मंडली

शास्त्रार्थ स्थल – एक यात्रा वृत्तांत

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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन से होते हुए मैं अपने पिताजी के साथ महेश्वर बस अड्डे पर पहुँचा। तब शाम के करीब छह बजे थे। काले बादल आसमान में मँडरा रहे थे। लंबे सफर और थकाने वाली यात्रा के बाद होटल में चेक-इन किया तब पिताजी के चेहरे पर थकावट साफ दिख रही थी। इसलिए मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ी देर आराम कीजिए, मैं एक जगह हो आता हूँ। पिताजी ने घड़ी की ओर इशारा करते हुए प्रश्नार्थ दृष्टि से मेरी तरफ देखा और बिना कुछ पूछे मेरे साथ चलने के लिए उठ खड़े हुए। होटल से बाहर निकलते ही मैंने उन्हें अपना प्लान बताया।

महेश्वर मध्यप्रदेश राज्य के हृदय में बसा एक प्राचीन नगर है। किसी समय में सहस्रार्जुन की राजधानी रहा महेश्वर, कुछ सौ वर्ष पूर्व पुण्यात्मा अहिल्याबाई होल्कर के धर्म कार्यों का केन्द्र रहा है। आज एक छोटे से गाँव के रूप में सिमट कर रह गया है। मैं और पिताजी गाँव की गलियों से होते हुए महेश्वर के पूर्वी हिस्से में नर्मदा तट तक पहुँच गए। यहाँ कुछ मंदिर बने हुए थे लेकिन लोगों की चहल-पहल कम थी। मुझे बस इतनी ही जानकारी थी के शंकराचार्य और मण्डन मिश्र का शास्त्रार्थ स्थल नर्मदा और महिष्मति नदियों के संगम पर स्थित है और इस संगम के एक ओर जलेश्वर महादेव विराजमान हैं तो दूसरे छोर पर कालेश्वर महादेव का मंदिर है। जलेश्वर महादेव के करीब सप्तमातृका का छोटा सा मंदिर है। इसके उत्तर दिशा में शास्त्रार्थ स्थल है। बस यही शास्त्रार्थ स्थल हमारा गंतव्य स्थान था।

वैसे आदि शंकराचार्य और मण्डन मिश्र के ऐतिहासिक शास्त्रार्थ स्थल के बारे में काफी मत-मतांतर हैं। कुछ लोगों के अनुसार यह जगह बिहार में स्थित है लेकिन श्री रामकृष्ण मठ के स्वामी अपूर्वानंद जी जैसे जानकारों के अनुसार महेश्वर ही सही शास्त्रार्थ स्थल है। दुर्भाग्य से गूगल मैप पर भी इस जगह का नामोनिशान नहीं था। इसलिए मेरे लिए यह जगह ढूँढना और भी मुश्किल था। नदी तट पर कुछ लोगों से मैंने शास्त्रार्थ स्थल के बारे में पूछताछ शुरू कर दी लेकिन यहाँ किसी को इस जगह के बारे में पता नहीं था। किसी ने सुझाव दिया कि जगन्नाथ मंदिर के गिरि महाराज इस जगह के बारे में जानकारी रखते हैं।

जगन्नाथ मंदिर थोड़ी ऊँची जगह पर बना बड़ा मंदिर था। अंधेरा गहराता जा रहा था और साथ ही मेरी गंतव्य तक पहुँचने की संभावनाएँ भी कम होती जा रही थी। मैं एक साथ तीन-तीन सीढ़ियाँ फाँदते हुए उपर पहुँचा और मन्दिर के महाराज से मिला। जैसे ही मैंने उनसे शास्त्रार्थ स्थल के बारे में पूछा, महाराज की आँखों में चमक आ गई। वो मेरे चेहरे को ध्यान से देख रहे थे मानो कुछ ढूँढ रहे हों। उन्होंने कहा कि उस जगह पर कोई पर्यटक नहीं जाता। जब उन्हें पता चला कि मैं आचार्य शंकर के दर्शन और सनातन धर्म के इतिहास में रूचि रखता हूँ तो उनके चेहरे पर रौनक आ गई। उन्होंने बताया कि नदी तट पर थोड़ा आगे जाने पर सात-माता मन्दिर है। सप्तमातृका मन्दिर को ही यहाँ के स्थानीय लोग सातमाता मन्दिर कहते हैं लेकिन वहाँ तक जाने का रास्ता अस्पष्ट और दुर्गम है।

इतनी जानकारी प्राप्त करने के बाद मेरा वहाँ तक पहुंचने का निर्णय और भी दृढ़ हो गया। जगन्नाथ मंदिर से प्रसादोत्साह ले कर त्वरा से मैं अपने पिताजी के साथ आगे बढ़ा। अगस्त के बादल घिरते जा रहे थे, हल्की सी बारिश भी शुरू हो चुकी थी। सुनसान से नर्मदा तट पर अंधेरे में हम दोनों आगे बढ़े। हमारी एक ओर कल-कल बहती नर्मदा नदी थी तो दूसरी ओर घनी जटाओं से भरे पेड़ थे। एक तरह से देखा जाए तो यहाँ पक्का रास्ता था ही नहीं, बस नदी तट पर कुछ उबड़-खाबड़ जगह थी। जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए बस्ती पीछे छूटती गई और अंधेरे के साथ साथ बारिश भी बढ़ती गई। कुछ देर चलने के बाद हमें कुछ शोर सुनाई दिया, मोबाइल फोन पर गाने बज रहे थे। इससे पहले कि अंधेरे में हम दोनों कुछ समझ पाते कि अचानक से नशे में धुत्त दो आदमी हमारे सामने आ खड़े हुए। वो दोनों विकृत और वीभत्स हरकतें कर रहे थे। नदी तट पर और दो लोग मोबाइल फोन पर गाने बजाते हुए नाच रहे थे। महेश्वर पवित्र जगह होने की वजह से यहां शराब की बिक्री नहीं होती, ये लोग यकीनन बाहर से शराब ले कर आए थे और नदी तट पर एकांत में नशे का मजा लूट रहे थे।

यात्राओं के दौरान ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए मैं हमेशा एक छोटा सा धारदार शस्त्र मेरे पास रखता हूँ जिसका आज तक उपयोग करने की जरूरत नहीं पड़ी था। मेरा दाहिना हाथ जीन्स के पिछले पॉकेट में रखे शस्त्र पर था। तभी नदी तट पर बैठे नशेड़ियों ने उन दोनों को आवाज लगाई और वे दोनों नाचते हुए हमारी आँखों से ओझल हो गये। पिताजी ने मेरी तरफ देखा। अब मेरा भी आगे बढ़ने का निश्चय डगमगा रहा था लेकिन पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ा और हम आगे बढ़े। मेरी यात्राओं की सफलता में पिताजी का यही प्रोत्साहन सबसे बड़ा प्रेरक-बल रहा है।

अब अंधेरा इतना घना हो चुका था कि आगे का रास्ता भाँप पाना भी मुश्किल हो रहा था। बारिश की वजह से मोबाइल टॉर्च का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता था। मैं पिताजी के लिए चिंतित था। तभी रास्ता पीछे से आ रहे किसी दुपहिया वाहन की हेडलाइट से प्रकाशमान हुआ। इस वीरान जगह पर अंधेरे में कौन हो सकता है, यह सोचते हुए हमने पीछे देखा तो एक पचास-पचपन साल के महाशय हमारे पास आ रुके। यह महाशय देवदूत बनकर आए थे। उन्होंने बताया कि वह भी किसी काम से सात-माता मन्दिर की ओर ही जा रहे हैं। मैंने पिताजी को उनकी मोटरसाइकिल पर रवाना किया और खुद पैदल ही आगे बढ़ा।

आसपास पेड़-पौधों के झुरमुट में चमकते हुए जुगनु और झींगुर की चर-चर आवाजें आ रही थी। चलते हुए मुझे ऐसा आभास हो रहा था मानों मेरी दोनों ओर कुछ आकृतियाँ मंडरा रही हैं। इससे पहले कि मैं कुछ समझता, मेरे पैरों पर से रेंगते हुए कुछ भारी सी चीज गुजर गई। मेरे हृदय की धड़कन तेज हो गई। इतनी बारिश के बावजूद मेरा शरीर पसीने से लथपथ हो गया। मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। तभी मेरी बाईं ओर से एक परछाई सी आकृति गुजरते हुए बोली, “मनो नाम महाव्याघ्रो।” मैंने झटके से उस ओर देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं था। यह परछाई मेरे लिए एक संदेश मात्र थी। मैं समझ चुका था कि कुछ तो ऐसी शक्ति है जो आज मुझे इस जगह तक पहुँचाना चाहती हैं। मैंने अपनी गति बढ़ाई। थोड़े आगे बढ़ते ही खुली जगह में एक छोटे-से मकान में बत्ती जल रही थी और आंगन में मेरे पिताजी खड़े थे। मेरा मन रोमांच से भर गया। हाँ, मैं शास्त्रार्थ स्थल तक आ पहुंचा था।

अंधेरे में मैं इतना ही समझ पाया के वह कोई मन्दिर नहीं था, बस एक छोटा सा मकान था जहाँ पूजाघर में एक वृद्धा पूजा कर रहीं थीं। वो मुस्कुराईं और इशारे से हमें बैठने के लिए कहा। वहीं पर पुरानी सी खटिया पर एक वृद्ध भोजन कर रहे थे। कुछ देर बाद माँ जी की पूजा संपन्न हुई, मैं अभी तक समझ नहीं पाया था कि इस छोटे से मकान में मुझे क्या खजाना मिलने वाला है। माँ जी ने मेरी ओर विस्मय से देखा और बोलीं “बेटा, तुम्हें इस जगह के बारे में किसने बताया? इस जगह के बारे में लोगों को जानकारी भी नहीं है।” अब मुझमें उनके प्रश्नों के उत्तर देने जितना धैर्य नहीं बचा था। मेरी उत्सुकता चरम पर थी। मैंने सीधे ही उनसे शास्त्रार्थ स्थल के दर्शन कराने के लिए विनती की। उन्होंने बगल वाले कमरे का दरवाजा खोला, वह एक सामान्य सा छोटा कमरा था और अंदर का दृश्य देखते ही मैं आश्चर्यचकित हो गया। पिताजी का चेहरा भावविभोर हो गया और हम दोनों के हाथ सहज ही प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए। वहां तीन चरण-कमल बने हुए थे। वहां आचार्य शंकर के चरण-चिन्ह थे और पास में ही मण्डन मिश्र और उनकी धर्मपत्नी उभयभारती के चरणों की छाप थी।

मेरे मानसपटल पर शंकराचार्य दिग्विजय का वो किस्सा तैरने लगा। महापंडित मण्डन मिश्र का निवास स्थान ढूँढते हुए शंकराचार्य महिष्मती और नर्मदा के पवित्र संगम पर पहुँचे। मण्डन मिश्र पूर्व मीमांसा दर्शन के विद्वान थे। उनके घर के आंगन में पिंजरे में बन्द तोता-मैना भी शास्त्रों का गान करते थे। जब शंकराचार्य और मण्डन मिश्र का शास्त्रार्थ हुआ तब मण्डन मिश्र की पत्नी उभयभारती को निर्णायक की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस शास्त्रार्थ में शंकराचार्य की जय हुई।

लगभग आधे घंटे तक हम वहाँ रूके। मैंने कुछ तस्वीरें लीं। माँ जी ने कुछ फलों का प्रसाद दिया और हम दोनों शंकराचार्य जी की उस पुण्य स्मृति को प्रणाम कर वापसी के लिए प्रशस्त हुए। बाहर बादल छँट चुके थे। बारिश रुक गई थी। पूर्णिमा के चंद्र के शीतल प्रकाश में नर्मदा के कल-कल बहते जल ने वातावरण में उर्जा का संचार कर दिया था।

लेख के आवरण चित्र ने शास्त्रार्थ स्थल का प्रयुक्त फोटो स्वयं लेखक ने लिया है।

लेखक पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संदर्भों के पार्श्व में सामयिक और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढने की कोशिश करती कहानियाँ लिखते हैं। उनके कुछ वृत्तांत उनकी अनवरत चलने वाली यात्राओं के भाग हैं। इसके अलावा उनकी रुचि लघुकथा, भारतीय मंदिर स्थापत्य और ललित कला से संबद्ध लेखन में भी है। उनकी शब्दावली में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त गुजराती और मराठी का पुट भी होता है। लेखक पेशे से एक फ्रीलांस आइटी कंसलटेंट और डेटाबेस आर्किटेक्ट हैं।

6 thoughts on “शास्त्रार्थ स्थल – एक यात्रा वृत्तांत

  1. अद्भुत!अगली महेश्वर यात्रा में ये स्थल में अवश्य देखूंगी!

  2. पढ़ कर ऐसा लगा की मानों सारे दृश्य आँखों के सामने ही चल रहे हैं, उफ़्फ़फ़ 🤗🙏

  3. Bahut accha likhte hai bhaiya aap…Esa lag rha tha jese sath me hi h hum aapke…
    Maheshwar gayi hu pr afsos is bare me kabhi nahi suna…

  4. Excellent travelogue by Trishar! Narratives describes vivid details as if it is in front.
    Simple explanation well written. Wish well to great thoughts.

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