक ने कई जगह कथानक को आगे बढ़ाने व रोचक बनाने के लिए रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रयोग किया है लेकिन यह भी सुनिश्चित किया है कि यह रचनात्मक स्वछन्दता न हो जाए। फिल्म के पहले ही दृश्य में जब बालक तानाजी को पहाड़ पर चढ़ते दिखाया जाता है तो मन में शंका उठती है कि कहीं ये अंग्रेज़ी फिल्म ‘300’ की कॉपी तो नहीं? हालाँकि कई सीन ‘300’ व दूसरी हॉलीवुड फिल्मों से प्रभावित लगते हैं, पर इसे कॉपी कहना इसके एक्शन, कोरियोग्राफी और स्टंट डिजाइन के साथ अन्याय होगा। ‘तानाजी’ के स्टंट व स्पेशल इफेक्ट के लिए कई विदेशी विशेषज्ञों की सेवा ली गई है और वह नजर आता है। छायांकन किको नकाहरा का है, जो कि भारत में बसी एक जापानी महिला सिनेमेटोग्राफर हैं। मेरे विचार में यह उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ काम है। सेट व परिधान में भी कहीं कमी नहीं दिखती।

जैसा मैंने पहले कहा, फिल्म इतिहास नहीं बताती बल्कि वीरगाथा सुनाती है। इस हिसाब से पटकथा पर ज्यादा टीका टिप्पणी उचित नहीं होगा, पर दो जगह मुझे कुछ त्रुटियाँ खलीं। इतिहास भी कोंधना किले की जीत में यशवंती नामक घोरपड़, जिसे हिंदी में गोह कहते हैं, के योगदान की बात करता है। इसे फिल्म में न दिखाना अजीब लगा। किले की जीत के बाद शिवाजी महाराज के कहे गए शब्द हर मराठी मानूस के दिल में बसते हैं। यही कारण है कि उन्होंने किले की जीत के बाद उसका नाम ‘सिंहगड़’ रखा था। फिल्म में ये शब्द बदल दिए गए हैं, जो थोड़ा निराश करता है। फिल्म के डायलॉग कड़क हैं, और मुंबई के मल्टीप्लेक्स में भी सीटियाँ व तालियाँ बजवा देते हैं। फिल्म में मराठी शब्दों का पुट स्वाभाविक है पर उत्तर भारतीयों को इसे समझने में दिक्कत हो सकती है। सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह फिल्म अन्य फिल्मों की तरह सेक्युलर मंकी बलैंसिंग नहीं करती। आलमगीर इस फिल्म में एक इस्लामिक आक्रांता हैं और तानाजी एक हिंदु सिपहसालार। किसी विचारधारा का पक्ष रखने के लिए नहीं पर बिना किसी ग्लानि के चरित्रांकन करने के लिए ओम राउत व प्रकाश कपाड़िया बधाई के पात्र है। फिल्म की एडिटिंग औसत है, कई जगह खलती है और ओम के बढ़िया निर्देशन में रुकावट सी डालती लगती है।

अभिनय के मामले में पूरी फिल्म पर अजय देवगन छाए हुए हैं और उन्होंने चरित्र से पूरा न्याय किया है। शिवाजी महाराज के रूप में शरद केलकर को ज्यादा मौका नहीं मिला, पर इसके लिए उनको नहीं कथानक को दोष दिया जा सकता है। काजोल के गिने चुने सीन हैं और उन्होंने कहीं भी निराश नहीं किया। देख कर यही लगता है कि ये अधिक फिल्में क्यों नहीं करतीं। मराठी सिनेमा व थियेटर के कई कलाकारों ने छोटे रोल किए हैं और वे अपने अभिनय कौशल से फिल्म को मजबूती प्रदान करते हैं। लूक केनी औरंगज़ेब के रूप में छोटे पर महत्वपूर्ण रोल में जँचे हैं। संवादों की कमी उन्होंने आँखों से ही पूरी कर दी है। अभिनय में कमजोर कड़ी सैफ अली खान ही कहे जा सकते हैं। वह मुगलों के वफादार राजपूत किलेदार से ज्यादा एक निरंकुश बादशाह ज्यादा लगते हैं। वैसे मुझे नहीं लगता कि उनके अतिरंजित अभिनय से आम दर्शक को कोई आपत्ति होगी।

तानाजी जातिवाद या सम्प्रदायवाद का प्रतीक नहीं है और न ही इसे बनाया जाना चाहिए। यह एक वीरगाथा सुनाती है। ऐसी अनेकों वीरगाथाएँ काल के इतिहास और इतिहासकार के काल की गाल में दबी हुई हैं। यह फिल्म पहला प्रयास है, उन कहानियों को कहने का जिन्हें सुनकर हम बचपन में गौरवान्वित होते थे। आशा है कि ऐसी कहानियाँ कहने का यह बेहतरीन प्रयास जारी रहेगा, श्रीगणेश करने के लिए अजय देवगन और उनकी टीम को साधुवाद।

एक तकनीकवेत्ता और विपणन विशेषज्ञ होते हुए भी लेखक भावनात्मक कहानियाँ लिखते हैं। इसके अतिरिक्त वह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। तकनीक, विज्ञान और अर्थव्यवस्था भी उनके आलेख के विषय हैं। लेखक की अनेक रचनाएँ 'ऑप इंडिया' और 'लोपक.इन' पर प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखक आइआइटी मुम्बई अलुमनस हैं और संप्रति एक टेक्नोलॉजी कंपनी में कार्यरत हैं। साथ ही वह एक नव-उद्यम के प्रणेता हैं।

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