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शोले को लाल सलाम

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इतिहास किसी सटीक सहस्रकोणीय वीडियो पर आधारित नहीं होता। यह तथ्यों के अलावा इतिहासकार की कथा शैली, रूझान, आग्रह और पूर्वाग्रह से मिलकर बनता है। फिल्मकार और कथाकार भी इस प्रवृत्ति से परे नहीं होते। फिल्मकारिता और अभिनय के नये आयाम गढ़ने वाली फिल्म ‘शोले’ भी इस पूर्वाग्रह कथा प्रवृत्ति का अपवाद नहीं थी।

रामगढ़ और उसके आसपास के क्षेत्रों में ठाकुर बलदेव सिंह उर्फ ठाकुर साहब के बढ़ते अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एक दलित युवक गब्बर ने आवाज़ उठाई थी। उसके माता-पिता ठाकुर के खेत में मजदूर थे। दशकों पहले की बात है। इन्दिरा सरकार का बीस सूत्रीय कार्यक्रम गाँव-गाँव तक फ़ैल चुका था। दलित, पिछड़े और शोषित वर्ग के लोगों की तरह गब्बर के पिता को भी इन्दिरा सरकार की प्रगतिशील नीतियों ने समाज में उचित स्थान पाने को प्रेरित किया था।

उस साल फसल बहुत अच्छी हुई थी। पहले से रईस ठाकुर और हरा हो चुका था। किन्तु उसने गब्बर के पिता को गब्बर को स्कूल भेजने के लिए 6 रूपया और 12 आना देने से न सिर्फ मना कर दिया बल्कि उसे बुरी तरह से अपमानित भी किया। गब्बर के माता-पिता यह अपमान सह न सके और वंचित सर्वहारा वर्ग के पास बचे अंतिम उपाय यानी आत्महत्या को गले लगा लिया। वे इस संसार में गब्बर को अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने के लिए छोड़ गये।

दलित होने के बावजूद गब्बर ने एकलव्य के दिखाए मार्ग को अपनाकर स्वयं विभिन्न शस्त्रास्त्र जैसे चाकू, बल्लम, कांता आदि चलाना सीख लिया था। उसकी विशेष रूचि निशानेबाजी में थी जिसका उत्कृष्ट नमूना उसके बाद के जीवन-वृत्त में देखने को मिलता है। गब्बर ने हथियार चलाने में जो प्रवीणता प्राप्त की थी, उसके चलते दलित और पिछड़ी जातियों के युवक उसे गब्बर सिंह कहने लगे। ठाकुर और उसका बुजुर्आ समाज इससे खिन्न हुआ और उन्होंने इसके लिए गब्बर और उसके साथियों को अनेक यातनाएँ दीं।

यह गब्बर की प्रगतिशील सोच ही थी जिसने गाँव की उपज में दलित, वंचित और शोषित समाज को उसका वाजिब हक माँगने और न मिलने पर छीन लेने को प्रेरित किया था। उसकी जनवादी सोच से प्रभावित होकर कई युवक गब्बर के साथ आ गए और गब्बर के नेतृत्व में एक प्रगतिशील, जाति विरोधी और समतावादी दल का गठन हुआ। ठाकुर और उसके समाज ने इस दल के विरूद्ध खूब दुष्प्रचार किया जबकि इस दल का ध्येय ऐसा था कि पचास पचास कोस की दूरी पर भी जब कोई बच्चा रोता था तो इसके पहले कि उसकी माँ कुछ करे, गब्बर उसके लिए अपने गोशाले से दूध भेजवा देता था।

ठाकुर ने शोषक वर्ग में जन्म लिया था।  राज्य पुलिस अधिकारी बनकर भी वह अपनी शोषण की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हुआ था और वह पिछड़ों एवं दलितों के आर्थिक और यौन शोषण में लिप्त रहता था। कई अपराधियों से उसके दोस्ताना संबंध थे जिनका बाद में उसने दलितों की आवाज बनकर उभरे गब्बर के खिलाफ इस्तेमाल किया। यहाँ तक कि उसने दो छुटभैये अपराधियों जय और वीरू को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन रास्ते में डाकूओं से फर्जी मुठभेड़ का नाटक करके न सिर्फ उन्हें सुरक्षित जाने दिया बल्कि सरकारी गोलियों का गबन भी किया। बाद में ठाकुर ने इन्हीं छुटभैये अपराधियों का गब्बर के विरूद्ध प्रयोग किया। किन्तु लठैती के लिए इन्हें अपना पालक-बालक बनाने से पहले जातिवादी ठाकुर पूछ ही बैठा, “कउन जात हो?” उत्तर में कुर्मी-यादव सुनकर सवर्ण श्रेष्ठता का अभिमानी ठाकुर असहज हुआ था।`

दलितों और पिछड़ों पर ठाकुर का अन्याय सिर्फ रामगढ़ तक सीमित नहीं था। हरिराम नाई का जिस तरह उसके अपने पिछड़े और दलित भाईयों के विरूद्ध जासूसी करने में प्रयोग किया गया, वह यह दर्शाता है कि दलितों और पिछड़ों की एकता को कुचलने का हरसंभव प्रयास किया गया। सामन्ती मनोवृत्ति के अंग्रेज परस्त जेलर के जेल में परिन्दे पर नहीं मार सकते थे पर बुजुर्आ हित के घोड़े सरपट दौड़ते थे – जेल के अन्दर घोड़ा हरिराम नाई बनता और जेल के बाहर शूरमा भोपाली जैसे मसखरे सामन्तवाद की चाकरी करते।

ठाकुर के शोषण के पीडितों में एक थे रहीम चाचा। ‘देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक’ होने के बावजूद उन्हें अपने  बुढ़ापे की लाठी और जिगर के टुकड़े को कमसिन उम्र में ही बीड़ी की फैक्ट्री में काम करने भेजना पड़ा। पशु प्रेमी और ताँगेवाली बसंती न होती तो रहीम चाचा का क्या होता। गब्बर इन वंचितों की आवाज था पर ठाकुर ने अपने छल-छद्म से इन्हें गब्बर के विरूद्ध भड़का रखा था। पानी की टंकी से मौसी को ब्लैकमेल करके शुरू करायी गयी वीरू-बसंती की प्रेम कहानी उसी छल-छद्म का हिस्सा थी । ठाकुर अपने स्वार्थ के लिए जय के माउथ ऑर्गन की सुरीली रागनियों को सुनकर भी अनसुना कर दिया करता था।

यदि गब्बर और ठाकुर बलदेव सिंह की इस महागाथा को थोड़ी गहराई से देखा जाए तो वास्तव में यह वर्ग संघर्ष की ऐसी कहानी थी जिसमें सवर्ण हित पोषण के लिए दलितों और वंचितों के उभरते नायक गब्बर को खलनायक बनाकर प्रस्तुत किया गया था।

ठाकुर बलदेव सिंह ने अपने घर पर हथियारों का जखीरा इकठ्ठा कर रखा था। यह जखीरा निश्चित ही सर्वहारा और वंचित वर्ग के दमन में प्रयोग किया जाने वाला था। जब गब्बर सिंह के प्रगतिशील, जनवादी और समतामूलक दल ने इस अकारण की जा रही हथियारबंदी का विरोध किया तो ठाकुर ने अपने रसूख के बल पर उसे झूठे मामले में जेल भेजवा दिया। जेल में दी गयी नाना प्रकार की यातनाएँ भी इस नायक के अदम्य वेग को रोक नहीं सकी। अंतत: वह जेल से भागने में सफल हो गया।

रामगढ़ लौट कर आते ही गब्बर पुरानी कटुता दूर करने के लिए ठाकुर के परिवार से मिलने गया। वहाँ ठाकुर के परिवार वालों ने उस पर जानलेवा हमला कर दिया। इस मुठभेड़ में विजय सर्वहारा वर्ग की हुई। ठाकुर बलदेव सिंह की बहु को छोड़कर उसके परिवार के सभी लोग मारे गये।

बदले की आग में जलते ठाकुर ने अपने लाव-लश्कर के साथ गब्बर और उसके साथियों पर हमला बोल दिया। गब्बर ने आत्मरक्षा में मुँहतोड़ जबाब दिया। इस लड़ाई में ठाकुर अपने दोनों हाथ गँवा बैठा। इसके बाद ठाकुर ने अपने दो पालक-बालक छुठभैये अपराधियों जय और वीरू के सहारे गब्बर से बदला लेने की ठानी। अपने रसूख के दम पर ठाकुर ने पूरे गाँव से गब्बर और उसके साथियों का बहिष्कार करवाया। उसने गब्बर द्वारा बसंती को जबरदस्ती नचवाने का दुष्प्रचार करवाया जबकि सत्य यह था कि गब्बर बसंती को फिल्मों में काम दिलवाने के लिए उसका ऑडिशन करवा रहा था। इतना ही नहीं, ठाकुर ने सांभा और अन्य साथियों पर गब्बर के क्रूर अत्याचार का भी दुष्प्रचार करवाया। गब्बर अपने साथियों को वीरता के लिए प्रेरित करता था। ‘नमक खाया है तो अब गोली खा’ और ‘कितने आदमी थे’ पूर्णत: ठाकुर के हितों से प्रेरित एवं कपोल कल्पित था।

ठाकुर ने जय और वीरू के बल पर एवं अपने पैसों के दम पर गरीबों, वंचितों और दलितों की आवाज को तात्कालिक रूप से दबा ही दिया। कील वाले जूते पहनकर ठाकुर का गब्बर पर किया गया जुल्म मानवाधिकार की सारी हदें लाँघ गया। गब्बर ठाकुर का विजित बना किन्तु बुजुर्आ सामन्तवाद समतामूलक समाज की स्थापना के पावन जनवादी लक्ष्य को अपना विजित नहीं बना सका। गब्बर मर गया। उसके अंतिम शब्द थे …

तुम कितने गब्बर मारोगे

हर घर से गब्बर निकलेगा

लेखक – @cawnporiaah  एवं राकेश रंजन (@rranjan501)

दावात्याग – लेखद्वय द्वारा यह रचना मूल रूप से lopak.org के लिखी लिखी गयी थी जिसे बाद में lopak.in पर भी प्रकाशित किया गया था।

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

12 thoughts on “शोले को लाल सलाम

  1. सर सर्वहारा वर्ग के नुमाइंदे इस आलेख को प्राप्त कर धन्य होंगें। copyright© लगा दीजिए। हो सकता है कोई क्रांति इसी से शुरू कर दे!

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