रूही – एक पहेली: भाग-6

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“मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?” “तुम कौन हो?” “ये कौन सी जगह है?” “मैं कब से यहाँ पर हूँ?” “कौन लाया मुझे?” कहते कहते फिर सर फटने लगा मोहित का,चेहरा लाल सा होने लगा था। वो उठी जल्दी से और मोहित का हाथ थाम के बिस्तर मे ले गयी, उसे धीरे से लिटाया और कहा, “कहा न, राधा नाम है हमारा, बाकी सब बाद में बताएँगे ,आराम से, आप आराम करें, हम फिर आते हैं। मोहित छटपटा रहा था, अपने सवालों के जवाब देता खुद कब सो गया, याद नही। आँख खुली तो रात गहरा चुकी थी। राधा ने धीरे से नॉक किया और कमरे मे दाखिल हुई, रोशनी की पर्दे खोले और फिर मोहित को उठाया। मोहित उठा और फिर कुर्सी पर आकर बैठ गया और राधा मोहित के पैरों के पास। “टीवी देखेंगे आप?” मोहित ने नहीं सुना। “कुछ खाएंगे आप” मोहित ने नहीं सुना। राधा ने अपने पर्स से सिगरेट की डिब्बी निकली, लाइटर निकाला और मोहित की तरफ बढ़ा दिया । मोहित ने राधा की और देखा और फिर ढेर सारे वही सवाल । “मैं कहाँ, कब, कौन और तुम कौन?” जवाब सीधा और सच्चा आया था , “ मैं राधा”

मोहित उठा, डिब्बी ली, बाहर बाल्कनी मे आया और एक सिगरेट सुलगा ली। दूर कहीं पहाड़ों मे दिए टिमटिमा रहे थे, घर तो नही दिख रहे थे पर उनमे से उठता हुआ धुआँ दिख रहा था। कमबख्त बारिश हो के चुकी थी, खुशबु से तो यही ज़ाहिर होता था। चौथाई सा चाँद टिमटिमा रहा था। अमावस जा रही थी या पूरनमासी ये अंदाजा लगा पाना अभी मोहित के बस में नहीं था। पर इस चाँद पर दाग नुमायां नहीं हो रहे थे। क्या ही अच्छा होता कि चाँद इतना ही होता ? पूरा नहीं होता, ना पूरा होता, ना दाग़ दिखते और ना कमबख्त बदनाम होता।

मोहित को अचानक कुछ याद आया, वो एक दम से अंदर आया और भाग के बाथरूम मे गया, लाइट जलाई और आईने मे अपने आप को देखा। “ये कौन शख्स था सामने?” हलकी से शेव ,आँखों के नीचे काले धब्बे । वो एक दम से पीछे हो गया, फिर देखा अपने को और घबरा गया, बाहर आकर पूछा, “सुनिए, प्लीज़ बताइए मैं कहाँ हूँ?” राधा, मुस्कुराई, बोली, “आप घर पर हैं , बैठिए बताते हैं सब” “ पर पहले आप टीवी देखिए जब तक मैं कुछ बना कर लाते हैं हम”

मोहित ने टीवी ऑन किया और चैनल सर्फ करने लगा, क्रिकेट का दीवना था। ESPN लगाया और हाईलाइट देखने लगा, इंडिया पाकिस्तान से 10 ओवर मे जीत गया, मोहित को विश्वास ही नही हुआ कि इतना कैसे बदल गयी इंडिया की टीम और ये क्या, पाकिस्तान तो 50 ओवर का मैच खेलने आई थी, ये तो कुछ नया सा फ्रोमेट है। धवन क्यूँ नही खेल रहा और ये तारीख कौन सी है?

18 मार्च 2021

मोहित एक दम से उठ के खड़ा हुआ, भाग के बाहर गया, “राधा …………..राधा,कहाँ हो तुम?? राधा …….” राधा दौड़ कर आई, “क्या हुआ?” मोहित ने उसे पकड़ कर कुर्सी पर बैठाया और बोला, “मुझे नही समझ आ रहा है कुछ भी, मैं कहाँ हूँ?”

“ये मैं 2021 मे क्या कर रहा हूँ? मैं तो मुम्बई मे था, भानु से मिल कर लौट रहा था । अरे भानु कहाँ है? क्या हुआ है? मैं कहाँ हूँ?”

राधा चुपचाप उसे देखे जा रही थी । मोहित जब बोल बोल कर हाँफ गया तो शांत हो गया । राधा ने उसे पानी का ग्लास दिया और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गयी । “आप पंचमढ़ी मे हैं, आप 3 साल से कोमा मे थे, आपका एक्सीडेंट हुआ था 2018 मे”

18 फरवरी 2018 को हुआ था आपका एक्सीडेंट …. “मैं कोमा मे था? इंद्र कहाँ है? शबाना कहाँ है? और रूही???????????????? ” “तुम कौन हो? मेरे साथ क्या कर रही हो? कौन हो तुम मेरी? मेरी डायरी कहाँ है?”

“आपके सारे जवाब यहाँ हैं” राधा, घूमी, सामने एक अलमारी खोली और उसमे से जिल्द की हुई डायरी मोहित के हाथ मे रख दी । मोहित ने राधा की तरफ देखा और आँखों ही आँखों मे पूछा, राधा ने धीरे से हाँ मे सर हिला दिया, मोहित ने गहरी साँस ली और डायरी खोली ।

आख़िरी एंट्री –

17 फरवरी 2018

”आज मैं फिर रूही से मिल कर आया, ऐसा लग रहा है कि रूही कुछ बदल गयी है । ये पहली वाली रूही नहीं है । वो नहीं जो मेरे साथ थी ,वो नहीं जो साथ रोती हँसती थी , ये वो नहीं जो दिन भर बकबक करती थी । आज किसी और ही रूही से मिल कर आया। क्या पहेली है ये नयी रूही? तुम फिर से जाने वाली हो? ना ना ना”

बोल आया हूँ, धीरे से, अब मैं लौट के नही आऊंगा रूही और रूही ने कहा वही जो गुस्से में कहती थी “जो मन है करो” रूही का नाम पढ़ते ही मोहित के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गयी थी, पन्ने पलटने लगा, ये मोहित का सबसे पसंदीदा काम था, राधा खड़ी हुई थी। मोहित ने पूछा, “आप कौन हैं?”

राधा मुस्कुराई, आप अपनी रूही से मिल लीजिए, मैं आती हूँ।

मोहित ने पन्ने पलटे …. पहली जनवरी 2017

घंटी बजी रूही के फोन की, अनजान सा नंबर था, नहीं उठाया रूही ने, फिर दोबारा आया, नहीं उठाया रूही ने। bbm पर पिंग हुई । “नया साल मुबारक़ रूही” रूही मुस्कुरा दी, एक स्माइली भेजी तो फिर पिंग हुई, “फोन उठा लिया कर बे कभी-कभी” “तेरा फोन ही नहीं आया” “अबे किया तो था अभी” “हैं????” “हाँ” फिर एक कॉल आई और रूही ने झपट कर फोन उठाया। “तू, इंडिया मे है?” “हाँ” “कब आया?” “आज सुबह” “क्यूँ आया?” दूसरी और से ज़ोरदार वाली हँसी सुनाई दी मोहित की “अच्छा बता फ्री है आज थोड़ा रूही तू?” “हाँ, हूँ बोल?” “मियाँ जी कहाँ है?” “वो तो मुंबई गये हैं आज ही सुबह, बताया तो था ना परसों, कि 31st की पार्टी के बाद सुबह-सुबह वो निकल जाएँगे, भुलक्कड़ राम” “हम्म्म…………” “अच्छा, बताओ ना कब फ्री होगी?” “मैं तो दिन भर फ्री हूँ” “ठीक, तो तैयार हो जा, मैं पुणे मे हूँ” “क्या??????????????????????” “हाँ जी” “तू पागल है क्या? ऐसे अचानक से आ जाता है, किसी दिन मेरी जान ले लेगा तू, देख लेना” “हा हा हा, कोई ना, मंदिर के बाहर मिल एक घंटे मे” “बस आयी” पुणे मे वैसे ही बारह महीने मौसम प्यारा सा ही होता है। उस दिन भी हल्की बूँदा बाँदी हो रही थी, रूही आधे घंटे मे मंदिर के बाहर खड़ी थी। मोहित वही मिला उसे, रूही तो वैसे ही उसे अचानक से देखकर सन्नाटा खा जाती थी। आँखें बड़ी-बड़ी और बस चुप्प और गुस्सा भी वही झूठ वाला। मोहित ने बैठाया गाड़ी मे और सबसे पहले ये पूछा, “कब तक घर जाना है रूही?” “शाम तक फ्री ही हूँ” “ओके देन, हम शिर्डी चल रहे हैं रूही” “क्या????” रूही ने पहली बार उस दिन मोहित का हाथ पकड़ा था, मोहित का हाथ गेयर पर था और रूही का हाथ मोहित के हाथ के उपर। मोहित ने कुछ नहीं कहा, तभी कुछ गीला सा लगा मोहित को, हाथ पर। रूही के आँसू बह आ ये थे कुछ। सीट पर सिर टिका कर के बैठी थी, मोहित के हाथ अपने दोनों हाथों मे लेकर। मोहित घबरा गया, साइड मे कार रोकी, पूछा, “शिरडी नहीं जाना है क्या?” “तू सिर्फ़ इसलिए आया है रे?” “हाँ, रूही, तूने कहा था ना की बाबा के पास जा ही नहीं पाई आज तक, मौका नहीं मिलता और मैंने कहा था ना कि बस चलते है तो चलो बस” रूही की वही एक रट, तू इतनी दूर से बस इसलिए आया की मुझे शिर्डी जाना था? “हाँ, रूही” “तू पागल है रे, क्यूँ करता है ये सब” “हाहाहा क्यूँकी मैं पागल हूँ ना” “करीब दो सौ किलोमीटर का रास्ता था” ज़िंदगी का सबसे शानदार सफ़र मोहित का । लंबी ड्राइव, रूही साथ मे, सन 60-70 के गाने, मौसम अपना सा, बस और क्या?? काफ़ी था ना ? कॉफ़ी के लिए रुके थे एक जगह बस। रूही रास्ते भर बस मोहित का हाथ पकड़ कर बैठी रही और मोहित को सुनती रही। मोहित दुनिया भर की सुनIता रहा, हँसता रहा। सिर्फ़ एक बार रूही ने कहा, “तू मुझे बाबा के पास ले कर जा रहा है, तुझे पता हैं ना?” “हाँ, पता है, इसका मतलब भी पता है “ और रूही मुस्कुरा दी थी। बीच मे एक दो फोन आए, रूही ने बात नहीं की, बस एक फोन पर कहा कि आज नहीं हो पाएगा और काट दिया। पूछा मोहित ने, सब ठीक है ना? रूही का जवाब था, अब सब ठीक हो गया दस बजे मंदिर पहुँचे, मंदिर के अंदर जब गये तो मोहित पीछे था। रूही ने बड़ीबड़ी आँखें तरेर कर उसे पास बुलाया, हाथ पकड़ा और आँख बंद कर ली। मोहित बस रूही को देख रहा था , कब मंदिर से बाहर आए, मोहित को याद नहीं।

रूही ने झटका दिया, “ओ, हीरो, बाहर आओ, फेरे नहीं ले रही थी तेरे साथ, होश मे आ जा” मोहित फिर होश मे आ गया। ऐसी ही तो थी रूही –“एक पहेली” रूही, लौटते समय थोड़ा नॉर्मल हो चुकी थी, इतना खुश रूही को मोहित ने कभी नहीं देखा था।

रूही खुश थी और हँस रही थी। मोहित बहुत खुश था और बहुत हँस रहा था। आने वाला समय बहुत-बहुत खुश था और बहुत-बहुत हँस रहा था। उपर वाले की डुगडुगी की आवाज़ दोनों को नहीं सुनाई दे रही थी।

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-6

  1. इतने तेजी से बदलते जज्बात को कैसे आपने रोशनाई दी, महादेव जाने 🙏, पर्वत, बारिश, मंदिर और एक नया किरदार “राधा” ,आनंद आ रहा है पढ़ कर ,अगले भाग की प्रतीक्षा रहेंगी 🥰😇🙏

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