रूही – एक पहेली: भाग-38

शेयर करें

मोहित एयरपोर्ट पहुँचा तो देखा कोचीन की फ्लाइट कैंसिल हो गयी थी। सामने चंडीगढ़ की फ्लाइट थी, टिकट लिया और बैठ गया। चंडीगढ़ उतरा, किसी को नहीं जानता था। सामने शिमला की टैक्सी तैयार थी, जाकर उसमें बैठ गया। खिड़की से बाहर नज़र गयी मोहित की तो बादल ज़हर बरसाने को तैयार थे।

मोहित की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा नासूर बन गयी थी बारिश।

बैग में हाथ डाला, कुछ पन्ने हाथ लगे, पेन जेब में ही था। मोहित आज बादलों से बदला लेना चाहता था। ड्राइवर की आवाज़ आयी, साहब चाय पानी करना है कर ले। मोहित टैक्सी से उतरा, पहाड़ों की झोपड़ी वाली दुकान में एक कोने में पड़ी हुई टूटी हुई बेंच पर बैठा कर मोहित ने एक सिगरेट सुलगाई, बादलों की तरफ देखा, मुस्कुराया और कलम उठायी।

“मुझसे मोहब्बत ना करना,
मैं रोज़ तुम्हारे सपनो में आऊंगा…
रोज़ ……बेनागा और तब तक आता रहूँगा, जब तक तुम्हारे सपनो को तोड़ कर, बिखेर कर उन्हें चकना चूर ना कर दूँ..
मुझसे मोहब्बत ना करना,
मैं तुम्हे जान से ज़्यादा चाहूंगा,
तुमको इश्क़ के मायने समझाऊंगा,
तुम्हे प्यार, मोहब्बत, प्रेम और इश्क़ की बारीकियां गिनाऊंगा….
और जब तुम्हरा इश्क़ एक ज़ख्म बन जायेगा तो तुम्हे जूनून और दीवानगी से रूबरू करवाऊंगा..
और जब तुम्हारे ज़ख्म नासूर बन जायँगे तो उन्हें दूर बैठ कर कुरेदूंगा….
तुम, मुझसे मोहब्बत ना करना..
मुझे तुम्हारी कमज़ोरियाँ जाननी हैं,
मुझे तुम्हारे पहले प्यार के वक़्त में सफर करना है,
मुझे तुम्हारे उस गीत को जानना है जिसे सुनकर तुम्हारी कोर गीली आज भी हो जाती है,
क्यूंकि आने वाले वक़्त में वही गीत मेरी जीत का बिगुल होगा…
देखो , तुम मुझसे मोहब्बत ना करना..
मुझे तुम्हारी खूबसूरत यादो का सफर तय करना है,
मुझे तुम्हारी मुस्कराहट की वजह जानना है क्योंकि मुझे तुम्हारी यादों पर ढेर सारे धब्बे ताबिज़ करने हैं,
मुझे तुम्हारी खुशियों की तिजोरी में झांकना है क्यूंकि मुझे तुम्हारी उस तिजोरी को लूट कर ले जाना है,
मुझे तुम्हारे मुस्कुराते हुए लबों को नमक से पपड़ी हुए होंठों में तब्दील करना हैं..

मुझे ”तुम” को ”मैं” बनाना है..
इसलिए हो सके तो, गर हो सके तो मुझसे मोहब्बत ना करना…
बस तुम मुझसे मोहब्बत न करना…
मैं जाऊंगा नहीं प्रियतम, मेरे जैसे लोग कभी नहीं जाते, कभी नहीं जाते, जाकर भी नहीं जाते”

कागज़ मोड़ कर जेब में रखा , सिगरेट फेंकी , मुस्कुराया , ऊपर देखा और बोला,
“हाँ जी मालिक, अब कब बजने वाली है आपकी डुगडुगी? आपका खिलौना फिर से तैयार है”

ऊपर से कुछ आवाज़ नहीं आई..
क्या आती ?
बाजू के मंदिर में बस कोई डुगडुगी बजा रहा था।
कस के ठहाका लगाया मोहित ने …….
और थोड़ी देर बाद ….

टैक्सी मैं बैठा मोहित शिमला जा रहा था, पहाड़ों पर, नदियों की तरफ।
राधा पंचमढ़ी जा रही थी, पहाड़ों पर, नदियों की तरफ।
रूही कसौली जा रही थी, पहाड़ों पर, नदियों की तरफ।
और हाँ, आपको तो पता ही होगा।
शिमला और कसौली में सिर्फ पैंसठ किलोमीटर का सफर है।

4 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-38

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *