साहुन – मंडली
मंडली

साहुन

शेयर करें

(भाग 1)

सुरेश: साहुन भउजी आज कहाँ बिजली गिराते हुए चली जा रही हो?

साहुन: साथ चलो, बताती हूँ।

सुरेश: बाबू ठाकुर वाले के हाथ बुलावा भेजोगी तब आऊंगा।

सुरेश की पत्नी: साहुन बूढा गयी हैं। क्या बेचारी की मरने की उम्र में उल्टा सीधा मज़ाक करते हो।

सुरेश: मज़ाक क्या तुम खुद ही पूछ लो, डगरू बाबू दद्दा वाला है। और इसके जैसे चरित्र वाली औरतों की उम्र बड़ी लंबी होती है। क्यो भउजी?

साहुन: हां, गांव घर मे मज़ाक के अलावा बाकी भी क्या है। वैसे आज अगर बाबू ठाकुर जिंदा होते तो आपकी यह मजाक करने की हिम्मत नहीं होती सुरेश ठाकुर। अच्छा जाते जाते एक और बात, आज आपका भतीजा डगरू खून की सजा काट कर वापस आ रहा है। यह कह कर साहुन मुस्कुराते हुए वहां से चली जाती हैं।

(कहानी अतीत में लगभग 45 साल पहले)

ठकुराइन: साहुन का कुछ पता चला?

साहू: कहाँ भउजी, अब ससुरी चाहे घर वापस आए या चाहे पटरी के नीचे आकर मर जाये, मुझे कुछ लेना देना नहीं है।

ठकुराइन: मुझे तो उसकी चाल चलन से लगता था कि एक दिन भाग ही जाएगी। तुम्हारे साथ नहीं निभने वाली थी।

साहू: बिरादरी वाले खार खाए बैठे हैं। जाने कब हुक्का पानी बन्द कर दें। यह बात जान गए है कि नीची जात की थी और हम झूठ बताकर ब्याह लाए थे। ससुरी भागी भी तो अपनी से भी नीच जात वाले के संग।

ठकुराइन: तुम्हारी बिरादरी के हिसाब से बढ़िया सुंदर थी, वरना तुम्हारा दिमाग ऐसे खराब नहीं होता। खैर, ये बातें छोड़ो। ठाकुर बाहर बैठे हैं, जाओ ये चाय दे आओ और वापस आते वक़्त बाहर वाले ताख पर से अपना कप उठा लाना।

साहू चाय लेकर बाबू ठाकुर के पास जाता है। तभी उसके चचेरे भाई की बेटी चिल्लाते हुए आती है और कहती है; ” दद्दू, चाची वापस आ गयी हैं।“ इतना सुनकर साहू सर पकड़ कर ठाकुर के पास ही जमीन पर बैठ जाता है। वह बिलखने लगता है और कुछ बड़बड़ाता है। उठता है और ठाकुर से कहता है; “भइया, आज ससुरी को ज़िंदा नहीं छोडूंगा”। और आगे बढ़ता ही है कि ठाकुर की गरजती हुई आवाज उसके कानों में पहुंचती है; ” तुम कुछ नही करोगे। चुपचाप उसे यहां लेकर आओ।”

साहू हाथ जोड़कर ठाकुर के सामने से चला जाता है। ठाकुर का दिमाग सन्न था। वह सोच रहे थे कि साहुन सामने आएगी तो क्या वह आपा खो देंगे। आगे उसके मन ने उससे साहुन की पैरवी की; “क्या तुम सच मे उसके चेहरे को देखकर अपना गुस्सा कायम रख सकोगे? तभी अहम ने जोर से मन को झाड़ा; ” किसी लायक नहीं है वह, और ठाकुर आज अगर साहू उसे मार भी दे तो तुम उसका हाथ नहीं पकड़ोगे। तुम यहाँ के ठाकुर हो, ऐसे कैसे किसी छोटी जात वाली के बारे में तुम्हारा मन पसीज सकता है। और वो भी उस खुदगर्ज औरत के लिए जो पति छोड़कर किसी गैर मर्द के साथ भाग गई थी। मन आगे जिरह करता है; “पर उसके मन मे कुछ तो था तुम्हारे लिए ठाकुर, उसके मंझले बेटे डगरु को जब भी लोग ‘ठाकुर का है’ बोलकर चिढ़ाते थे तो वह मुस्कुराती थी, यह कैसे भूल सकते हो।“

ठाकुर के विचार उसे परेशान कर ही रहे होते हैं कि साहुन के रोने की आवाज आती है। अहम और मन दोनों शांत हो जाते हैं। विलाप ध्वनि तेज़ होती जाती है जिससे पता चलता है कि वह बस सामने आने वाली ही है। ठाकुर की दिल की धड़कन इतनी धीमी हो जाती है, जैसे सांस आनी बंद हो रही हो। सर की सन्नाहट बरकरार होती है। शरीर लगभग शिथिल होता है। आँखे बेकाबू होकर बाहर निकलने को हो रही होती हैं कि सामने साहु बढ़ता हुआ दिखता है। उसने साहुन के बाल पकड़े हुए थे। उसी जोर से वह जमीन में घिसटती हुई साहुन को खींचता हुआ ला रहा था।

“छोड़ उसको साहू”; ठाकुर के मुंह से ये बेकाबू शब्द फूटते हैं।

ठाकुर आगे साहू से कहते हैं; “यह तमीज है तुम्हारी बात करने की, साले गंवार के गंवार ही रहोगे। भागो यहां से वरना जूता बाजार लगा दूंगा। जा अपनी भउजी को बुला कर ला।”

ठकुराइन आती हैं। ठाकुर उससे साहुन को अंदर ले जाने को कहते हैं।

थोड़ी देर बाद ठकुराइन वापस आती है और कहती हैं; “पानी वानी पिला दिया है, कसमें उठा रही है कि इस बार जो साहू उसे रख ले तो दुबारा नहीं भागेगी। बेचारी वहां भी बहुत मार खाई है। नाराज़ मैं भी थी पर हालत देख कर तरस आ रहा है।“

साहू: भउजी उसको देखकर तो हम भी बेचैन हुए पर इस भगोड़ी के चक्कर मे मेरा हुक्का पानी बंद हो जाएगा। भला कैसे इसको रख लूं।

ठाकुर: तुझे बस इसी बात की चिंता है? उससे भागने की वजह पूछी?

साहू: भैया आप क्या चाहते हैं, क्या पूछू। नीच थी ससुरी, भाग गई। कैसे आत्मा को मनाऊं।

ठाकुर: तुम साले बड़े पंडित के लौंडे हो। और सुन बे आत्मा वाले, मुझे उसके भागने की वजह जाननी है। चाहे तुम पता करो या तुम्हारी भउजी। तुझे दुबारा दुल्हिन लाने के पैसे मैं नहीं देने वाला।

ठकुराइन: ठाकुर आप एक बार बात करके देखिए ना। आपकी इज्जत में सब सच सच बोल देगी। वैसे भी अपने पति से ज़्यादा सम्मान आपका करती है।

यह सुनकर ठाकुर के मन मे तनिक संतोष होता है, चेहरे के भाव छिपा कर आगे वह कहते हैं; “अगर तुम दोनों के बस का नहीं है तो मैं बात करूंगा। बुलाकर लाओ उसे।“

साहुन कमरे के भीतर आती है। पलकें झुकाये बस रो रही होती है। उसकी बांह और चेहरे पर मार के निशान ठाकुर के मन को कचोट रहे हैं। ठाकुर पीठ कर खड़े हो जाते हैं।

ठकुराइन और साहू बाहर आंगन में बैठे विचार कर रहे हैं कि अंदर क्या बात हो रही होगी। साहू कहता है कि भैया बहुत गुस्सैल हैं, मेरी ज़िंदगी की चिंता में भले माफ कर दें। ठकुराइन कहती है कि ससुरी मेरा आधा काम बंटा लेती थी। ठाकुर के लिए कच्ची महुआ की दारू भी पका लेती थी। क्या टोना टटका करके ले गया वह हरामजादा। शकल देख कर तो तरस आ रहा है मुझे।

उधर कमरे में

ठाकुर: क्या पूछूं तुमसे ? क्या कमी थी यहां? खाना, कपड़ा बाकी समान क्या नहीं था? तुम्हें क्या चाहिए था? और भागी भी तो वापस क्यों आयी? और अब क्या उम्मीद? मेरे कहने से भी साहू तुम्हे अब नहीं अपनाएगा और पंच उसका हुक्का पानी बंद कर देंगे। और मैं उसे समझाऊं भी तो क्यों।

साहुन सिसकती हुई कहती है; “वो हमको बेच देता, इसलिए वापस भाग आये ठाकुर।

तो गयी क्यों उसके साथ?; ठाकुर ने पूछा।

साहुन: हम कुछ सोच नहीं पाए, बस चले गए।

ठाकुर: इतनी भोली तो नहीं लगती हो।

साहुन: तो पीठ कर क्यों खड़े है, मेरी तरफ देखकर बताइए कि भोली नहीं लगती हूँ तो कैसी लगती हूँ।

ठाकुर: भले कभी हमारी बात नहीं हुई है या मैंने प्रत्यक्ष रूप से जाहिर नहीं किया है पर साहुन तुम भी जानती हो कि तुमने किस प्रकार मेरा मन तोड़ा है। साहू माफ भी कर दे, मैं कैसे करूँ।

साहुन: साहू से मुझे माफी नही चाहिए। और आप चाहो तो मेरी जान ले लो।

ठाकुर: बहुत चालक हो। बड़ी खूबी से जानती हो कि जो ठाकुर तुम्हारे खींचते हुए बाल नहीं देख सकता, वह भला तुम्हारी देह से प्राण खींच सकता है। और तुम तो निष्ठुर हो। आज यहां आयी हो, कल किसी और के साथ भाग सकती हो।

साहुन: भागना पेशा नहीं है मेरा। 9 साल से निभा रही हूं ये शादी। और आपको क्या लगता है, आप जब मेरी ओर देखते थे तो मैं भी तो आपको पलट पलट कर देखा करती थी।

ठाकुर: वह तो शायद इसलिए कि मैं ठाकुर हूँ और तुम्हारा पति मेरे लिए काम करता है। कोई दूसरा ठाकुर होता तो उसको भी तुम ऐसे ही देखती।

साहुन: अगल बगल वाले कम कोशिश नहीं किए थे।

ठाकुर: तो क्यों नहीं रह गयी उनके पास।

साहुन: वो ठाकुर थे पर उनके माथे पर आप सी चमक और आंखों में आप सा प्रेम नहीं है।

“तुम मुझे कमज़ोर कर अपनी चाल चल रही हो। मैं ये नहीं होने दूंगा। तुरंत यहां से जाओ। चाहे साहू रखे तुम्हे या वो जिसके साथ तुम भागी थी”; ठाकुर ने बात खत्म की।

ठाकुर आगे चिल्ला कर साहू को पुकारते हैं।

अगले दिन पंचायत के समक्ष साहू कहता है कि वह साहुन को घर से निकाल रहा है। और बच्चे भी साहुन के साथ ही चले जाएंगे। शाम को मंझला बेटा डगरू जिसकी उम्र मात्र 6 बरस है, ठाकुर के पास आता है और जमीन पर बैठ जाता है।

ठाकुर बच्चे को देखकर उससे पूछते हैं; “तुम मां के साथ क्यों नहीं गया।“

बच्चा: मां ने कहा था कि आपके पास आकर रहूं।

ठाकुर: साहू ने तुझे मार दिया तो?

डगरू: मां ने कहा था कि आप मुझे बचा लोगे।

ठाकुर: और क्या कहा था मां ने?

डगरू: उसने कहा था कि जिस तरह उसके पास आपकी अंगूठी निशानी है, उसी तरह मैं उसकी निशानी बन आपके पास रहूँगा।

(भाग 2)

साहुन तेजी से घर की ओर बढ़ रही थी। आज डगरू की रिहाई थी। घर पहुँचकर उसने चिलम जलायी और देहरी पर बैठ गयी। उसे डगरू के मुस्कुराते हुए चहेरे का बेसब्री से इंतज़ार था। वह आ गया। डगरू अपनी अम्मा को देखकर भावुक हो गया और आते ही पैरों में जा गिरा।

साहुन: रोने-धोने की ज़रूरत नहीं है। जाकर रोटी खाओ, कमज़ोर हो गए हो।

डगरू: अम्मा वा कहाँ है?

साहुन: वा ससुरी तौ मोती के साथ भाग गई। तुम फालतू उसके आदमी के खून की सज़ा काट कर आये।

डगरू (खीझकर): अम्मा, ये भगोड़ी औरतों का कोई ईमान धरम नहीं होता।

साहुन ने चुप्पी साध ली। फिर ठिठककर पूछा: जल्दी कैसे छूट गए?

डगरू: उस आदमी के नाम पर पुलिस ने इनाम रखा था। अदालत ने आपसी जिरह में हुआ खून मानकर मुझे सजा दे दी, पर सुरेश ठाकुर ने साबित कराया कि मुझ पर हमला हुआ था। इस तरह कुछ साल सजा काटकर वापस आया हूँ।

साहुन: ठाकुर पर क्यों इतना भरोसा कर रहे हो? वह आज भी मुझसे नफरत करते हैं। आज सुबह ही मुझे गलत-सलत बोल रहे थे।

डगरू: वह सबसे भले आदमी हैं। बस आपसे ज़रा सा मज़ाक कर देते हैं। अच्छा, मैं उनसे मिलकर आता हूँ।

डगरू सुरेश ठाकुर के घर की ओर बढ़ता है। घर के द्वारे बैठे सुरेश ठाकुर कुछ हिसाब कर रहे थे। खसरा-खतौनी औऱ बही सब तख्त पर रखा था। ठाकुर का खास आदमी चुन्नी लाल उनके दाएं खड़ा था। डगरू वहाँ पहुंचता है, राम जुहारी करता है और ज़मीन के कुछ कागजात पर अंगूठा लगाता है।

सांझ होती है। कमरे से आ रही आवाज़ से प्रतीत होता है कि सुरेश ठाकुर और उनकी पत्नी माला बातें कर रहे होते हैं।

माला: यह ज़मीन उससे वापस लेने की क्या ज़रूरत थी? आपके पास कोई कमी है?

सुरेश ठाकुर: तुम कुछ नहीं जानती हो। यह ज़मीन मेरी ही थी, इसलिए वापस ले ली। डगरू को चाहिए होगी तो वापस कर दूंगा। मैं साहुन जैसा बेईमान नहीं हूँ।

माला: उसने क्या बेईमानी की है?

सुरेश ठाकुर: बप्पा ज़मींदार थे। उनके बच्चे बचते नहीं थे। बुढ़ापे में बड़े भैया और उनसे 10 साल छोटा मैं पैदा हुए। घर-खानदान बेईमान मिला। साहुन हमारे घर काम करती थी और उसी ने सबसे बड़ी बेईमानी की।

माला: पर साहुन तो बाबू ठाकुर के घर काम करती थी ना?

सुरेश ठाकुर: सुन लो पहले, फिर सवाल करना। आषाढ़ के महीने में साहू जगतपुर गांव से साहुन को भगाकर ला रहा था। बारिश हुई थी। ये दोनो जिस ट्रक से आ रहे थे, वह गांव की कच्ची राह में फंस गया था। साहुन के गांव वाले दोनों को ढूंढ रहे थे, इसलिए दोनों ट्रक से उतरकर पास के गांव में छिपने गए, पर वहाँ से भी भगाये गए। यहां आए तो साहू की बिरादरी ने इनको बेदखल कर दिया था। बप्पा ने घर के पीछे रहने को ज़मीन दी थी और अम्मा पीछे वाले दरवाजे से साहुन को खाना दिया करती थीं। बप्पा दयालु थे। उन्होंने भंडारा कराया जिससे साहू को फिर बिरादरी वालों ने अपना लिया।

माला: पर इसमें साहुन का क्या दोष?

सुरेश ठाकुर: बप्पा ने साहू को एक दुकान खोलने के पैसे दिए थे। जिसके बदले साहू ने अपना तराई का खेत बप्पा के नाम किया था। उस ज़मीन पर हमारा कब्जा तो था पर नाम नहीं लिखा पाए। चकबंदी हुई तो हमारी एक पास की ज़मीन टुकड़ो में बँट गयी। अम्मा बीमार ही थीं। साहुन ने घर पर काम करना छोड़ दिया और दुकान पर बैठने लगी। बाबू भैया और गुनी ठाकुर के चक्कर दुकान पर लगते थे। साहुन के चक्कर मे ही बाबू ठाकुर ने साहू को अपने घर काम पर रख लिया। फिर दुकान में कुछ घाटा दिखाकर साहुन भी बाबू भैया के घर काम करने लगी थी। हम कुछ कर नहीं सके क्योंकि बप्पा बूढ़े हो गए थे। हम दो भाई भी उम्र में छोटे थे। आसपास के लोग हम दोनों को जान से मारने की धमकी देकर बप्पा से ज़मीन लिखाते रहे। गांव के तालाब पटवा कर खेत नाम कराये गए। जितने चारागाह थे, सब पर सब ने कब्जा किया। बप्पा ने रोकने की कोशिश की तो घर ने लोगों ने छोटे चाचा की हत्या करवा दी। क्या क्या नहीं हुआ। खैर, एक दिन बाबू भैया ने साहुन को गोबर और करकट हमारे हाते में डालने को कहा। बप्पा द्वारे पर बैठे थे। उन्होंने चिल्लाकर उसे मना किया और बेंत फ़ेंककर मारने की कोशिश की। इस कोशिश में वह स्वयं को संभाल ना सके और गिर गए। उसके बाद कुछ दिन तक जिये और चल बसे। इस प्रकार जहाँ हमारे जानवर बांधे जाते थे, वहां बाबू ठाकुर का कब्जा हो गया था।

माला: साहुन तो अपने मालिक का कहा कर रही थी?

सुरेश ठाकुर: पर वो हमारे एहसान इसलिए भूली क्योंकि वो बेईमान थी और हम कमज़ोर। बप्पा के मरने के कुछ साल बाद बाबू भैया और हमारे परिवार में बोलचाल शुरू हो गया था। मैं 12 साल का हो चुका था। एक बार बाबू भैया ने मुझे साहुन की बनायी हुई शराब पीने को कहा। मैंने मना किया तो उन्होंने मुझे कसम दी और कहा कि सिर्फ जूठा कर के छोड़ दूँ। मैने फिर भी ना माना तो भैया ने शराब मुझ पर फेंक दी। साहुन इस बात पर बहुत हँसी। उसका अट्टहास मुझे मेरे कमज़ोर होने का भाव दे गया। बात इतनी ही नहीं, ज़हरीली शराब पीने के कारण जब साहू की मौत हुई तो हमारे कब्जे वाली जमीन साहुन और उसके बच्चों के नाम आ गई। उसके बाद बाबू भैया की मदद से साहुन ने वह ज़मीन हमसे छीन ली। आज उसी के कागजात पर मैंने डगरू का अंगूठा लिया है।

माला: पर साहुन को तो गांव से भगा दिया गया था? फ़िर वह दुबारा वापस कैसे आयी?

सुरेश ठाकुर: सुनो, ज़्यादा व्योमेश बक्शी न बनो। चाय बना कर दो, जाओ तुरंत!

तभी कोई घर का दरवाजा खटखटाता है। सुरेश ठाकुर दरवाजा खोलते हैं तो सामने साहुन खड़ी होती हैं। वह ठाकुर के पैरों पर गिरती है और रोने लगती है।

साहुन: ठाकुर ज़मीन लौटा दो। पोता पोती भूखे मर जायेंगे।

सुरेश ठाकुर: कोई भूखा नहीं मरेगा, सब हमारे खेतों में काम करेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा मैं अपने सभी खेत तुम्हारे बच्चों को बटाई दूँगा।

साहुन: क्यों बदला ले रहे हो ठाकुर? इतने में पूरा नहीं पड़ेगा।

सुरेश ठाकुर: कैसा बदला? वैसे भौजी अब तुमको वो हँसी नहीं आती जो बाबू भैया के ओट से आती थी।

साहुन: ठाकुर, आप जानते तो हैं कि उस वक्त मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी।

सुरेश ठाकुर: काहे मरने के वक़्त झूठ बोलती हो। बाबू भैया तो तुम्हे प्रेम करते थे। तुम्हारे चक्कर मे उन्होंने अपना सब कुछ भिन्जार दिया।

साहुन: गलत। वो प्रेम करते होते तो ठकुराइन दिदिया के मरने के बाद मुझे अपना लेते, अपनी साली ना ब्याहते।

सुरेश ठाकुर: साहुन तुम जैसी कपटी औरतें कैसे सहजता से ऐसी अधर्मी बाते करती हैं। जैसे तुम्हारे बुरे कर्मो को झुठला कर तुम्हे अपनाना उनका कर्त्तव्य रहा हो। बाबू भैया तुम्हे प्रेम करना और तुम्हारी परवाह करना जानते थे। साथ ही वह यह भी जानते थे कि तुम्हे जीवन मे लाकर उनका और उनके बच्चों का जीवन कितना नर्क होने वाला है।

साहुन: सुरेश बाबू आपको बाबू ठाकुर से नफरत होनी चाहिए पर नही, आप मुझ जैसे कमज़ोर पर ज़ोर दिखा रहे हैं।

सुरेश ठाकुर: नफ़रत थी, पर भैया ने मुझे सब सत्य बताया, माफी मांगी और पश्चाताप किया। उससे क्या नफरत की जाए जिससे गलती हुई हो और वह मान ले पर तुम जैसे लोगों को कैसे माफ किया जाए, जो गुनाह कर के भी स्वयं को साहूकार समझे और प्रेम करने वाले को मूर्ख। वैसे भी तुम्हारे डगरू वाले झूठ ने ठकुराइन भौजी की जान ली। यह सच मैं कभी नहीं भूल सकता।

साहुन: ठाकुर, प्रेम मुझे भी था पर …

(भाग 3)

साहुन: …पर बाबू ठाकुर के जीवन मे मेरे उस प्रेम का कोई स्थान नहीं था। परिवार, समाज और रुतबा सब उनके पास था। मेरे पास उनके सिवाय कोई नहीं। जब मुझे गाँव से निकाला गया था, तब डगरू को उनके पास छोड़कर जाना मेरी मज़बूरी थी। मुझे पता था कि ठाकुर का गुस्सा क्षणिक है और वह मुझे वापस ले आएंगे। मुझे तब प्रेम नहीं था पर वापस आने के बाद हर दृष्टि से वह मुझे भगवान लगे। वह भगवान जिसका मेरे जीवन में श्राप था। और राम कसम भैया मुझे ठकुराइन दिदिया से कोई बैर नहीं था। मुझे उनके घर छोड़कर जाने के विषय में कुछ नहीं पता। ठाकुर से मेरी कुछ बात हुई थी और उसके बाद मैने स्वयं को उनके जीवन से अलग कर लिया।

सुरेश ठाकुर: तुम्हारे आने की खबर ने गाँव-जवार में हलचल मचा दी थी। मुझे याद है वह दिन। पूरे गाँव के बीच पंच बैठे थे, साहू बिरादरी, बगल के गाँव के पंडित और गुनी ठाकुर के चारों भाई थे। बाबू भैया ने दहाड़ते हुए साहू को समर्थन दिया और कहा कि यह अपनी पत्नी को गाँव में लाएगा। वह वैसे ही रहेगी, जैसे पहले रहती थी। सब डरते थे। किसी ने बस इतना कहा कि साहू का अब बिरादरी से हुक्का पानी बन्द है। बाबू भैया को इस बात की परवाह ही कब थी। उन्हें सिर्फ तुम्हारी परवाह थी। ख़ैर, अब तुम जाओ। मुझे कई काम निपटाने हैं। हम बाद में तुम्हारे ज़मीन का मामला देखेंगे।

साहुन के वापस जाने के बाद माला आगे बात बढ़ाने की कोशिश करती है।

माला: जीजी को कब पता चला?

सुरेश ठाकुर: जब यह घटना हुई तब मैं छोटा था। मैं यह सब देखकर बहुत विचलित हुआ। दौड़ते हुए ठकुराइन भौजी के पास पहुँचा। मैंने चिल्लाते हुए उन्हें कहा कि भैया उसे वापस ला रहे हैं। उत्तर मिला: हाँ, जानती हूं। लाने दो। मैंने फिर कहा कि भाभी आप नहीं जानती कि वो आपका घर बर्बाद कर देगी। भौजी ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा सुरेश भैया। ठाकुर मुझी से प्रेम करते हैं। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी। उन्होंने कहा कि मैं चाचा बनने वाला हूँ, इसलिए वह कुछ महीनों के लिए अपने मायके जाएंगी। मैं हाथ पाँव पटकने लगा किन्तु भौजी का निर्णय अडिग था। उन्होंने मुझे कुछ और बातें कही जो मैं कभी नहीं भूल पाया।

“साहुन और मुझमें कई फ़र्क़ हैं। मुझे उससे नफरत नहीं है और ना ही मैं इस मामले में उससे कोई बात करूँगी। सबसे बड़ा फर्क हम दोनों की परवरिश में रहा। जब उसे खेत मे काम करना और पुरुषों के बराबर बोझा उठाना सिखाया गया होगा, तब मैं मान पर प्राण देने की सीख ले रही होंगी। रही बात ठाकुर की तो एक पति अपनी पत्नी और बच्चों से ही प्रेम करता है। बाहरी औरत चाहे कितनी भी आकर्षक हो और पत्नी कितनी भी जटिल, पति पत्नी को ही चुनता है। फ़िर मैंने तो ठाकुर से सदैव प्रेम किया है। यदि उनसे कहा जाए कि वह मुझे छोड़कर साहुन या अन्य किसी स्त्री को चुनें तो तुम्हे क्या लगता है कि वह ऐसा करेंगे?”

मुझे उस वक़्त तक नहीं पता था कि बाबू भैया किसे चुनेंगे। भौजी अपने मायके चली गयीं।

माला: जेठ जी ने उन्हें नहीं रोका?

सुरेश ठाकुर: रोका था पर वह नहीं रुकीं। भौजी के जाने पर गांव के सभी लोगों ने यही सोचा कि अब प्रेम कहानी शुरू होगी। साहू को भी इस बात की भनक थी। वह बहुत शराब पीने लगा था। एक दिन ख़बर आयी कि कच्ची दारु पीने से वह चल बसा। अब तो कोई दरार भी नहीं बची थी। भैया साहुन की बराबर मदद करते रहे पर भौजी के जाने का दुख उनके चेहरे पर दिखने लगा था। मुझे उनसे नफ़रत थी पर तरस भी आने लगा था।

माला: जेठ जी ने जीजी की बहन से शादी कैसे की?

सुरेश ठाकुर: धनन्जय के पैदा होते ही भौजी चल बसी थीं। बच्चा कौन पालता? उनके पिता जी ने बच्चे के साथ उनकी छोटी बहन को भेजा। कुछ दिन तक उन्होंने वो बच्चा और घर संभाला। फ़िर उन्हें लेने भैया के ससुर आये तो बाबू भैया ने उन्हें अकेले वापस जाने को कहा।

माला: साहुन ने ऐतराज नहीं किया?

सुरेश ठाकुर: वह थी कौन? एक लालची औरत, उसे भैया से मोह से अधिक लालच प्रिय था।

इधर साहुन खटिया पर पड़ी अतीत की बातें सोच रही होती है। ख़याल ना चाह कर भी वहीं पहुँच जाते हैं कि ठाकुर के साथ होने के सपने कैसे स्वतः साहू को उसके जीवन चित्र से अदृश्य कर देते थे। अतीत की साहुन मानो आँखों के समक्ष होकर कई बातें स्वीकार कर रही हो और स्वयं से कह रही हो कि ठाकुर ने घर, ज़मीन और दुकान सब कुछ व्यवस्थित कर दिया था। अब मैं उनके लिए पूरी तैयार थी। मैं जानती थी कि वो मुझे प्रेम करते है और चाहती थी कि वह अब मुझे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं पर ऐसा नहीं हुआ।

उन्होंने मुझे मेरे अतीत से जोड़कर देखा। मैं उनके लिए एक पल में ही अनजान बन गयी थी। वो कमरा भी अब मेरा प्रभाव छोड़ चुका था। मुझे ठाकुर मजबूर दिख रहे थे। पहली बार ऐसा लगा कि उन्होंने मुझे मन से नकार दिया। ठकुराइन दिदिया की मौत का ज़िम्मेदार वह मुझे कैसे मान सकते हैं। बच्चा जनने में कई बार औरतों की मौत हुई है। और अगर उड़ते उड़ते डगरू की बात ठकुराइन दिदिया को पता भी चल गई तो क्या हुआ। हमारे बारे में जानती तो वह थीं ही। घर वापस आकर साहू के चिल्लाने पर अगर मैंने उसे वह शराब दे भी दी तो इसका गुनहगार मैंने ठाकुर को तो नहीं मान लिया। मैं उनसे बैर भी क्यों रखती। उनके नहीं अपनाने से न मेरा जीवन समाप्त हुआ और ना ही जीवन की जरूरतें।

तभी डगरू की आवाज़ सुनकर अतीत की साहुन वाली तंद्रा टूटती है।

डगरू: अम्मा चाह पिहौ?

साहुन : नै, चिलम लाओ।

(समाप्त)

लेखिका कहानियाँ और मुक्त छन्द कविताएँ लिखती हैं। कथा चरित्रों की सजीव कल्पना से उनकी कहानियाँ जीवन्त और मार्मिक बनती है। कहानियों और कविताओं के अतिरिक्त वह जीवन शैली, फैशन और मनोरंजन आदि विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। फेमिनिस्ट मुद्दों पर उनके आलेख बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। लेखिका ने लोपक.इन के लिए कई कहानियां और अन्य आलेख लिखे हैं। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं।

1 thought on “साहुन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *