रूही – एक पहेली: भाग-8

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सुबह दो जनवरी वाली नयी ज़िन्दगी थी मोहित की।

तभी, राधा कमरे में आई, मोहित के हाथ से डायरी ली और सूप सामने रख दिया। घड़ी की तरफ़ इशारा किया और गोद में तकिया रख के सामने बैठ गयी खिड़की के पास। मोहित ने कुछ पूछने के लिए सोचा पर राधा ने कहा, “Shhhhhhhhhhhhhhhh ”

मोहित ने सूप पिया, डायरी उठाने को हुआ तो राधा की आवाज़ सुनाई दी, “नो, याने नो” मोहित ने घूर कर उसे देखा, पर खाक़ असर होना था। राधा ने डायरी उठाई, दवाई हाथ में दी, पानी दिया और लाइट ऑफ कर दी। मोहित को आख़िर गुस्सा आ ही गया। “मतलब क्या है आपका? आप है कौन ऐसे बिहेव करने वाली?”

राधा ने पीछे मुड़ कर देखा,मुस्कराई, “राधा नाम है हमारा” और दरवाज़ा बंद करके चली गयी। मोहित थोड़ी देर लेटा रहा फिर कब आँख लग गयी पता नहीं चला। आँख खुली सुबह तो ढेर सारे बच्चों की आवाज़ आ रही थी। मोहित उठा, खिड़की के पर्दे हटाए और देखा तो ढेर सारे बच्चे चिल्ला-चिल्ला कर खेल रहे है और साथ में राधा अपने में भाग-भाग के उनको पकड़ती हुई यहाँ से वहाँ दौड़ रही थी।

जो ज़िंदगियाँ होती है वही जीना जानती हैं , ज़माने से बेपरवाह , अपनी ही धुन में रमी हुई ज़िंदगियां ऊपर वाले की देन होती हैं । उनकी मासूमियत ऊपर वाले की नियामत होती है। ऐसी ही एक मासूम सी ज़िन्दगी एक टांग पर बच्चों के साथ लंगड़ी टाँग करके, दुपट्टा साइड में गाँठ बाँध कर दौड़-दौड़ के छू रही थी। जैसे अपनी मासूमियत बच्चों को छू-छू कर बाँट रही हो। मोहित थोड़ी देर खड़ा रहा, फिर पलटा और कमरे से बाहर आया।

एक लंबी सी राहदारी थी जो कि चौकोर हिस्से में बनी हुई थी, नीचे दो मंज़िले और थीं, हर मंज़िल से नीचे जाने के लिए गोल सी सीढ़ियाँ थी जो ब्रिटिश ज़माने की कारीगरी दिखा रही थी। जिस मंज़िल पर मोहित था उस पर सिर्फ़ दो कमरे, एक उसका और एक उसके ठीक सामने। उसके कमरे के दाएँ और बाएँ बड़े-बड़े दो दरवाजे,जो राम जाने कहाँ खुलते होंगे। मोहित फिर कमरे में आ गया, ख़िड़की से बाहर अब शोर नहीं आ रहा था, राधा भी कहीं गायब हो गयी थी। तभी पीछे से आवाज़ आई, “उठ गये आप?” “ह्म्म्म्म” “आपके कपड़े बाथ रूम में रख दिए है,नहा लीजिए, नाश्ता तैयार है,फिर आपको कहीं लेकर चलना है” मोहित रोबोट की तरह उठा और पंद्रह मिनट के बाद नाश्ता कर रहा था। “मटर डाल के बने हुए पोहे और साथ में ऊपर से नमकीन बुरका हुआ”

मोहित चौंका, इसे कैसे मालूम? पर कुछ बोला नहीं। राधा समझ गयी थी, बोली “हमें सब पता है” “कहाँ चलना है?” मोहित ने पूछा और सिर्फ राधा मुस्कुराई थी।

ये कमबख्त बोलती क्यूँ नहीं है। मोहित को अब गुस्सा आने लगा था। राधा मुस्कुराती और मोहित तप उठता। मोहित ने अलमारी खोली, सफेद शफ्फाक शर्ट्स, डेनिम और कुछ कुर्ते पजामें सामने करीने से टँगे हुए थे। उन में से मोहित एक सफ़ेद शर्ट और जींस पहन कर आ गया । शायद उसी के नाप के थे। क्यों थे, नहीं पता था उसको, बस फिट आ गए थे सो कुछ ना पूछा और तैयार होकर सीढ़ी से नीचे उतर आया।

नीचे कहीं से हवन की सी खुशबू आ रही थी, मोहित बाहर आया तो राधा इंतज़ार कर रही थी। राधा ने आवाज़ लगाई, “बाबा,चाभी लाइए” कोई एक बुजुर्ग आए, झुक के चाभी दी और लौट गए। राधा मोहित को वही रुकने का इशारा करके पीछे कहीं चली गयी। अचानक मोहित को पीछे से किसी गाड़ी की आवाज़ आई। मुड़ कर देखा तो राधा एक खुली जीप ड्राइव करती हुई आ रही थी। मोहित के पास आकर वो रुकी, मोहित को इशारा किया, मोहित बैठ गया और जीप चल दी। पहाड़ी इलाक़ा था पूरा, शायद कल रात बारिश हुई थी।

“कॉफ़ी पिएंगे अIप?” “नहीं, तुम पहले ये बताओ कि हम कहाँ जा रहे हैं?,मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?,तुम कौन हो?” “अIपको एक सुंदर सी जगह ले जा रहे हैं जहाँ जाकर अIपको अच्छा लगेगा, थोड़ा सा सब्र कीजिये” “अब और नहीं प्लीज” “प्लीज़ सब्र कीजिये” “अच्छा इतना तो बता दो की इंद्र कहाँ है? भानु कहाँ है?” “इंद्र ठीक हैं पर अभी आपके बारे में बताया नहीं उसे , उसके इम्तिहान चल रहे हैं, अगर बताती तो रुकता नहीं और चला आता” “भानु अIज रात आ रहे हैं, दीपाली के साथ” “और आप?”

“हम??? आपको पता हैं ना? राधा नाम है हमारा” इस बार मुस्कुराई तो मोहित भी मुस्कुरा दिया। गाड़ी अब ढलान की जगह ऊपर की ओर जा रही थी, राधा एक एक्सपर्ट ड्राइवर थी शायद तभी बड़े आराम से चलाए जा रही थी। सामने सड़क ख़त्म होती हुई दिखी और दिखा एक बड़ा सा दरवाज़ा जिस पर लिखा था “प्राइवेट प्रॉपर्टी”

राधा ने हॉर्न बजाया तो दौड़ कर आकर एक वर्दी वाले ने दरवाजा खोला । अंदर जाकर फिर थोड़ा ऊपर की तरफ़ रास्ता था, राधा ऊपर वाली सड़क पर ले गयी और जहाँ गाड़ी पार्क की वो एक छोटा सा मैंदान था। मोहित उतरा तो आँखें खुली रह गयी।

चारो तरफ़ खुला नीला सफेद आसमान, गीले पत्तों की खुशबू और दूर दूर तक सिर्फ़ सन्नाटा । पीछे एक छोटी सी कॉटेज थी। राधा मोहित के पास आई और उसे उसकी डायरी दे कर बोली, “आप बैठिए रूही के पास,हम अIते हैं, कुछ चाहिए हो तो बेल बजा दीजियेगा” उसने एक झूला कुर्सी की तरफ़ इशारा किया।

मैंदान के कोने में एक छतरी के नीचे एक टेबल, कुर्सी उसका इंतज़ार कर रही थी । मोहित मुस्कुराया और कुर्सी की तरफ चल दिया। टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट, लाइटर, कॉफ़ी मग, एक घंटी और एक केतली बड़े करीने से रखी हुई थी। मोहित कुछ सोचता रहा और बैठ गया। सामने सब कुछ खुला सा मंज़र था। बादलों और धूप की अठखेलियाँ चल रही थी ,धूप दूर कहीं नीचे शहर में दिखती तो कभी सर के ऊपर रौशन हो जाती।

दरअसल बारिशों की धूप मनचली महबूबा की तरह होती है, जो कब आती है कब जाती है पता नहीं होता। आप उसके तसव्वुर में बैठे रहें तो नहीं आयेगी और ज्यूँ आप रूठे तो छम्म से सामने आ जायगी। मोहित ने एक सिगरेट जलाई और डायरी खोली।

2 जनवरी 2017,

सुबह उठ कर सबसे पहले मोहित ने रूही को फोन किया, नहीं उठा, BBM किया नहीं रीड हुआ। दर्जनों बार कोशिश करने के बाद मोहित ऑफिस के लिए तैयार हुआ और निकल गया। मोहित आठ बजे ही निकल जाता था और लौटता ग्यारह से बारह बजे के आसपास। आज चूँकि आबूधाबी में एक मीटिंग थी सो ज़रा जल्दी निकल गया था। रास्ते में ही रूही की कॉल आई, “हेल्लो हीरो, पहुँच गये आराम से?” “हाँ रूही” “मेल भी पढ़ ली तुम्हारी” “ओके, रूही ने कहा, मैं आज ज़रा बिज़ी हूँ, कल बात करती हूँ” “रूही, सुनो तो” “कल बात करते है मोहित” उखड़ी क्यूँ थी रूही? क्या हुआ था? किसी किसी दिन ऐसा क्या हो जाता था की बेगानी सी लगने लगती थी । वो एक दिन एक हफ्ते का हो गया। न कोई मैसेजेस, न कोई कॉल, रूही ने कोई जवाब नहीं दिया। इस बीच इंद्र का फॉर्म भर गया और तय हुआ कि जून में इंद्र इंडिया चला जायेगा। शबाना अपने NGO में बिज़ी थी और दस-बारह दिन से बात नहीं हुई थी मोहित की उससे। आठ जनवरी को रूही का फोन आया, “कहाँ हो तुम?” “अबूधाबी जा रहा हूँ रूही,क्या हुआ,कहाँ हो तुम, इतने दिन से कोई खबर नहीं” “बस मन ठीक नहीं” “हुआ क्या है रूही?” “पता नहीं” “तबीयत ठीक है रूही?” “हाँ पर मन कच्चा सा हो रहा है” “बात क्या है? घर पर् सब ठीक है ना?” “हाँ रे” “मैं करता हूँ कुछ, रुक ज़रा” मोहित ने साइड में कार खड़ी करी, फोन पर कुछ चेक किया, “रूही मैं ज़रा एक मीटिंग में जा रहा हूँ, आकर बात करता हूँ” “तेरे पास बस मेंरे लिए टाइम नहीं है ना,बाकी सब के लिए बहुत टाइम है” और भड़क कर फोन काट दिया रूही ने । मोहित मुस्कुराया, 2 घंटे बाद, मोहित जेट एरवेस की फ्लाइट पकड़ चुका था। ग्यारह बजकर दस मिनट पर मोहित ने रूही को BBM किया, “रेडियंट पहुँच दो बजे” झट से रूही का कॉल आया, “तू कहाँ है?” “रास्ते में रूही” “तू पुणे में है?” “तू होटेल पहुँच फिर बात करते हैं” “तू सटक गया है क्या?” “हाँ, कह कर मोहित ने फोन काट दिया” रूहीआई,लॉबी में मोहित इंतज़ार कर रहा था, बोला, “रूही ऊपर चलते हैं” रूही कुछ नहीं बोली, लिफ्ट की तरफ बढ़ गयी।

ज़िंदगी आपको जीने के कई मौके देती है और जब देती है तो आपके दिमाग़ और दिल में से एक कोई काम कर देना बंद कर देता है। जो जीना चाहते है वो दिमाग़ पर ताला लगा देते हैं। जो रोते रहना चाहते है वो दिमाग़ की दुहाई देते रहते है। रूही एक ऐसे पहेली थी जिसका न ताला था ना चाभी। वो एक ऐसी पहेली बन चुकी थी जिसे बना कर शायद ऊपर वाला भी भूल गया था, इतने पेंच डाल दिए थे ऊपर वाले ने इस पहेली में कि अब तो शायद रूही खुद भी सुलझा नहीं सकती थी।

8 जनवरी, 2017 ,कमरा नंबर 512, रेडियंट होटल, पुणे

रूही कमरे में दाखिल हुई तो ना कोई कशमकश थी और ना कोई हिचक। सीधे टेबल पर बैग रखा और चेयर पर बैठ गयी। फिर बोली, “तू एक काम कर ज़हर ले आ और मार डाल मुझे । ऐसे अचानक से हार्ट अटैक से मर गई तो बच्चों को कौन संभालेगा?” मोहित मुस्कुरा दिया पूछा, “अब मन कैसा है रूही? अभी भी कच्चा है या पक्का हुआ?”

“सुन, न किया कर ऐसे, मैं तो पागल हूँ ना, तुझे पता है, तू ज़रा ज़रा सी बात पर ऐसे आयगा क्या? तू ज़रा भी नहीं बदला ना? पहले भी ऐसे ही….” फिर कुछ कहतेकहते रुक गयी । शायद हलक़ में कुछ फँस गया था रूही के या ये वो मोहित के दिल में फंसी हुई फाँस थी जो रूही के हलक़ में अटकी हुई थी। “अच्छा, ये बता क्या हुआ रूही, क्यूँ परेशान थी?” “कुछ नहीं रे , मैं और मेरी ज़िंदगी बस” “क्या हुआ ना बोल?” “वो पहली तारीख को हम शिर्डी गये थे ना, उस दिन मुझे भाई से मिलना था और हमारा शिर्डी जाने का ही प्रोग्राम था” अब मोहित की चौकने की बारी थी। “तूने बोला क्यूँ नहीं रूही” “कैसे बोलती रे तू इतने मन से, इतनी दूर से सिर्फ़ मेंरे लिए आया था और वो भी सिर्फ़ इसलिए की मुझे बाबा से मिलना था, कैसे बोलती? और बस इसी से भाई बहुत नाराज़ है, पिछले सत्रह साल में पहली बार ऐसा हुआ कि मैं भाई से नहीं मिली हूँ पहली तारीख को । वो दिन भर इंतज़ार करता रहा और मैंने फोन भी नहीं उठाया। बस इसी बात का कलेश है इतने दिन से”

मोहित कुछ नहीं बोला था। “भाई” यानी की रूही का पास्ट, जिसे वो अपना प्रेज़ेंट और फ्यूचर मानती थी। “भाई” यानी की वो शख्स जो रूही के साँसों में बसता था। “भाई” यानी की रूही की ज़िंदगी का पहला प्यार। “भाई” यानी की रूही की ज़िंदगी।

रूही नाम की पहेली का एक और पेंच । मोहित को जब बताया था रूही ने अपने उस पास्ट के बारे में तो ये भी कहा था कि तेरी हरकतें उस से बहुत मिलती है,वैसे ही बोलता है, करता है, दीवाना वैसा ही सा है। उस जैसा ही लगता है, बस तब से उस “पास्ट” का नाम भाई रख दिया गया था आम बातचीत के लिए। मोहित ने नाम पूछा था तो रूही ने नाम बताने के नाम पर मुस्कुरा दिया था बस उस रोज़। मोहित ने कुछ जवाब नहीं दिया, उठा और सिगरेट जलाई और खिड़की के पास खड़ा हो गया। रूही,पास आई और मोहित का हाथ पकड़ के बोली, “थैंक्स, मुझे इतना खास फील कराने के लिए” मोहित कुछ नहीं बोला, मुस्कुराया और पूछा, “मन कैसा है अब ये बता?” “अब तो खट्टा सा हो रहा है हीरो और कस के हँस दी थी रूही”

ऊपर वाला भी बस हंसने ही वाला था उस रोज़ ….

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-8

  1. “दरअसल बारिशों की धूप मनचली महबूबा की तरह होती है, जो कब आती है कब जाती है पता नहीं होता। आप उसके तसव्वुर में बैठे रहें तो नहीं आयेगी और ज्यूँ आप रूठे तो छम्म से सामने आ जायगी। ”
    आपकी ये उपमा बहुत पसंद आयी, रचना तो अद्भुत है ही, अगले भाग का इंतजार रहेंगा😇

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