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शाहीन बाग: नागरिक सुविधाएं कब तक बंधक बनी रहेंगी

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शाहीन बाग में महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों प्रदर्शनकारी पिछले लगभग 35 दिनों से आठों पहर धरना दिए बैठे हैं। प्रदर्शन स्थल पर सर्वधर्म प्रार्थना चल रही है। खीर पक रही है, बिरयानी बँट रही हैं। लोहड़ी मनायी जा रही है। तिरंगे लहरा रहे हैं, क्रांतिकारी काव्य-पाठ हो रहा है। कल बाजाप्ता मुशायरा भी आयोजित हो रहा है। दिल्ली-नोएडा को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क महीने भर से बंद पड़ी है। दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों को नागरिक सुविधाओं का हवाला देकर कम से कम एक रास्ता खाली करने के लिए मिन्नतें कर रही है। प्रथम दृष्ट्या ऐसा लगता है कि देशभक्ति से ओत-प्रोत साम्प्रादायिक सौहार्द के बीच सत्याग्रह का स्वर्णिम दौर आ गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है?

पूरा जमावड़ा संसद से पारित नागरिक संशोधन कानून के विरुद्ध है, जिसका अल्पसंख्यकों सहित भारत के एक भी नागरिक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होने वाला। तख्तियाँ उस एनआरसी के विरोध में भी दिख रही हैं, जिस पर सरकार ने यह कई बार स्पष्ट किया है कि अभी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया और न ही उस पर विचार हुआ है। तो फिर विरोध भला क्यों हो रहा है? सीएए/ एनआरसी के विरोधी शाहीन बाग की भीड़ को स्वत: स्फूर्त बताते नहीं थक रहे। वहीं ऐसी भी खबरें हैं कि प्रदर्शनकारियों को दिहाड़ी पर लाया जा रहा है और प्रदर्शनकारी शिफ्ट ड्यूटी कर रहे हैं। महिलाएँ घर का काम निबटाकर प्रदर्शन स्थल पर ऐसे आ रही हैं, जैसे वो कार्यस्थल ही हो। वहीं शाहीन बाग के कई स्थानीय निवासियों ने अपना रोजी-रोजगार चौपट होने की शिकायतें भी की हैं।

लहराते तिरंगों के बीच ‘आजादी’ की भी बात हो रही है। आशा है कि आजादी का यह जुमला सिर्फ सरकार की तथाकथित प्रताड़ना से आजादी तक ही सीमित हो। संसद के बनाए कानून के विरुद्ध प्रदर्शन में देशभक्ति थोड़ा अटपटा लगता है। कानून से असहमति के विधायी रास्ते भी हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में इस पर विचार करने के लिए याचिकाएँ डाली गयी हैं। उस पर सुनवाई और न्यायालय के मत की ही प्रतीक्षा क्यों नहीं कर लेते ये लोग? असहमति और विरोध के तार दिल्ली विधान सभा के आगामी चुनाव से भी जुड़े हो सकते हैं।

कहा जा रहा है कि पंजाब से किसान अपना घर-द्वार और खेती-किसानी छोड़कर दिल्ली में संघर्ष कर रही अपनी बहनों का साथ देने दिल्ली आए हैं। शाहीन बाग में उनके संग लोहड़ी मनाकर प्रदर्शनकारी उनका धन्यवाद ज्ञापन कर रहे हैं। यह भाईचारा और सौहार्द टू मच ही नहीं बल्कि मैनुफैक्चर्ड भी प्रतीत होता है। दूसरी ओर मीडिया एवं बॉलीवुड अथवा मनोरंजन व्यवसायों से संबद्ध कुछ लोग शाहीन बाग़ के आंदोलन को सभी धर्मों से जोड़ कर दिखाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह बात भी निराधार नहीं है कि विभिन्न भित्ति पत्रों में स्वास्तिक के टूटने से लेकर महिलाओं के लिए एक विशेष ड्रेस कोड तक कहीं न कहीं एक धर्म के लिए सॉफ्ट कार्नर एवं दूसरे धर्म के प्रति घृणा का भाव भी दिखता है। वहीं खुद को समाज का सबसे जागृत और समझदार हिस्सा बताने वाले लोग यह शायद नही समझ पा रहे कि उन्हें धरने पर बिठा खुद विदेशों में पैसा कमाने भाग रहे मसखरों से लेकर व्यंग्यकार तक सिर्फ और सिर्फ एक प्रोपोगंडा के तहत उन्हें बेवकूफ बना रहे हैं या वे स्वयं जानबूझकर बेवकूफ बन रहे हैं।

2019 के लोक सभा चुनावों के समय सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, वीडियो में कांग्रेस की एक बड़ी नेत्री को कुछ बच्चे घेरे खड़े थे और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के लिए अभद्र नारे लगा रहे थे। हाल ही में कुछ बच्चों की वीडियो सोशल मीडिया पर पुनः वायरल हुई हैं। वीडियो में कुछ बच्चों ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए ऐसी बातें कहीं जो विचलित करती हैं। ब्रेनवॉशिंग में सपनों का डिटेंशन सेन्टर भी बन गया है और उसके आचार भी तैयार कर दिए गए हैं। तभी तो वीडियो में एक बच्ची यह कह रही है कि डिटेंशन सेन्टर में सिर्फ एक समय खाना दिया जाएगा और मेरे परिवार वालों को मुझसे दूर कर दिया जाएगा। यह ठीक है कि लोकतंत्र सिर्फ बहुमत का शासन नहीं है और उसमें असहमति को भी सुनने की जगह होनी चाहिए पर असहमति की अभिव्यक्ति का भी एक तरीका होता है, एक सीमा होती है। सरकार का या किसी कानून का विरोध करने के लिए घृणा निर्माण का यह तरीका दूर का कोई खतरा तो नहीं दिखा रहा? देश को इस पर विचार करना चाहिए।

प्रदर्शनकारियों के पक्ष में एक बात तो कही ही जा सकती है कि विरोध के सॉफ्ट उद्देश्य चाहे जो भी हों पर यह अब तक शांतिपूर्ण है। हाँ, प्रदर्शन ने नागरिक सुविधाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके बावजूद पुलिस ने अब तक धैर्य का परिचय दिया है। हालाँकि आजकल न्यायालय तमाम मुद्दों पर जनहित में स्वत: संज्ञान लेते हैं लेकिन इस मामले पर माननीय उच्च न्यायालय ने कोई साफ आदेश नहीं दिया और शाहीन बाग़ को दिल्ली पुलिस पर छोड़ दिया। प्रदर्शन कर रहे लोगों के लिए केंद्र सरकार दमनकारी है, शाहीन बाग पर केन्द्र के अब तक का ट्रीटमेंट कुछ लोगों को धैर्य लग सकता है तो कुछ लोगों को सरकार की अकर्मण्यता दिखेगी लेकिन सरकार और पुलिस के लिए फैसला इतना आसान भी नहीं है। फिर भी उन्हें कुछ तो करना ही होगा, सड़क कितने दिनों तक जाम रहेगी? या तो प्रदर्शनकारी स्वयं हटें या थककर हट जाएं या पुलिस उन्हें हटाए, आगामी गणतंत्र दिवस की सुरक्षा में किसी संभावित व्यवधान के नाम पर ही सही।

मंडली का सबसे युवा सदस्य होने के नाते लेखक को मंडली का प्रशिक्षु लेखक कहा जा सकता है। वह अपने छोटे अनुभव को अवलोकन के धागे में पिरोकर कहानियाँ और संस्मरण लिखते हैं। राजनीति में संघ से जुड़े मामलों से उनका गहरा अनुराग है। लेखक सूचना प्रौद्योगिकी अभियांत्रिकी के छात्र हैं और साथ ही वह मंडली के तकनीकी मामले भी देखते हैं।

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