मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-34

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राधा मोहित को उसके कमरे तक छोड़ कर आयी। जाते हुए, लड़खड़ाती आवाज़ में मोहित ने राधा के दोनों हाथ को अपने हाथ में लिया और कहा,
“थैंक यू राधा”
राधा इसका मतलब समझ सकती थी। राधा रुकी, मोहित के बालों पर हाथ फेर कर वापिस चली गयी। खाली-खाली सा मोहित खड़ा रहा वहीं दरवाज़े पर डायरी हाथ में लिए और फिर अंदर चला गया। एक कोने में रामसिंह अलाव जल कर रख गया था। मोहित ने कुर्सी वहाँ खिसकायी, सिगरेट जलाई। डायरी खोली, पहले कवर फिर एक-एक करके सारे पेज जलाता गया। अपनी इस ज़िन्दगी से बहुत दूर जाना चाहता था। उसके पहले रूही को भस्म कर देना ज़रूरी था। एक-एक पन्ने के साथ मोहित की साँस उखड़ती सी रही,आँसू बहते रहे पर रुका नहीं वो। जब अपनी पूरी ज़िन्दगी को अलाव में फूंक चूका तब ही जाकर रुका मोहित।

सुबह होने को थी, शायद नई सुबह।

“अलविदा रूही”

ये करना कई बार चाहा था मोहित ने पिछले कई बरसों में, जब-जब रूही अचानक से गयी थी तब-तब। पर फिर अचानक से छम्म करके वापिस आ जाती थी और मोहित की डायरी में फिर से किस्से भरने लगते थे। लेकिन इस बार वो वक़्त को मौका नहीं देना चाहता था। कमरे में धुँआ बढ़ता जा रहा था। मोहित ने उठ के पर्दा हटाया। सुबह हो चुकी थी, बारिश रुक चुकी थी और आज आसमान साफ़ था। राधा लॉन में कुछ ढूंढ रही थी। मिल गया था उसे तो उठा लायी। मुड़ी तो मोहित खिड़की पर खड़ा दिखा। वह चौंक गयी, कमरे से धुँआ आया रहा था, दौड़ के आयी।
“कुछ हुआ? क्या हुआ अंदर?”

मोहित मुस्कुराया, “कुछ नहीं”

राधा दौड़ कर दूसरी तरफ से कमरे में आयी तो माजरा समझ आया जब अलाव के पास डायरी की फटी हुई जिल्द देखी।
गहरी साँस ली उसने और वहीं कुर्सी पर बैठ गयी। डायरी की जिल्द उठायी और मोहित को थमा दी। मोहित ने उसे भी तोड़ मरोड़ कर बुझती हुई आग में ख़ाक कर दिया। रही सही रूही भी जा चुकी थी और मोहित की आँखों से नींद भी जा चुकी थी।
आँखें खुश्क ज़मीन की तरह, बेजार सी। राधा समझ सकती थी पर कुछ नहीं बोली। हाथ पकड़ा मोहित का और बाहर ले आयी।

लॉन में बैठा कर अंदर गयी और कॉफ़ी लेकर आ गयी,
“कुछ और भी बाकी है” राधा बोली।
“क्या हुआ था फिर उस दिन”
“क्या होना था राधा, बाहर आया, जान ही नहीं बची थी अंदर, सब कुछ निचोड़ कर ले गए थे वो रूही का फैला काजल, बिखरे बाल और वो दो बियर की बॉटल्स। क्या सच था क्या झूठ कुछ नहीं जानना था मुझे। रूही के आँसू भी नहीं देखने थे जो मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी थे। उसकी आवाज़ जो मुझे ज़मीन के अंदर से भी खींच के बाहर ले आती थी। कुछ न देखना था ना सुनना था। नीचे आया, कार स्टार्ट की, पीछे मुड़ कर देखा ऊपर, रूही खिड़की पर खड़ी थी। हाथ जोड़ कर बुलाती हुई। कान हाथ से लगा कर बुलाती हुई। मैंने कार बैक की और तेज़ ले गया बाहर। हाथ काँप रहे थे। सीने में दर्द था जो बड़े जा रहा था। अचानक से जैसे सीने में किसी ने चाक़ू उतार दिया हो। इतना तेज़ दर्द हुआ कि पैर ब्रेक पर कस कर पड़ गए। फिर कुछ याद नहीं राधा। उसके बाद का राधा को पता था। सब एक एक पल का हिसाब था राधा के पास।

कार ड्राइव करते करते मोहित को दिल का दौर पड़ा था। ब्रेक लगते ही साथ पीछे से आते हुए ट्रक के टक्कर दे मारी थी। गाड़ी का कचूमर बन गया था। पर मोहित को ऊपर वाले ने बचा लिया था। अपने खिलौने को कौन तोड़ता है भला बस इसीलिए ऊपर वाले ने जान बक्श दी थी मोहित की। तीन साल अपने खिलोने को अलमारी में बंद करके रखा और फिर एक दिन दोबारा से खिलौने में चाभी भर कर तीन साल बाद थमा दिया राधा को।

और अब राधा को भी यही खिलौना चाहिए था।
मोहित, सबका प्यारा खिलौना।
मोहित आज शांत सा लग रहा था, वो जो बैचेनी से छाई रहती थी हर पल रूही से मिलने की वो अब कहीं भी आँखों में झांक नहीं रही थी। कल रात उस डायरी के साथ रूही को भी विदा कर चुका था वो।
“शायद”
हाँ शायद ही, फिलहाल शायद। मोहित के चेहरे पर सुकून देख कर राधा की हिम्मत नहीं हुई की वो मोहित को बताये कि वो रूही को मिल चुकी थी। उन दिनों जब उसने पहली बार मोहित की डायरी पढ़ी थी। दीपाली से मिन्नतें करके फोन नंबर लिया था रूही का। दीपाली ने मिलने से भी मना कर दिया था। पर रूही से मिलना राधा के लिए ज़रूरी था।
वो उस शै को जानना चाहती थी जिसने मोहित के प्यार को ठुकरा दिया था।

“क्या सोच रही हो राधा”, मोहित की आवाज़ राधा के कानों में पड़ी।
“शबाना आ रहीं है आज”, राधा बुदबुदाई
“क्या?”
“हाँ”
“उसे पता है मैं यहाँ हूँ”
“हाँ” तुम्हारे साथ”
“हाँ”
मोहित चौंक गया।
शबाना अब क्या करने आ रही है?

उनहत्तर
दोपहर यूँ ही निकल गयी। मोहित होश में आ रहा था। कुछ फ़ोन नंबर राधा से लेकर कॉल किये। कुछ देर पहाड़ी वाले मंदिर हो कर आया। बैठा रहा अकेले मंदिर में ज़िन्दगी के हिसाबकिताब जोड़ता हुआ। ये जो ज़िन्दगी अब थी सामने ये उसकी नहीं थी और इस ज़िन्दगी को वो यूँ ही गंवाना नहीं चाहता था। कई ख्याल आये, दिमाग सारे ताने बाने बुनता रहा। आज रूही कहीं भी उन ख्यालों में नहीं थी। आज से पहले सारी राहें रूही के इर्द गिर्द ही घूमती रहती थी वरना। जब शाम सी घिर आयी और लगा कि बारिश होने वाली है तो मोहित उठा,पाँच मिनट फिर आँख बंद करके खड़ा रहा महादेव के सामने। गहरी साँस ली और आँखे खोल दी। सब कुछ मंजूरी मिल गयी थी ऊपर वाले से। चेहरे पर सुकून सा आ चुका था। अंदर का गुबार सब निकल चुका था। घर पहुँचा तो रामसिंह ने बताया कि मालकिन किसी को लेने गयी है। मोहित समझ गया के शबाना आने वाली है।

कैसी होगी शबाना? क्या कहेगी? फिर नया तमाशा क्या?

पर अब मोहित इन सबसे से बेज़ार था। शबाना को जो कहना-सुनना था, वो सुन लेना था बस मुस्कुरा कर। आगे का वैसे भी सब तय हो चुका था। राम सिंह बाहर कुर्सी लगा चुका था लॉन में। आज बारिश का कोई आसार नहीं लग रहा था। आँखें बंद किये हुए पड़ा था मोहित तभी किसी ने आवाज़ लगाई,
“जानेमन”
ये तो दीपाली की आवाज़ थी। आँखें खोली मोहित ने एकदम से। सामने दीपाली खड़ी थी और राधा भी।
“पर तुम तो…मुझे लगा शबाना को लेने गयी थी?” राधा से बोला।
“क्यों मेरा आना पसंद नहीं आया इस बार?” जवाब दीपाली का आया।

मोहित हँस दिया, “अरे नहीं, मुझे लगा शबाना आने वाली है”
“अभी भी मेरा इंतज़ार करते हो मोहित” ये आवाज़ शबाना की थी। अब चौकने की बारी मोहित की थी। पीछे मुड़ा, शबाना सामने थी। दिल धक् से रह गया मोहित का। आसमानी शिफॉन की साड़ी में, जूड़ा बनाये हुए। वही काजल, वही गजरा, वही छोटे से बुँदे। वही नाक में छोटी से नथ, वहीं आँखें, वही शबाना। मोहित ताकता रह गया। शबाना पास आयी,
“क्या हुआ? पसंद नहीं आयी मैं?”
ये कौन सी शबाना लौट के आयी थी? ये तो वही बरसों पुरानी शबाना थी। चुहलबाजी करते हुए। मोहित भी हँस दिया। जवाब नहीं दिया। राधा शबाना के बाजू से निकल कर सामने आयी।
“आइये दीदी” रामसिंह चाय लेकर आगया था जब तक। मोहित के सामने शबाना थी, उसके बाजू में राधा, उसके पीछे वो अलाव अभी भी सुलग रहा था जिसमें कल रात वो रूही को भस्म करके आया था और मोहित के बाजू में बैठी थी दीपाली। तभी एक कार पार्किंग में आकर रुकी। गेट खुला, उसमें से निकला भानु मुस्कुराता हुआ।

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