शिवसेना आत्मघाती कदम की ओर – मंडली
मंडली

शिवसेना आत्मघाती कदम की ओर

शेयर करें

महाराष्ट्र में चुनाव परिणाम आने के करीब 15 दिन के बाद कल बहुत सारे राजनीतिक उठा-पटक, आरोप प्रत्यारोप, शह-मात, बयानबाजी और अटकलबाजी इत्यादि का अंत हो ही गया। उद्धव ठाकरे के पुत्र मोह की वजह से इस बार महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की सरकार नहीं बन पाई। कल देवेंद्र फड़णवीस ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने यह भी साफ़ कर दिया कि शिवसेना के साथ कभी भी ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद बाँटने की बात नहीं हुई थी।

भाजपा के लिए महाराष्ट्र में सरकार नहीं बना पाना निराशाजनक है। उन्हें दुख तो होगा पर शिवसेना के लिए यह एक आत्मघाती क़दम सिद्ध हो सकता है। भाजपा आज जिस स्थिति में है, मोदी जी के नेतृत्व में जिस प्रकार फल-फूल रही है, उसके लिए फिर से चुनाव में उतरकर इस बार से बेहतर प्रदर्शन दुहराना मुश्किल काम नहीं है लेकिन इस बार सरकार न बनाकर, भाजपा को धोखा देकर तथा आदित्य ठाकरे को सीएम बनाने के लिए ज़िद पर अड़कर शिवसेना ने अपने पार्टी के अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल दिया है। भाजपा के लिए यहाँ राष्ट्रीय राजनीति के हित में एक टफ स्टैण्ड लेना जरुरी था। राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों की सत्तालोलुप ब्लैकमेलिंग का शिकार नहीं हो सकते। यह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।

शिवसेना को यह समझना चाहिए कि आज उनके पास न बाला साहब ठाकरे मौजूद नहीं है और न ही भाजपा 90 के दशक की भाजपा है जो छोटे भाई की भूमिका निभाने के लिए तैयार हो जाएगी। ऐसी स्थिति में उसे यह चाहिए था कि वह अपनी पार्टी को मज़बूती देती। जैसे मोदी-शाह की जोड़ी ने भाजपा को अटल-आडवाणी युग से आगे बढ़ा कर पार्टी को नयी पहचान दी, वैसे ही बाला साहब के चेहरे और उनके नाम से आगे बढ़ कर शिवसेना को नयी पहचान दी जाती और आदित्य ठाकरे के चेहरे को विश्वसनीय बनाकर महाराष्ट्र के जनता के सामने पेश किया जाता।

आदित्य ठाकरे पहली बार चुनाव जीते हैं। उन्हें राजनीति का बहुत कम अनुभव है और एक सच्चाई यह भी है कि आज भी काफ़ी लोग शिवसेना को बाला साहब एवं उनके हिंदूवादी चेहरे के नाम पर वोट देते हैं। इस बार कुछ लोगों ने भाजपा से गठबंधन की वजह से भी वोट दिया था (लोकसभा एवं विधानसभा दोनों में)। उद्धव ठाकरे या आदित्य ठाकरे के नाम पर उन्हें उन्हें बमुश्किल 1-2% ही वोट मिले होंगे। ऐसी स्थिति में आदित्य ठाकरे को कोई भी मंत्री पद या उप मुख्यमंत्री का पद संभाल कर महाराष्ट्र की जनता के बीच में जाना चाहिए था और अपने आप को और अपनी पार्टी को इस लायक बनाना चाहिए था कि अगली बार जब वे चुनाव मैदान में जाएं तो लोग बाला साहब या भाजपा की वजह से नहीं बल्कि आदित्य ठाकरे व शिवसेना के नाम पर वोट दें।

इस बार शिवसेना चूक गई। यह चूक जानबूझकर की गयी है और अलोकतांत्रिक है। एक चुनाव पूर्व गठबंधन में छोटा दल चुनाव परिणामों के ठीक बाद अपने विकल्प खुला होने की बात कैसे कर सकता है। यह आदित्य ठाकरे को सींएम बनाने की जल्दबाज़ी थी या कुछ लोगों का ग़लत सलाह या राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी पर इसका खामियाजा शिवसेना को न केवल आने वाले विधानसभा चुनाव में बल्कि BMC चुनाव में भी उठाना पड़ सकता है। फिर भी यदि शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से सरकार बनाना चाहती है तो उसे यह आत्मघाती कदम उठाने की पूरी स्वतंत्रता है। उसके हाथ से हिंदुत्व, विकास, भ्रष्टाचार, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे चले जाएँगे और वो कांग्रेस-एनसीपी की पिछलगू बन कर रह जाएगी। इसमें एनसीपी और कांग्रेस भी अपने कथित सेक्युलर क्रेंडेंशियल का कुन्द कर ही लेंगे।

लेखक: आर सिन्हा (@MrSinha_)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *