रूही – एक पहेली: भाग-5

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मोहित नहीं लौट पाया फिर कभी , रूही ने लौटने ही नहीं दिया फिर मोहित को। वो पहले 5 मिनट मोहित की ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत लम्हे थे। शायद हाँ ,शायद नहीं या पता नहीं, कुछ नहीं पता लगा मोहित को। मोहित ने रूही को देखा , मुस्कुराया और बोला, “मुझे मालूम था रूही कि तुम ज़रूर आओगी” “कहाँ थे तुम,बिना पूछे चले गए ,एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा, मेरा क्या होगा? बस अपने बारे में सोचा तूने?”

और भी बहुत कुछ। मोहित बोला, “जाना ज़रूरी था रूही, वरना तुम बुलाती नहीं … “ “थप्पड़ खाएगा तू मेरे से, अब कभी गया तो” उस दिन मोहित ने बहुत कोशिश की कि रूही के हाथ को छू ले पर हाथ बढ़ता और फिर पीछे कर लेता। एक बार भी जी भर के नहीं देखा, वो आखरी बार जो मिलने आया था। रूही को दिखाने आया था कि अब मोहित की आँखों में आँसू नहीं आते पर कमबख्त आँखों ने धोखा दे दिया और २-३ टपक ही गए। उतने ही काफी थे रूही के लिए , रूही ने देख लिया जो उसे देखना था। मोहित ने रूही को देख लिया था और अब बस जाने की तैयारी थी। मोहित उठा ,रूही ने रोक लिया। कहा, “रूही जाने दो” बोली, “नहीं ,अपनी मर्ज़ी की बहुत कर ली तुमने, बस, अब नहीं, चुपचाप बैठो और मेरी बात सुनो।” मोहित ने कोशिश की मुस्कुरा दे पर फिर कमबख्त आँखों ने धोखा दे दिया। ये जो आँखें होती है साली बड़ी दगा ज़ होती है। आप जब चाहते है कि साथ दे, बस उसी वक़्त धोखा दे जाती है। आज तक जितने शहीद हुए है ,सारे के सारे ,सभी को किसी न किसी के नयनों ने ही डसा था। रूही जानना चाहती थी कि इतने सालों में जब वो नहीं थी तो हुआ क्या था। मोहित ने बताया ,रुक-रुक कर बताया ,कुछ बताया कुछ छुपाया और फिर पहली बार किसी के सामने रूही की आँखे गीली हुई।

ये क्या हो गया था? कब हो गया था?मोहित को उस से इतना प्यार था?

कब हुआ और हुआ क्यों??

गिनती की 56 मुलाकातें और बस 10-15 हज़ार काल्स ? इतने से कभी किसी को प्यार होता है?

मोहित को हुआ था और बेहद हुआ था। रूही को नहीं दिखा क्यूँकि वो तो “मोहित” से प्यार करती थी। माहौल को हल्का करने के लिए,मोहित, सामने के शॉपर्स स्टॉप में रूही को ले गया। कुछ ड्रेस रूही को दिलवाई ,अपने आप सेलेक्ट कर, कुछ बच्चों के लिए ली, कुछ खिलोने लिए। रूही चुपचाप चलती रही साथ में, जो मोहित ने पसंद किया, सब में हाँ करती रही, मुस्कुराती रही।

बस यही मुस्कराहट थी ,बस ये ही वाली , इसी का दीवाना था मोहित। यही तो चाहिए था उसे और आज सालों बाद मिली थी वो मुस्कराहट। कैसे ना मुस्कुराता मोहित भी। उधर उपर वाला भी मुस्कुरा रहा था। असल में मुस्कुरा नहीं रहा था ऊपर वाला , पेट पकड़ पकड़ कर हँस रहा था उस दिन। फिर आ गया था पंछी जाल में। खिलोने में हल्की हल्की जान आने लगी थी ।मोहित सीधे एअरपोर्ट आया, फ्लाइट ली और सुबह पहुँच गया दुबई।

मेल चेक किया, रूही की मेल आई थी।

Hi , jst had some wrd wd u It ws lovely meetg you bbbaahhut acha laga tumhe rote nd muskuraate nd aahe bharte nd tadpte nd bahut kch dekh kar 🙂 U r same as before woi masti nd emotions nd I knw wl nevr chang it fr me Thora mann mei laga bas ki itne tough tme mei mai tumhe theek karne ke liye kch nai kar pai kbi kbi presenc feel hona nd present hona alag hota hai muje hona chahiye tha us saalo mei Neways,,be happy always । keep smilg hard workg hamesha se ho so waise hi rao Bakki num num Aur haa shoppg badi hak se karvate hai sir aap maine kaha tah na ki bhagwan hai…………

मेल क्या था एक तूफ़ान था वो, जो इतनी शान्ति से आया था कि उसकी गंभीरता का अंदाज़ा दोनों को नहीं था। रूही ने एक कदम आगे बढ़ाया था। ऊपर वाले ने शायद कुछ और सोच के रखा होगा। मोहित ने वो मेल पढ़ी, फिर पढ़ी और फिर पढ़ी। आजकल मोहित को शांत रहना आ गया था। मेल का जवाब दिया और सो गया। पर कहाँ नींद आनी थी। पिछले सालों की सारी तल्खियाँ इस मेल ने खतम कर दी थी ॉ।

“pahunch gaya jaan Dubai reached house at 1 pm m in now office bahut saaree kaaam hai monday will go to Hongkong baaki sab theek thaak hai ek baat kehna tha tum bilikul nahi badli waise hi pyaari see meri aankhon ke aansu ko apna bana lene wali meri wahi Roohi tumne zaban se kabhi kuch nahi kahan na aur hum bhi na samjhne ka dikhawa karte rahe chalo jo hai accha hai jitni bhi mili ho । utna bahut hai । kaaafi hai dher saara pyaar ”

ये जो ऊपर वाला होता है कभी-कभी ही मज़ाक के मूड में आता है और जब आता है तो कुछ लोगों को हँसने के लिए और कुछ लोगों को रोने के लिए छोड़ जाता है। अब इस बार जब उस ऊपर वाले ने जो सोचा था वो ऐसी खलबली मचाने वाला था कि कुछ ज़िंदगियाँ हमेशा के लिए बदल जाने वाली थी।

अभी तक आप लोगों ने रूही और मोहित की वो कहानी पढ़ी है जिसमे एक तरफ सिर्फ दर्द था और दूसरी तरफ कुछ नहीं क्युकि रुही को कभी अंदाजा ही नहीं था मोहित की दीवानगी के बारे में। अब हुआ था? शायद? या अभी नहीं नहीं ? आप लोग आने वाले समय में रूही पर उँगलियाँ भी उठा सकते है, मोहित को पागल, दीवाना, बेवक़ूफ़ भी कह सकते है ,आपकी अपनी मर्ज़ी है । न तो रूही को फर्क पड़ने वाला था और न मोहित को। ये जो दो ख़त आपने पड़े है ये उन हजारों खतो में से पहले वो दो ख़त है जिनसे मोहित की और रूही की प्यार की दास्ताँ शुरू होने वाली थी। मोहित दीवाना था और रूही झल्ली । मोहित को दीवाना बना देने वाली झल्ली रूही।

आप सब ने इतना कुछ पढ़ लिया रूही के बारे में पर किसी ने ये नहीं पूछा कि रूही कहाँ की रहने वाली थी ? फ़िलहाल पुणे में रहती थी रूही वहीं पैदा हुई, वहीं किसी को पसंद कर लिया। चार साल सिंधिया हॉस्टल में गुज़ारे पढाई के , तीन साल नौकरी की गुड़गांव में। मोहब्बत की फिर शादी कर ली दिल तोड़े , फिर दिल लगाया ,फिर दिल तोड़ा और अब फिर से आगे बढ़ी थी। कुछ टूटे हुए दिल के साथ किसी का टूटा हुआ दिल जोड़ने के लिए।

पहेली अपने आप में उलझ गयी थी इस बार….

इस आदमी के कानो मे धीरे-धीरे कुछ आवाज़ें आ रही थी, आँख खोलने की कोशिश की तो सर फटने लगा, फिर आँख बंद की तो कुछ आराम मिला। मन किया कि करवट लेकर उठ जाए। हिम्मत की, करवट ली तभी किसी के ज़ोर से चीखने की आवाज़ सुनाई दी।

“सिस्टर, सिस्टर ,इन्हे होश आ रहा है”

मरीज़ की आँखें फिर बंद होने लगी थी। कानों मे हलकी-फुल्की सी आवाज़ सुनाई दे रही थी किसी की, “जल्दी डॉक्टर को बुलाओ, जल्दी करो” और साथ ही किसी के सुबकने की आवाज़ भी। सब कुछ इतना गड्डमगड्ड कि मरीज़ का सर फटने लगा फिर से और सब धुंधलाने लगा आँखो के सामने। कोई था जो उसके माथे पर हाथ फेर रहा था, किसी की आवाज़ें फिर से सुनाई दे रही थी और उसको इतना तो समझ आ गया था कि वो किसी हस्पताल मे है। फिर कोशिश की उठने की और फिर वही हाल। किसी ने कहा, “नही उठिए आप, प्लीज़ । लेट जाइए” उसे कुछ समझ नही आया, हल्की सी रोशनी थी कमरे मे, अंधेरा सा नही था, कुछ मशीने दिखी , लाल-पीली बत्तियाँ उन पर ढेर सारे तार और दिखी एक सोफे पर बैठी परछाई जो कुछ बोल रही थी।

मरीज़ को कुछ नही समझ आ रहा था फिर पास आती दिखी एक सफेद परछाई, हाथ मे कुछ चुभने का एहसास हुआ और फिर घुप्प अंधेरा छा गया। साल, महीना, तारीख इस मरीज़ को कुछ पता नही था ।

आप मे कुछ लोग इस पागल को भूले तो नहीं ना ?

मोहित नाम है इस का जो इस समय एक हस्पताल के बिस्तर पर फिर से जीने के लिए तैयार है, ऊपर वाले का सबसे फ़ेवरेट टाइम पास है मोहित। जब भी ऊपर वाला बोर हो जाता था तो मोहित का नंबर डायल कर देता था और इस बार फिर ऊपर वाला मज़ाक के मूड मे था। एक दो दिन तक यही हाल रहा मोहित का, कब आँख खुलती, कब सोता, कब जागता कुछ पता नही। सर का दुखना भी कम होने लगा था। एक दिन उसे सुनाई दिया, तैयारी हो गयी है सारी और फिर उसे समझ आ गया कि कहीं उसे ले जा रहे है। फिर वही सफेद, परछाई, फिर वही चुभन और फिर वही अंधेरा। ये अँधेरा और चुभन उसके सबसे ख़ास दोस्त बनते जा रहे थे। आँख जब खुली मोहित की तो उसे कुछ ठंडा सा लग रहा था, सामने बड़ी सी काँच की खिड़की, उसमे से दिखते हुए बड़े बड़े पहाड़, उनमे से झांकते हुए पेड़, और सूरज की नन्ही सी रोशनी । कहाँ था वो? किसको आवाज़ लगाए? उठने की कोशिश की, वो उठ गया, स्लीपर्स पहने, सहारा लेकर खिड़की के पास खड़ा हुआ। पहचानने की कोशिश मे लगा रहा कि है कहाँ, पर सिवाए पहाड़ों के, पेड़ों के कुछ नही था, दूर कहीं बच्चे खेल रहे थे। वो एक छोटे से पुराने किस्म के बंगले मे था जो शायद किसी अँग्रेज़ ने बनवाया लगता था। चारदीवारी के अंदर लंबी सी सड़क आती हुई, बड़े बड़े देवदार के पेड़, और दूर-दूर तक कुछ नही, दूसरी खिड़की की तरफ़ गया तो एक छोटा सा घर दिखा जो चारदीवारी मे ही था, वहाँ एक आदमी दिखा। मोहित ने आवाज़ लगाई, “भैया ………….”

आवाज़ कमरे मे ही गूँज के रह गयी और मोहित खुद अपनी आवाज़ से डर गया। ऐसा ही होता है, जब आप कभी अपनी आवाज़ सुनते है तो सच मे डर जाते है। वक़्त मिलता कहाँ है अब किसी को अपनी आवाज़ सुनने का। काश सुनी होती तो आधी से ज़्यादा ज़िंदगियाँ बरबाद होने से बच गयी होती। सबसे ज़्यादा आदमजात ने आज-तक खुद से झूठ बोला है, अपने से बेवफाई की है। जो वफ़ा अपने से की होती तो फिर बेवफाई का नाम लेने वाला कोई ना होता इस जहाँ में।

खैर, मोहित ने फिर आवाज़ लगाई । “भैया…………….” फिर कमरे मे गूँजी आवाज़ और साथ आई उसके पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ और साथ मे एक और आवाज़, “उठ गये आप???, बाबा का शुक्र है” मोहित मुड़ा, ये सामने कौन था?

मोहित की आँखों मे सवाल और जवाब देने वाला सिर्फ़ मुस्कुरा रहा था। उसने कुर्सी को खिड़की की तरफ सरकIया, मोहित को धीरे से बैठाया, एक शॉल डाला और फिर पूछा, “चाय पीने लगे हैं आप या अभी भी सिर्फ़ कॉफ़ी???”

मोहित को कुछ समझ नही आ रहा था। मोहित ने कहा, “आप बैठिए” उसने नही सुना, दरवाज़ा फिर से बंद हुआ और वो बाहर। मोहित कैसे भी कर के उठा, कमरे से बाहर आने की कोशिश की, तभी फिर दरवाज़ा खुला और आवाज़ आई, “आप बैठे रहिए वहीं”

दस मिनट बाद दरवाज़ा फिर खुला, मोहित की चाय ख़त्म नही हुई थी, वो वहीं झूला कुर्सी पर बैठा था। ढ़ेर से सवाल आँखों मे, चाय का प्याला अपनी तरफ करते हुए वो वही मोहित के पैरों के पास बैठ गयी, तकिये को गोद मे रख कर, नज़रे झुकाए झुकाए बोली,

“राधा” नाम है हमारा।

4 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-5

  1. कुछ भी न कह पाऊँगा कुछ लिखने की भी आवश्यकता नहीं लगती पर कथा कहानी को पढ़ते पढ़ते पाठक कहानी के साथ साथ बहने लगे तो ये लेखक के बेहतरीन प्रस्तुति से ही संभव है।
    याद नहीं कभी सुरेंद्र मोहन पाठक जी के किसी नॉवेल को ब्रेक दिया हो पढ़ते समय आज फिर वही 20 साल पहले वाले बबलू का पुनर्जन्म हुआ ।

    साधुवाद श्री मान मनीष जी,
    लेखनी को बल मिलता रहे माँ सरस्वती और गणपति की कृपा बरसती रहे आप पर महादेव तो अपनी कृपा बरसा ही रहे हैं

    1. आपकी शुभामनाओं के लिए आपका दिल से आभार..

  2. “वक़्त मिलता कहाँ है अब किसी को अपनी आवाज़ सुनने का। काश सुनी होती तो आधी से ज़्यादा ज़िंदगियाँ बरबाद होने से बच गयी होती।”
    पिछले चार भाग पढ़े, भावविभोर होते रहे, उलझती पहली सा ही है ये लेकिन फिर भी हृदय डूब जाना चाहता है|श्रीमान जी का परिचय ट्विटर से हुआ, ट्विटर के थ्रेड द्वारा मनोरम यात्रा कराते -कराते इस उपन्यास से अंतर्मन में यात्रा के लिए विवश कर दिए आप, अद्भुत लिखें, कई लाइनों में ऐसा लगता है कि अनुभवों को निचोड़ कर जीवन का सार लिख दिये हो🥰🙏

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