पर्यावरण प्रदूषण के कारक – मंडली
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पर्यावरण प्रदूषण के कारक

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देश की राजधानी दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कहे जाने वाले कुछ अन्य शहर पिछले एक सप्ताह से दमघोंटू हवा के जिस नरक को भोग रहे हैं, वह न केवल अतिशय कष्टकारी है बल्कि गंभीर चिन्ता का विषय भी है। यह चिन्ता तब और बढ़ जाती है जब कुछ अन्य शहरों से भी हवा की शुद्धता चिन्ताजनक रुप से कम होने के समाचार मिलते हैं। यदि तत्काल तत्परता नहीं दिखाई गई तो स्थिति और बिगड़ेगी परिणामस्वरूप ये प्राणघातक भी हो सकती है।

कहने को हमारे पास केन्द्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हैं जो सभी प्रकार के प्रदूषण व उनके कारकों पर निगरानी के लिए और सरकारों को उन पर रिपोर्ट भेजने के लिए बने हैं। 1981 में लागू हुआ वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम भी है जो कानून के नाम पर एक ऐतिहासिक महत्व का दस्तावेज हुआ जा रहा है। ऐसा नहीं है कि उसके बाद देश में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु कोई और कानून नहीं बनाया गया लेकिन पर्यावरण हमारी सरकारों की प्राथमिकता कभी नहीं रहा। पर्यावरण और विकास पर हमारी नीतियाँ सदैव ही तदर्थ रही है। स्वच्छ वायु के लिए विधि व कार्यविधि पर एक नया अध्याय जोड़ते हुए वर्तमान सरकार ने भी इसी वर्ष जनवरी में ‘नैशनल क्लीन एयर प्रोग्राम’ लाँच किया जिसका उद्देश्य PM2.5 और PM10 के स्तर में वर्ष 2024 तक 20-30% की कमी (आधार वर्ष 2017) लाना है।

इस चिन्ताजनक परिस्थिति में हम अँधेरे में तीर चलाने से पहले ये समझ लें कि वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक हैं:-

इनकंप्लीट कम्बस्चन या अपूर्ण दहन से उत्पन्न कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)

दहन से नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड (NO2)

वाहनों, पॉवर प्लांट, केमिकल प्लांट/रिफाइनरी आदि से बैड ओज़ोन, सल्फर डाई ऑक्साइड (SO2), अमोनिया (NH3)

मेटल प्रोसेसिंग, पेंट इंडस्ट्री व एविएशन फ्युल से लेड (Pb)

व PM2.5 व PM10 जो आज की स्थिति के लिए विशेष रूप से उत्तरदायी हैं। PM या पर्टीकुलेट मैटर जो कि वायु में उपस्थित प्रदूषक कण होते हैं। WRI, 1996 के अनुसार भारत में PM स्तर पहले ही अमेरिका से 4-5 गुना अधिक है। 16 वर्षों तक चले एक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार यही वह प्रदूषक हैं जिनके कारण भारत में श्वसन सम्बन्धी रोगों व मृत्यु दर में वृद्धि हुई है।

PM10 = 10 माइक्रोमीटर या उससे कम

PM2.5 = 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम के वे सूक्ष्म कण हैं जो वायु में सदैव उपस्थित रहते हैं। कुछ का कारण हमारे वायुमंडल में होने वाली रासायनिक प्रक्रियाएं हैं तो कुछ का कारण भवन-निर्माण, सड़कों, कच्चे रास्तों व खुले मैदानों की धूल-मिट्टी, अनुचित रूप से जलाये जाने वाले कचरे व फसलों के अवशेष हैं।

इसका अर्थ यह है कि प्रदूषण के समस्त कारक पहले ही अपना भरपूर योगदान दे रहे थे और ऐसे में यदि आँकड़ों की मानें तो राजधानी क्षेत्र की वर्तमान स्थिति में बढ़े हुए PM स्तर में 30% वृद्धि केवल पंजाब में पराली जलाने व 10-15% दीवाली पर जलाये गये पटाखों के कारण हुई है। अचानक तापमान गिरने व विभिन्न कारणों से वायु-प्रवाह के मंद होने के कारण ये कण जस के तस वातावरण में ठहर गये और परिणाम हमारे सामने हैं। कुल मिलाकर इस स्थिति के लिए दोषारोपण करने से पहले हमें ये देख लेना चाहिए कि किसी सेट फॉर्मूले पर इसका ठीकरा फोड़ना उचित नहीं होगा।

दिल्ली जैसे 1.9 करोड़ की आबादी वाले शहर में वायु प्रदूषण का कोई एक कारक नहीं है। देश के अन्य शहरों में भी वायु प्रदूषण के यही कारक कम या अधिक मात्रा में उपस्थित हैं जिन्हें सख्त कानून बनाकर नहीं बल्कि उन्हें लागू करके ही नियंत्रित किया जा सकता है।

यह समय की माँग है कि केन्द्र व राज्य सरकारें मिलकर समग्र चिन्तन करें, आम जन जीवन पर ग्रहण लगाने में सक्षम इस समस्या के प्रति सजग हों। आरोप-प्रत्यारोप से इतर सरकारें पूरे समन्वय से काम करते हुए ना केवल सख्त नीतियाँ बनाएँ बल्कि उन्हें सख्ती से लागू भी करें। हर आम और ख़ास से यह अपेक्षित है कि वे पर्यावरण प्रदूषण को जन सरोकार का एक महत्वपूर्ण मुद्दा समझें और प्रदूषण रोकने का हर संभव उपाय करें, सरकार और प्रशासन का सहयोग करें और यदि आवश्यक हो तो संबंधित सरकारों पर जन दबाव भी बनाएं।

लेखिका: अंजलि (@AnjiOptimistic )

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