मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-9

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ये हंसी बहुत अलग सी थी, बहुत अलग, वो जैसे मौत के सामने ज़िन्दगी बाहें पसार खड़ी हो। अपनी बाँहों में समेंट लेने के लिए , मौत का मज़ाक उड़ाती हुई ज़िन्दगी।

रूही का आर्डर आया “मैंने कुछ नहीं खाया है सुबह से, कुछ खाने को माँगा मेरे लिए।” मोहित ने ऑर्डर किया, पानी पूड़ी, कुलचा और मिर्च का आचार, वही सब रूही का फेवरेट।

मोहित मुड़ा ऑर्डर करके तो देखा, तो रूही बियर की बॉटल पकड़े खड़ी हुई थी।

मोहित चौंका, रूही फिर हंसी ,ऊपर वाले ने फिर ठहाका लगाया , मोहित  फिर चौंका ,रूही फिर मुस्कुरायी।

“तू हीरो? मैं तो पीऊंगी आज ,आज बहुत खुश हूँ बस।”

“रूही, तू ठीक है ना?”

“अरे हाँ, चल गिलास निकाल”

रूही ने जब तक खिड़की के पास सारे तकिये रखे, ट्रे में रखी बॉटल और ग्लास । उधरमोहित की जान सी निकली हुई थी ।

चियर्स के बाद गटागट करके एक साँस में ग्लास खाली।

मोहित ने एक ही घूँट भरा था कि रूही ने दूसरा ग्लास भी खाली कर दिया । मोहित सिर्फ़ उसे देखे जा रहा था।

“सिगरेट जला के दे मुझे” आवाज़ ज़रा सी लड़खड़ा रही थी अब रूही की।

मोहित ने चुपचाप सिगरेट जलाई और दे दी। रूही का ये रूप पहले कभी नहीं देखा था मोहित ने।

“तू डर क्यूँ रहा है रे, खा जाऊंगी क्या?” रूही की आँखे लाल हो रही थी।

“अच्छा, तू ऐसे क्यूँ आ जाता है अचानक से, स्वीटी?”

स्वीटी … ये क्या नाम रख दिया था रूही ने?

“तू, इतना क्यूँ करता है मेंरे लिए?”

“मैंने आज तक तुझे दिया क्या है रे स्वीटी?”

“मैं कैसे उतार पाऊंगी सब इतना? “ बोले जा रही थी झल्लो।

फिर अचानक से उठी और मोहित के पैर पर तकिया रख के सर टिका कर लेट गयी। मोहित कांपा, वो रूही के इतना नजदीक कभी नहीं आया था।

पहेली लेट कर सिगरेट पी रही थी, साइड में बियर का ग्लास रखा था, शाम के चार बज रहे थे। पानी पूरी सामने पड़ी सील रही थी और पानी पूरी के पानी में अभी भी बुलबुले उठ रहे थे।

गिलास मोहित का वैसा का वैसा था और रूही की बोतल खाली हो चुकी थी।

और फिर अचानक से मोहित और रूही के बीच में भाई आ गया।

भाई के बारे में शुरू हो चुकी थी वो, “भाई ये, भाई वो,बहुत लड़ाई होती है अब, पहले जैसा कुछ नहीं रहा, मिलना भी नहीं हो पाता, बात नहीं होती, न बर्थडे न कुछ , सब खत्म हो गया।”

“…………….”

“मेरी क्या गलती थी? ,मैंने तो सब दिया उसे , बस शादी ही तो नहीं कर पायी स्वीटी मैं उस से।”

“शादी बहुत ज़रूरी होती है स्वीटी? शादी के बिना रिश्ता कुछ नहीं? नाम देना क्यों ज़रूरी है रे?”

“वो मुझे समझा ही नहीं स्वीटी”

“मुझे नींद आ रही है स्वीटी और भूख भी लगी है और बियर भी पीना है और सिगरेट भी”

बहकने लगी थी रूही ,मोहित उठा, “कहाँ जा रहा है तू?”

“मुझे छोड़ कर जा रहा है?”

“मुझे पता था तू एक दिन चला जायगा” मोहित फिर रुक गया , मुस्कुराया, “तुझे घर नहीं जाना?”

“नहीं”, झट से जवाब आया।

“एक बियर और मंगवा ना प्लीज़”

“अच्छा उठने तो दे ना” मोहित उठा, फ्रिज से बियर निकाली और ग्लास में डालने को हुआ तो रूही ने बॉटल छीन ली, उठी और ग्लास वाली खिड़की के पास उकड़ू हो कर बैठ गयी।

एक हाथ में बॉटल, एक हाथ में सिगरेट,  आँखें लाल आंसुओं से भरी हुई, आँसू से बिखरा हुआ काजल और झूठी हँसी हँसती हुई रूही।

झूठ को सच और सच को झूठ बनाने पर आमादा रूही, मोहित की बेज़ार सी ज़िन्दगी में रंग भरने को आतुर रूही।

अपने को हार कर मोहित को जीत लेने का दम भरती हुई रूही , दुनिया के हर रस्मो रिवाज़ को दुलत्ती मारती हुई रूही।

रिश्तों के ज्वारभाटे को अपनी कांपती हुई उँगलियों से थामती हुई रूही ,अपने किये वादे को निभाने के लिए अपने वादों को भूलती हुई रूही।

सुकून पाने के लिए रिश्तों का अंतिम संस्कार करती हुई रूही….

आज रूही ने एक साथ जाने कितने रूप दिखा दिए थे । पहेली इतनी कठिन तो नहीं होती है पर ये एक अबूझ पहेली थी रूही।

मोहित देखता रहा, आगे बड़ा और रूही के सामने आकर बैठ गया , हाथ थामा और सर पर हाथ रख कर कहा, “कभी छोड़ूँगा नहीं तुझे ”

रूही ने बॉटल वही रखी, सिगरेट मोहित के मुँह में लगाई और कहा मुझे सोना है। मोहित ने उसे सहारा देकर बिस्तर पर लिटा दिया । रूही की आँखे लाल और चेहरे पर कुछ था रूही के,लाल लाल आँखें कुछ कह रही थी,जो मोहित ने अनदेखा कर दिया,मुसकुराया,कम्बल पूरा रूही के ऊपर डाला और माथे पर हाथ फेर कर बोला, सो जाओ थोड़ा, मैं यही हूँ तेरे पास।

“मेरे पास आ स्वीटी” मोहित वही सिरहाने रूही के बैठ गया।

रूही ने उसका हाथ लिया और अपनी आँखो पर रख लिया। तप रही थी रूही , जल रही थी। शायद भस्म होने पर आमादा थी या मोहित को अपनी अIग में भस्म करने वाली थी।

और मोहित???

पानी का बुलबुला।

रूही को थोड़ा सरका के वही कोने पर बैठ गया। पैर कम्बल से बाहर थे मोहित के और हाथ आँखों से हट कर रूही के बालों में आ गया था। हाथ फेरता रहा रूही के बालों में ,रूही को सुकून आ गया था।

परी जैसी लगती थी वो मोहित को  वो जो जाने क्या करने आई थी मोहित की ज़िंदगी में। मोहित ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ये सब जो हो रहा है कहाँ पर जाकर रुकेगा।

मोहित के अंदर क्या था जो रूही को तो पता था और मोहित को नहीं। करीब एक घंटे बाद रूही उठी, अचानक से भड़भड़ा कर । अपने आप को टटोला, मोहित को सिरहाने देखा और फिर मुस्कुरा दी।

“तू पागल है रे, सच्ची और तू वाकई में स्वीट है, इसलिए तेरा नाम स्वीटी रखा है”

रूही ने आजतक मोहित को उसके नाम से नहीं पुकारा था इतने सालों में।

पहले सर कहती थी ,फिर आप तक बात आई ,फिर तुम हुआ ,फिर तू तड़ाक होने लगा, फिर हीरो हुआ और अब एक जनवरी को नया नामकरण हुआ था –  “स्वीटी”

“तुझे कब वापिस जाना है रे?” चाय सुड़कते हुए रूही बोली

“पता नहीं”

“मतलब?”

“मतलब, पता नहीं”

“टिकट कब का है रे वापिसी का?”

“मैं कभी भी वापिस जाने के लिए नहीं आता था रूही”

“देख स्वीटी, डायलॉग नहीं, बता कब जाना है?”

“कल सुबह बब्बल”

“मत जा कल”, आँखें बंद करे करे रूही बोली

“ठीक है नहीं जाऊंगा”

“तू मना क्यूँ नहीं करता है रे, हर बात में कैसे कोई हाँ कह सकता है”

“मैं पागल हूँ ना बब्बल”

रूही उठी, वॉशरूम में गयी, मेकअप ठीक किया और बोली जाना है मुझे शाम हो रही है, बिटिया का आने का वक़्त हो रहा है ।

“ठीक है”

“कल आती हूँ सुबह”  दरवाज़ा खोला, रूही ने, बाहर कदम रखा और मुड़ी,पास गई मोहित के उसका हाथ लिया,  अपने कंधे पर रखा और गाल से दबा दिया।

आँखें बंद थी रूही की, बोली “तू अलग सा है रे स्वीटी, तुझे नहीं पता, तूने आज क्या पाया है”

सुबह 6 बजे पिंग हुआ,

“ब्रेकफास्ट पर आ रही हूँ, उठ जा न हीरो ”

मोहित रात भर सोया ही नहीं था सो जागता क्या,

“आजाओ…… वेटिंग”

आठ बजे ट्रैकसूट में रूही आई , ऐसे जैसे कुछ हुआ ही था नहीं बीते दिन।

“चल क्या खिलायगा?”

“बुफे हैं ना, वही चल”

आधे घंटे में ख़त्म करके मोहित ने सवालिया निगाह से पूछा “अब?”

रूही ने कहा,

“मतलब? जाऊं मैं घर?”

मोहित हड़बड़ा गया,बोला नहीं-नहीं मैंने तो बस पूछा । रूही लिफ्ट की तरफ़ मुड़ चुकी थी।

9 जनवरी,

होटेल रेडियंट, पुणे ।

आज कहानी का दूसरा पेज लिखने वाला था ऊपरवाला। मोहित की ज़िन्दगी की किताब जब ऊपर वाले ने लिखनी शुरू की थी तो एक आम सी ज़िन्दगी थी। पैदा होना था, मर जाना था ,आम किस्सा था।

पर पता नहीं क्या दिल्लगी सूझी ऊपर वाले को कि पहले और आख़िरी पेज के बीच में कुछ खाली सफ्हे छोड़ दिए। जब मन करता था कुछ भी लिख देता था उनपर ,ऊपर वाला  और फिर मिटाना चाहते हुए भी नहीं मिटा पाता था।

पता नहीं क्या सोच कर  “रूह” लिखते लिखते उस दिन ऊपर वाले से एक बड़ी मात्रा और लग गयी थी और रूह को रूही कर बैठा था ऊपर वाला।

फिर मिल बैठा था मोहित अपनी रूह से , रूही ही थी वो , शायद..

पहेली ? थी तो पहेली ही, ऊपर वाले की गढ़ी हुई एक अबूझ पहेली।

रूही कमरे में गयी और धम्म से बिस्तर पर बैठ गयी।

“मुझे सोना है,मैं सोने आई हूँ, पास बैठे रह बस मेंरे स्वीटी”

“क्या कह कर आई हो?”

“कुछ नहीं,जिम के कपड़े है सो समझदार को इशारा काफ़ी है ना ईडियट?”

रूही सो गयी, मोहित जागता रहा, ऊपर वाला इंतज़ार करता रहा सब्र के टूटने का , नहीं टूटा।

जब इतने साल नहीं टूटा तो तब क्या टूटता। रूही बारह बजे उठी,मोहित सामने टेबल पर था, काम कर रहा था।

“मैं अकले सोने नहीं आई हूँ स्वीटी, ऐसे तो बरसों से सो रही थी, तेरे पास सोने आई थी, 10 मिनट भी मेंरे पास नहीं बैठ सकता रे तू?”

मोहित हँसा, घड़ी की तरफ इशारा किया,

“एक बज रहा है मेमसाब, आप तीन घंटे सो चुकी है बिना हिले-डुले”

रूही फटाक से उठी, बैग उठाया और बोली, “अभी आती हूँ एक घंटे भर में”

मोहित हकबकाया हुआ था कि आख़िर हुआ क्या है रूही को। मोहित ने लैपटॉप बंद किया, दुबई ऑफिस फोन किया काम समझाया, कहा, “अभी एक दिन और लगेगा आने में ”

बेवकूफ़ था मोहित … एक दिन में कभी लौट पाया है? ऐसे जब कोई जाता है तो फिर लौट कहाँ पाता है, बस थम जाता है वही का वहीं ।

ये रूही का इश्क़ था, शायद पुराने जन्म का क़र्ज़ ही होगा, उतरने का नाम ही नहीं लेता था  या टायफाइड था कमबख्त, मुआ लौटलौट के आता था। फटाफट नहाने गया तो बेल बज गयी, टॉवल में ही दरवाजा खोला सामने रूही। सिर्फ चालीस मिनट में वापिस आ गई थी। मोहित एक दम से अंदर भागा और रूही खिलखिला के हँस दी, दरवाजा बंद किया और खिड़की के पास तकिया लेकर बैठ गयी गोद में।

जब मोहित आया तो रूही दो ग्लास बियर के बना चुकी थी।

ग्लास आगे बढ़ाया और बोली, “जहाँपनाह साकी हाज़िर है पैमाने के साथ”

हँसी उसकी ऐसे देखी नहीं थी मोहित ने पहले कभी । ये कौन सा रूप था रूही का ?

बियर के बाद रूही ने कहा, मुझे शॉट्स चाहिए । मोहित ने ऑर्डर किया, वेटर वोडका की बॉटल रख गया, मोहित ने कभी शॉट्स नहीं ट्राय किए थे। रूही ने दो बनाए, नमक हथेली पर और शॉट्स अंदर ,बाद में नमक अंदर।

मोहित अभी भी होश में ही था और रूही के एक-एक करके दो और अंदर गटक चुकी थी ।

रूही की पहेली फिर सुलझने लगी थी।

“तू क्यूँ आता है बार बार मेरे पास?”

“क्या चाहिए है मेरे से पागल?”

“बोलता क्यों नहीं कुछ?”

“बस आता है और चला जाता है”

“तुझे पता है ना मैं शादीशुदा हूँ?”

“तू जैसे चाहता है मैं वैसे नहीं मिल सकती तुझे पता है ना?”

“मैं तेरे लिए कुछ नहीं कर पाऊँगी”

“क्या चाहिए तुझे मेरे से?”

“ऐसा क्या है मेरे में स्वीटी?”

“तू मांग ना, तू पागल है , तुझे अपने आप समझ नहीं है?”

मोहित सुन रहा था, मोहित का फोन बजा ।

“लग जा गले की फिर ये हँसी रात ना हो” बरसों से यही रिंग टोन थी ।

“तू बदला नहीं रे अभी तक स्वीटी, सब कुछ संभाल के रखा हुआ है तूने, बस मैं ही तेरे साथ ना दे पाई”

फिर बहकने लगी थी रूही । उठी, लड़खड़ाई और फोन उठा के दिया मोहित को ।

पता नहीं कौन से रिश्ते होते हैं जो लड़खड़ाते है और मजबूत हो जाते है। मोहब्बत तो नहीं होती होगी वो जनाब क्यूंकि मोहब्बत तो जब जब लड़खड़ाई हैं, तबाही ही लायी है रिश्तों की। कब हो जाए किस से हो जाए। रिश्तों में होकर भी रिश्तों में नहीं होने वाली मोहब्बत के मायने कौन समझ पाया है या कौन समझा पाया। जिस तन लागे वो तन जाने वाली बात होती है साहिब वो ।

सिगरेट जलाई और एक मोहित को दी, मोहित ने सिगरेट ली तो चौं क गया, “तुझे बुखार है रूही?”

रूही फिर खिलखिलाई , “घोंचू है तू”

रूही ने सिगरेट ली और बिस्तर पर जाकर लुढ़क गयी। छत की तरफ़ देखते हुए धुआँ धुआँ फिर कोहनी के बल हुई और मोहित से बोली, “सुन स्वीटी”

“हाँ परी बोल”

“कुछ नहीं, तू पागल है रे, तुझे अक्ल नहीं”

मोहित उठा, पास आया और मुस्कुराया,

“अक्ल है रूही पर मैं तेरा स्वीटी भी हूँ”

पैर बड़े खूबसूरत थे रूही के और मोहित हमेशा  ये बात कहा करता था । उस दिन मोहित ने हिम्मत की बेड से उतरा, दूसरी तरफ़ गया जहाँ रूही के पैर थे और रूही के पैरों को चूम लिया। रूही झटके से उठ गयी, बोली, “तू पागल है क्या, ये क्या कर रहा है, मैं इस लायक नहीं स्वीटी।”

मोहित कर चुका था जो उसे करना था, फोन की घंटी बजी फिर और रूही ने फोन उठाया,

“लग जा गले”

फोन रूही ने बंद किया, दौड़ के मोहित के पास आई और उसके गले लग गयी  मोहित के हाथ नीचे से ऊपर नहीं उठे ,लगी रही रूही गले। इतना ज़ोर से कि मोहित की जैसे जान ही निकल देगी।

मोहित मूर्ति की तरह खड़ा था और फिर रूही के गाल पर टपका कुछ, रूही ने ऊपर देखा, एक कतरा अभी भी बाकी था ।

“बस अब कभी तेरी आँखो में आँसू आए तो मेरा मरा मुँह देखेगा तू स्वीटी”

ये एक ऐसी कसम थी जो मोहित को ज़िंदगी भर का श्राप दे गयी थी ।

मोहित ने प्यार से रूही के चेहरे को ऊपर किया और कहा, “नहीं आयंगे अब कभी आँसू झल्लो ”

“मैं अब जाउXगी स्वीटी”

मोहित उठा, पास आया, रूही के माथे पर हाथ फेरा और कहा, “जाने को मत बोला कर, ये कहा कर कि फिर आती हूँ”

“हट्ट पागल” कह कर रूही उठ खड़ी हुई। मोहित नीचे तक छोड़ कर आया। रूही ने कार स्टार्ट की और तेजी से ये गयी वो गयी।

मोहित खड़ा रहा वही बहुत देर तक …..

उसका यही शगल था,वो जब तक नहीं जाता था जब तक की रूही का फोन नहीं आता था कि वो घर पहुँच गयी है। मोहित कैसे भी करके अपने को घसीटता हुआ ऊपर गया, टीवी तेज़ किया,कपड़े उतारे ओर सीधे शावर में।

जितना चीख सकता था, चीखा, आवाज़ नहीं निकली, खड़ा रहा। ये क्या कर गयी थी रूही आज उसके साथ।  उसने बतIया था रूही को कि कैसे वो जब हस्पताल से लौटा था और आकर सबसे पहले उसने शबाना को आवाज़ दी थी, शबाना बाहर आई थी, मोहित ने हाथ फैलाए थे उसको बाहों में लेने के लिए और शबाना पीछे हट गयी थी।

और आज रूही मोहित का सीना चीर कर उसका कलेजा निकाल कर ले गयी थी। घर जाने के बाद रूही का फ़ोन आया, कुछ मेंहमान आ गए है अचानक तो अब शाम को मिलना नहीं हो पाएगा और दुसरे दिन से बच्चों के इम्तिहान थे।

मोहित ने फ़ोन किया, टिकट बुक करवाया और उड़ गया वापिस।

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-9

  1. “रिश्तों में होकर भी रिश्तों में नहीं होने वाली मोहब्बत के मायने कौन समझ पाया है या कौन समझा पाया। जिस तन लागे वो तन जाने वाली बात होती है साहिब वो ।”
    बहुत ऊँची बात कह दिये श्रीमान जी इन पंक्तियों में… अगले भाग का इंतजार रहेगा… 😇🙏

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