सीता राम चरित अति पावन – मंडली
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सीता राम चरित अति पावन

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दूरदर्शन पर कालजयी टेलीविजन धारावाहिक ‘रामायण’ का पुर्नप्रसारण हो रहा है। टेलिविजन रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) की गला काट प्रतियोगिता से कल तक बाहर खड़ा दिखता दूरदर्शन टीआरपी के पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर रहा है और नये स्थापित। यह भारतीय मानस पर रामायण और राम कथा के प्रभाव का ज्वलंत उदाहरण है।

महर्षि वाल्मीकि ने महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना संस्कृत में की, महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण कथा जन सामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से अवधी में ‘श्रीराम चरित मानस’ नामक महाग्रंथ लिखा। यह लेखक का व्यक्तिगत मत है जिससे कई लोग असहमत भी हो सकते हैं कि रामायण को विस्तार से जन जन तक पहुँचाने का बहुत बड़ा श्रेय रामानन्द सागर के एपिक टीवी सीरियल ‘रामायण’ को भी जाता है। उनकी शानदार फिल्मी कृतियाँ निश्चित ही उनकी इस अनमोल कृति के आगे बौनी हो गयीं और उनकी कीर्ति अमर हो गयी। ऐसा नहीं है कि इससे पहले रामायण पर फिल्म नहीं बनी थी लेकिन एक धारावाहिक के रूप में रामायण का निर्माण उन फिल्मों से बहुत अधिक कठिन था क्योंकि इसमें अधिक विस्तार के लिए विहंगम शोध की आवश्यकता थी।

रामानन्द सागर ने यह चुनौती स्वीकार की। उन्होंने कालजयी धारावाहिक ‘रामायण’ बनाया और क्या खूब बनाया कि तीन दशक बाद भी उसका पुर्नप्रसारण तीन पीढ़ियों की एक रूचि को सुखद रूप से कॉमन कर रहा है। धारावाहिक के लिए किया गया शोध और पात्र चयन बहुत बढ़िया था। प्रस्तुति लाजबाब थी। तत्कालीन उपलब्ध तकनीक का भी सुन्दर प्रयोग किया गया था। धारावाहिक के संगीत के लिए रवीन्द्र जैन को बस प्रणाम ही किया जा सकता है क्योंकि यह कहना कि ‘रामायण’ का संगीत उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ संगीत था, उनके अप्रतिम संगीत मेधा को थोड़ा कम आँकने जैसा होगा। धारावाहिक के कुछ एपिसोड्स के अन्त में स्वयं रामानन्द सागर द्वारा की गयी कॉमेन्ट्री सच में उस एपिसोड का टेक-होम हुआ करती थी। समग्रता में कहें तो रामान्द सागर ने टीवी के लिए जनमानस में ऐसी धारण बना दी कि टीवी घर की एक आवश्यक वस्तु हो गयी। जिन लोगों के पास टीवी नहीं था, वे भी ‘रामायण’ देखने से नहीं चूके। इसका प्रमाण यह है कि धारावाहिक ‘रामायण’ के प्रसारण समय पर देश में स्वत: स्फूर्त, शांतिपूर्ण और सुखद कर्फ्यू होता था।

भारतीय मानस पर रामायण का मजबूत प्रभाव इसलिए है कि रामायण अनुकरणीय है। सम्बन्धों के सदाचार की महत्ता सीखना हो तो रामायण का हर चरित्र अपने आप मे एक ग्रंथ है। हर पात्र शिक्षा देता है। निषाद राज अपनी मित्रता के लिए जीवन त्यागने को तैयार थे। श्रीराम ने निषादराज को ऊँच-नीच के भेदभाव से परे मित्र का दर्जा दिया। श्रीराम रघुकुल रीति निर्वहन में हँसते-हँसते वन आ गये। भरत ने मिला साम्राज्य ठुकरा दिया और बाद में उन्होंने श्रीराम की चरण पादुका को राजा मानकर उनके प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या का शासन सँभाला। लक्ष्मण अनुज कर्तव्य परायणता की मूर्ति बने रहे, उर्मिला उसमें बाधक नहीं बनीं और त्याग की अद्वितीय प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित हुईं। गुरू वशिष्ठ व आर्यसुमन्त अपना-अपना नीतियोचित कर्म करते रहे। माता कौशल्या और सुमित्रा धर्मपथ पर बने रहे। इन सबके बीच रामायण की एक सीख यह भी है कि देवी कैकेयी का ग्लानि बोध कम महत्वपूर्ण नहीं है। इतना ही नहीं, असुर कुल का रावण और उसका परिवार भी अनेकानेक सीख देता है। रावण की भार्या मन्दोदरी यह जानती थी कि उसका पति पतित है लेकिन वह अपने पत्नी धर्म से कभी विमुख नहीं हुई। मातृ-पितृ सेवा के प्रतिमान श्रवण कुमार का चरित्र स्वयं में एक छोटा-मोटा ग्रंथ है।

मर्यादा पुरुषोत्तम की गाथा रामायण में मर्यादा पर सर्वकालिक सीख यह है कि स्वार्थ में रिश्तों की मर्यादा का हनन न हो। यदि कभी कोई कुपात्र ऐसा करें तो सुपात्र यह सुनिश्चित करें कि मर्यादा हनन की श्रृंखला न बने और हुए डेफिसिट की भरपाई भी हो। कुमार भरत ऐसे ही सुपात्र थे। उन्होंने स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम का योग्य अनुज सिद्ध किया।

भारतीय मानस अकारण राममय नहीं है। राम नाम की महिमा ही ऐसी है। हालाँकि वह राम के पिता थे, फिर भी धर्मात्मा और चक्रवर्ती सम्राट दशरथ तक अंत समय में राम नाम से ही धन्य हुए। देवी अहिल्या का उद्धार श्रीराम के चरण रज से हुआ और इसी को बहाना बनाकर केवट ने श्रीराम की चरण धूलि धोकर पी लिया और अपना जीवन धन्य कर लिया। हनुमान श्रीराम की सेवा करके ही बानर श्रेष्ठ एवं देवता बन गये। इस कलियुग में भी राम भक्त उन्हें संकटमोचक के रूप में याद करते हैं और हर संकट में उनका सुमिरन करते हैं एवं उससे निवृत्त होते हैं। श्रीराम के अतुल्य महिमा का एक कोण यह भी है कि विभीषण श्रीराम की शरण गये। उनके कुल का उद्धार हुआ, वह लंकापति बने लेकिन आज भी उन्हें कुलद्रोह और राष्ट्रद्रोह का पर्याय समझा जाता है।

गुरू महिमा पर रामायण की महान गुरू परम्परा और कौशल में गुरू वशिष्ठ एवं अन्य ऋषियों का सम्मान सर्वविदित है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यातव्य है कि रघुकुल शिरोमणि मर्यादा पुरुषोत्तम सियावर राजा रामचन्द्र सर्वज्ञ थे लेकिन उन्हें भी क्रोध, मोह, कर्म, ज्ञान और मुक्ति जैसे विषयों पर ऋषियों-मुनियों के सतत शिक्षा की आवश्यकता पड़ी। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि हम जैसे मूढ़ राम उपासकों को मनीषियों के ज्ञानामृत कितना वांछित है।

राजनीति के लिए भी रामायण की प्रासंगिकता कम नहीं है। गुरू वशिष्ठ की आज्ञा से, महाराज दशरथ की इच्छा से, समस्त सामन्तों, प्रजा परिषद और राजमहल की सर्वसम्मति से श्रीराम का राज्याभिषेक होना तय हुआ था। मंथरत्व के प्रभाव में कैकेयी ने इस सर्वसम्मति को भंग कर दिया। शेष इतिहास है। कहना ही होगा कि कारण और परिस्थितियाँ चाहे जो भी रहे हों पर सम्पूर्ण न्याय तब भी नहीं हो सका था और न ही पैमाने एक रहे। सीता और उर्मिला दोनों एक ही पिता राजा जनक की पुत्री थीं और एक ही ससुर महाराजा दशरथ की पुत्रवधु – परिस्थिति एक और नियति दो। राजमहल, लक्ष्मण और देवी सुमित्रा ने उर्मिला के लिए समान पैमाना नहीं रखा। कालांतर के कवि और महाकवि भी उनके प्रति लगभग उदासीन ही रहे।

रामायण के पुर्नप्रसारण का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था। देश के करोड़ों परिवार भींगे पलकों के साथ न सिर्फ ‘बुद्धू बक्से’ की नॉस्टेल्जिया में गोते लगा रहे हैं बल्कि इस विकट स्थिति में अपनी-अपनी छोटी व्यक्तिगत स्क्रीन कुछ समय के लिए त्यागकर साझा बड़ी स्क्रीन पर भक्ति, भावना और करूणा के सागर की हिलोरें ले भी रहे हैं। संकट से लड़ने के लिए आवश्यक सामूहिकता के बल के लिए इससे महत्वपूर्ण कुछ हो ही नहीं सकता था। राम नाम से जग से सारे संकट कटते हैं। सिया-राम का नाम और चरित्र इतना मनोहारी, मोहक है कि …

सीता राम चरित अति पावन। मधुर सरस अरु अति मनभावन॥

पुनि पुनि कितनेहू सुने सुनाये। हिय की प्यास बुझत न बुझाये॥

दूरदर्शन और भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय का साधुवाद। दूरदर्शन रामायण का प्रसारण बारम्बार करें। श्रद्धा सहित हम देखेंगे।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

4 thoughts on “सीता राम चरित अति पावन

  1. रामायण वास्तव में हमारे भारतवर्ष के लिए नैतिक शिक्षा के शिक्षक भाँति हैं और रामानंद सागर जी ने इसे धारावाहिक के माध्यम से जन जन तक सहज रूप से पहुँचाने का कार्य किया है|
    “सीता और उर्मिला दोनों एक ही पिता राजा जनक की पुत्री थीं और एक ही ससुर महाराजा दशरथ की पुत्रवधु – परिस्थिति एक और नियति दो। राजमहल, लक्ष्मण और देवी सुमित्रा ने उर्मिला के लिए समान पैमाना नहीं रखा। कालांतर के कवि और महाकवि भी उनके प्रति लगभग उदासीन ही रहे।”
    बहुत सूक्ष्मदर्शी है आप, उपरोक्त पंक्तियाँ इसका प्रमाण है|
    मानव सभ्यता में आदर्श स्थिति भी शत्-प्रतिशत नहीं रही, सदैव सुधार की संभावना अवश्य रही हैं, आप का यह लेख पढ़ कर ऐसा ही अनुभव हुआ|🙏

  2. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है । सपरिवार ‘रामायण’ देख रहा हूं । आंखों से लोर आती है, धीरे से पोछ लेता हूं । रामचरितमानस का पाठ किया है । उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद मैं प्रतिदिन ‘ राम राम …’ का नाम लिखना प्रारम्भ किया है । बहुत ही अच्छा महसूस करता हूं ।
    सीताराम चरित अति पावन – पढ़ कर बहुत प्रसन्नता हुई ।
    सादर

    1. प्रोत्साहन के शब्दों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। मंडली पढ़ा कीजिए।

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