सनसनी समाज में है चैनल में नहीं – मंडली
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सनसनी समाज में है चैनल में नहीं

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मुझे ऐसा लगता है कि संवाद सात्विक शब्द है और बहस तामसिक। संवाद से सौहार्द उत्पन्न होता है। बहस में हिंसा के महीन अवयव होते हैं। हाँ, कुछ बहस विचारोत्तेजक भी होते हैं और वे गाहे-बिगाहे कोई निष्कर्ष भी दे जाते हैं। समाज में संवाद की आवश्यकताएँ और संभावनाएँ अनन्त हैं लेकिन प्रवृत्ति से समाज बहस प्रेमी होता है। समाज में विरले होते संवाद से सृजन होता है। दिन-रात होने वाली ‘अंडा पहले या मुर्गी’ मार्का बहस से आए दिन सिफुटौव्वल होता है।

साहित्य की तरह मीडिया भी समाज का दर्पण है। विशेष रूप से टीवी समाज का दर्पण ही नहीं बल्कि भोंपू भी है। टीवी समाचार चैनलों की आठों पहर मची सनसनी की होड़ पर शुद्धतावादी आए दिन टेसुए बहाते हैं। वे शायद ही कभी यह देखते हैं कि हमारा समाज बाढ़ की विभीषिका और कोरोना जैसी महामारी में भी सूचना के नाम पर परोसी जा रही अफवाहों पर कितने चटखारे लेता है। टीवी समाचारों के ब्रेकिंग न्यूज से खिन्न लोगों को यह भी देखना चाहिए कि हमारे समाज में छोटी-बड़ी घटना को बिना देखे आँखों देखा हाल सुनाने की होड़ ही नहीं होती बल्कि उसमें मिर्च-मसाला सहित गरम मसाला डालने की प्रतियोगिता भी रहती है।

टीवी समाचार चैनल पर नाग-नागिन कथा दिखाई गयी। लोगों ने चाव से देखा, टीआरपी बल्लियों उछल गयी। शुद्धवादी बिदक गये। इस शुद्धता में मिलावट तब दिखती है जब वे ‘नगीना’ और ‘निगाहें’ वाले हरमेश मल्होत्रा पर नहीं भड़कते। एक पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा अपने विदेशी अतिथियों को साँप, सँपेरा और बीन का खेल दिखाए जाने पर भी भृकुटियाँ नहीं तनीं – समरथ को नहिं दोषु गुसाईं। यह अकारण नहीं था कि पश्चिम वाले दशकों तक भारत को सपेरों और हाथियों का देश कहते रहे। झुंड में देश आज ही हाँका जा रहा है। कभी इधर भी तो ध्यान जाए।

स्वर्ग का रास्ता लाइव दिखाने वाले चैनल ने हमें कौन सा ठग लिया। चैनल दर्शकों को जीवित ही स्वर्ग के मुहाने तक तो ले ही गया था। बदले में गरीब ने चार पैसे की टीआरपी बना ली तो पेट में मरोड़ होने लगा। नेता जी स्वर्ग तक सीढ़ी लगा देने का वादा हर चुनाव में करते हैं। सीढ़ी लगती है क्या? चैनल के संवाददाताओं में इतनी योग्यता है कि वह चाहता तो नरक का द्वार भी दिखा सकता था। वर्तमान परिस्थितियों में परलोक का ट्रेलर देखना डिजर्व करने वाले थोक में हैं पर चैनल ने टीआरपी का लोभ संवरण करते हुए ऐसा नहीं किया।

टीवी डिबेट पर आजकल टीवी डिबेट से भी अधिक गर्मागर्म डिबेट चल रही है। सत्य यह है कि पब्लिक यह माँगती ही नहीं बल्कि ऐसा करती भी है। ‘बिना फीस की बहस’ और ‘सुत न कपास जुलाहे से लठ्ठ्मलठ्ठा’ जैसे मुहावरे समाज के बहस पसंद होने की पुष्टि करते हैं। टीवी डिबेट्स में कुछ अच्छे लोग जाते हैं, कुछ डिबेट्स अच्छे भी होते हैं और कुछ अच्छे एंकर्स भी होंगे लेकिन दर्शक वही डिबेट देखते हैं जिसके पैनलिस्ट्स और एंकर्स का औसत निकाल दिया जाए तो परिणाम निकलेगा – मुर्गी चोर। गुणवत्ता की ऐसी की तैसी, टीवी वही दिखाएगा जो दर्शक देखना चाहते हैं।

टीवी का डिबेट छोड़िए, कोई भी बहस दो अलग मत रखने वालों के बीच ही होगी। जितनी अलग पृष्ठभूमि और जितना अलग मत होगा उतनी ही स्तरीय बहस होगी। इस लिहाज से योग संसार के गुरू और भोग भूमि की तारिका के बीच की हुई ऐतिहासिक बहस कतई क्रांतिकारी थी।

एक बहस में एक दल के नेता हारने लगे। नेता जी अंतिम दम तक हार न मानने वाले योद्धा थे। दल को हार के दलदल में धँसने से बचाने के लिए उन्होंने दर्शक दीर्घा में बैठे अपने दल के समर्थकों का आह्वान किया। समर्थक मंच पर चढ़ गये। दूसरे दल के समर्थक भी आ पहुँचे। दोनों नेताओं का बहस निरर्थक हो रहा था। समर्थकों ने अपने बाहुबल प्रदर्शन से उसे सार्थक कर दिया। इस बहस की आलोचना करने वाले बहुत थे। मैं उन्हें लोकतंत्र विरोधी मानता हूँ क्योंकि लोकतंत्र में जनता नेताओं की कारगुजारियों पर सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रह सकती। उसे भी उसमें प्रत्यक्ष रूप से भाग लेना चाहिए, भागने से कब तक बात बनेगी।

एक नेता जी ने अपने विरोधी को गिलास फेंककर मारा दिया। विरोधी नेता का सिर फटने से बच गया पर उन्होंने फरमाया, “मेरा फोन पानी में भींग जाता या गिलास से टूट जाता तो?” मेरा मानना है कि गिलास फेंकने वाले नेता जी का निशाना कमजोर नहीं था। उन्होंने जान बूझकर अपने प्रतिद्वंद्वी का सिर बचा लिया। उद्देश्य सिर्फ बहस का माहौल बनाना था। युद्ध के पहले डंके भी तो बजते हैं। चैनल के एंकर को इस बनते माहौल में बाधा उत्पन्न करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्होंने प्रोग्राम को चलने दिया। चैनल के मालिक ने भी अपने एंकर की कर्तव्यपरायणता पर खुश होकर उसकी एंकरीय स्वायत्तता का सम्मान किया। एक्शन मिश्रित इस बहस को जनता टीवी पर देखकर संतुष्ट नहीं हुई, विभिन्न माध्यमों पर इसे कई दिनों तक देखकर लोग स्वयं को, एंकर को, चैनल को और बहस की प्रवृति को धन्य करते रहे।

टीवी पर यह आरोप है कि वह मूल मुद्दे से ध्यान भटकाता है, कृत्रिम मुद्दे गढ़ता है और वह गोदी मीडिया हो गया है। आरोप लगाने वालों से यह पूछा जाए कि मूल मुद्दा है क्या और इस पर कौन टिका है। सत्तर साल से अधिक के लोकतंत्र में जनता लत्तर-बहत्तर और भावनात्मक मुद्दों पर ही वोट करती रही। मीडिया पर गोदी मीडिया होने के आरोपों के बीच समाज का लघु रूप सोशल मीडिया गोदी से छरपकर कंधे पर जा बैठा और यह किसी से छिपा नहीं कि वह कितनी बातें असल मुद्दों की करता है। गोदी मीडिया एकपक्षीय हो गया है। यह ऐसे कहा जाता है जैसे मीडिया पहले तटस्थ था या यह भविष्य में तटस्थ हो जाएगा। मीडिया पर टीआरपी लोलुप होने का आरोप कम से कम उस समाज थोथा ही है जो वोटों की लगती बोली में अपना लाभ देखकर थाली के बैंगन जैसा बदल जाता है।

लब्बोलुआब यह है कि कीट जनित व्याधि धरती को लगी है। हम धरती पर उगने वाले बाँस और उस बाँस से बनने वाली बाँसुरी में रोग के लक्षण देख रहे हैं। हमें धरती के कीटाणु मारने होंगे, धरती पर उगने वाले बाँस स्वस्थ हो जाएँगे और उनसे बनने वाली बाँसुरी सुरीली। धरती को कीटाणु मुक्त करना कठिन है, बाँस और बाँसुरी को कोसना आसान। मर्जी हमारी कि हम कोसकर संतुष्ट हैं या दुरूह चुनौती स्वीकार कर कुछ कर दिखाएँगे।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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