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‘साहिब बीबी और गुलाम’ के गुलाम

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विमल मित्रा के एक क्लासिक उपन्यास पर आधारित ‘साहिब बीबी और गुलाम’ पिछली सदी की कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मो में से एक है। फिल्म ५० के दशक में बंगाल के अभिजात्य वर्ग के पतन और औपनिवेशिक बंगाल में श्रमिक वर्ग के उदय पर बनायी गयी थी।

फिल्म का मुख्य आकर्षण छोटी बहू और गुलाम के बीच संबंधों की अस्पष्टता थी। अंत तक आप सोचते ही रह जाते हैं कि क्या किसी और लड़की के साथ प्यार होने के बावजूद एक गुलाम भूतनाथ ने कभी भी अपनी मालिकिन छोटी बहु को पसंद किया था। सवाल फिर वही उठता है कि क्या एक पुरुष-महिला संबंध को हमेशा एक स्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता होती है?  कभी-कभी इसे बिना किसी स्पष्ट परिभाषा के साथ समझाया भी जा सकता है और यही इस फिल्म की खूबसूरती थी।

यह गुरुदत्त की बनायी गयी शानदार फिल्मो में से एक मानी जाती है जिन्होंने Mr and Mrs.1955 (1955), प्यासा (1957), कागज़ के फूल (1959), और चौदहवीं का चाँद (1960) जैसी उम्दा फिल्में बनायी हैं। दरअसल ‘कागज़ के फूल’ के व्यावसायिक रूप से असफल होने के कारण गुरु दत्त को बाद की किसी भी फ़िल्म में गुरुदत्त का नाम निर्देशक के रूप में नहीं दिया गया था, लेकिन आम तौर पर यह माना जाता है कि चौदहवीं का चाँद (मोहम्मद सादिक द्वारा निर्देशित) और साहिब बीबी और गुलाम (अबरार अल्वी द्वारा निर्देशित) दोनों पर ही गुरुदत्त की छाप है। सिनेमेटोग्राफर वी के मूर्ति जो कि प्यासा और कागज़ के फूल के भी सिनेमैटोग्राफर थे , उनका इस्तेमाल गुरुदत्त साहब से बेहतर किसी ने नहीं किया है। ‘ना जाओ सैयां …’ एक ऐसा यादगार गीत है जिसे गुरुदत्त साहब और मूर्ति जी ने एक छोटे से कमरे में सिर्फ एक पलंग पर मीना कुमारी के चेहरे पर फोकस रखकर कम से कम रौशनी में शूट कर डाला था। आज ऐसा कारनामा कौन कर सकता है ?

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1962 में रिलीज़ हुई फिल्म में तो वैसे कई चरित्र थे किन्तु भूतनाथ जो कि हवेली की मालकिन के सेवक (गुलाम)  का चरित्र विस्मयकारी था जो अंत में मुख्य किरदार के रूप में उभरता है।

बात उन दिनों की है जिन दिनों गुरूदत्त फ़िल्म्स के बैनर में फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ की तैयारियाँ चल रही थीं। पिछली फिल्म फ्लॉप हो चुकी थी और निजी ज़िंदगी में हो रही उथलपुथल से भी गुरुदत्त बेहद परेशान थे। फ़िल्म की तरफ़ वो बिलकुल ध्यान नहीं दे पा रहे थे।

यूँ तो फ़िल्म की पूरी कास्ट फ़ाइनल हो चुकी थी लेकिन मुख्य किरदार भूतनाथ के चरित्र के लिए नाम तय करने में काफी वक़्त लग रहा था। इस फिल्म के डायरेक्टर अबरार अल्वी के गुरुदत्त ने शशि कपूर का नाम सुझाया। उन दिनों शशि कपूर का नया नया करियर खस्ता हाल में था और उनकी सभी 3-4 फ़िल्में फ्लॉप हो चुकी थीं। गुरुदत्त के कहने पर अबरार अल्वी ने शशि कपूर को मिलने के लिए बुलाया।  गुरूदत्त और अबरार अल्वी दोनों शशि कपूर का इंतज़ार करते रहे, करते रहे। शशि कपूर आये लेकिन वो तय समय से करीब तीन घण्टे बाद पहुँचे। गुरूदत्त और अबरार अल्वी दोनों को ही शशि कपूर का ये रवैया ठीक नहीं लगा। उन्हें लगा, कि जो कलाकार सिर्फ़ मीटिंग के लिए ही इतना देर से आया हो, शूटिंग के दौरान उसका क्या हाल होगा?  और इस तरह शशि कपूर के हाथ से वो रोल निकल गया।

इसके बाद विश्वजीत को बुलाया गया था लेकिन विश्वजीत कांट्रेक्ट की उस शर्त को देखकर पीछे हट गए थे जिसके मुताबिक़ वो गुरूदत्त फ़िल्म्स से बाहर की फ़िल्में नहीं कर सकते थे। यदि विश्वजीत उस शर्त को  मंज़ूर कर लेते तो इस मशहूर गीत ‘कहीं दीप जले दिल …’ में आप किसी और कलाकार को देख रहे होते।
और फिर आख़िर इस कालजयी रोल ‘भूतनाथ’ को मजबूरन ख़ुद गुरुदत्त को ही करना पड़ा और वो हमेशा के लिए अमर हो गए।

बात इसी रोल की नहीं है। ऐसे कई रोल हैं जिन्हें करने वाला कोई और था पर हिस्से किसी और के आया।
वो हैं ना कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम …

लेखक मुख्य रूप से भावनात्मक कहानियाँ और मार्मिक संस्मरण लिखते हैं। उनकी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में होती हैं और उनमें बुंदेलखंड की आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक का मानना है कि उनका लेखन स्वयं की उनकी तलाश की यात्रा है। लेखक ‘मंडली.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी रचनाएँ 'ऑप इंडिया' में भी प्रकाशित होती रही हैं। उनके प्रकाशित उपन्यास का नाम 'रूही - एक पहेली' है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मैं मुन्ना हूँ' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। लेखक एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत हैं।

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