मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-33

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सत्रह फरवरी की रात को हम सब ने पार्टी की थी भानु के घर पर। मैं दुबई से मुंबई आया था चौदह फरवरी को और उसी दिन दोपहर को पुणे चला गया था रूही से मिलने। सत्रह को फिर लौटा था मुंबई। मेरी फ्लाइट थी अठारह की सुबह लेकिन
पता नहीं क्या सूझा मुझे, सोचा एक बार फिर रूही को सरपराइज देता हूँ। टिकट चेंज करवाया, रात की फ्लाइट बुक करवाई और पुणे के लिए निकल गया। भानु और दीपाली को इस बारे कुछ नहीं पता था। मेरा कुछ सताने का मूड था रूही को। सोचा सीधे कोस्टा कॉफ़ी में जाकर कॉल करता हूँ। ये वही जगह थी जहाँ रूही ने मेरी आँखों में पहली बार अपने लिए प्यार देखा था। रूही को मैं सुबह बता चुका था कि मैं ग्यारह बजे फ्लाइट में बैठ जाऊंगा। मैं करीब ग्यारह बजे कोस्टा पहुंच कर एक कोने वाली टेबल पर इंतज़ार करने लगा। सोचा थोड़ी देर बाद फ़ोन करके बुलाता हूँ। अपनी जगह से मैं तो आने वालों को देख सकता था पर आने वाला मुझे नहीं देख सकता था। मैं फ़ोन पर बिज़ी था कि रूही की आवाज़ सुनाई दी।

“नहीं मोहित ऐसे नहीं” मैं हिल गया, इसे कैसे मालूम पड़ा कि मैं यहाँ हूँ?

रूही काउंटर के पास खड़ी हुई कुछ आर्डर कर रही थी। मैं उठ कर पास जाने को हुआ तो किसी का हाथ रूही के कंधे पर देखा और मैं थम गया।

रूही के साथ कोई था, रौशन तो नहीं था। मैं फिर से कोने में जाकर खड़ा हो गया। ध्यान से देखा तो आसमान टूट पड़ा।

“ये तो भाई था”
“पर मोहित?”
“मोहित”
“मोहित”

“भाई का नाम भी मोहित ही था” राधा का मुँह खुला का खुला रह गया।

मोहित की आँखें बंद थी, बोले जा रहा था।
“राधा मुझे नहीं पता था कि ये तो शुरआत है, उस दिन ऊपर वाले ने अपने खिलौने को तार-तार करने का प्रोग्राम बना रखा था”
मैं, यानि मोहित देख रहा था कि, रूही के मोहित ने रूही का हाथ पकड़ा हुआ था और रूही ने मोहित का हाथ”
दोनों अंदर आये, मेरी साँसे बस बंद नहीं हो पा रही थी, कुछ देर बैठे। रूही ने साड़ी पहनी हुई थी, काजल, बिंदी, सब वैसा ही जैसा मेरे से मिलने आती थी। तो उस दिन भी वही सब लिबास में थी क्योंकि मोहित के साथ थी।

ये वाला मोहित, वही था जो रूही का अतीत, वर्तमान और भविष्य सब था। सुनना ही जानलेवा होता था राधा, उस दिन तो मैं अपनी जान जाते हुए देख रहा था। ये सरपराइज मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सरपराइज था जो ऊपर वाले ने मुझे दिया था। मोहित ने एक लिफाफा दिया रूही को जो रूही ने खोला, देखा, मुस्कुराई और वही टेबल पर रख दिया पर ये मुस्कराहट रुकी-रुकी सी थी। कुछ देर बाद दोनों उठे तो मैं भी उठ गया। लिफाफा जल्दबाजी में वहीँ रह गया था। मैं जल्दी से गया और उठा कर अपनी जेब में रख लिया। बाहर आकर आदतन रूही ने थोड़ी शॉपिंग की, मोहित पेमेंट करता रहा और मैं मरता रहा।
करीब आधे घंटे बाद रूही और मोहित अपनी गाड़ी में थे। रूही मोहित के बाजू में और में ज़मीन के अंदर धंस जाने को बेताब। साँसों पर ज़ोर नहीं था उसे दिन मेरा”

बोलते-बोलते मोहित के आँखों में नमी तैर आयी, एक पैग बनाया, एक साँस में खाली किया और फिर आगे बढ़ा।
“कार उनकी एक अप्पार्टमेंट पर जा कर रुकी”
“ओएसिस विला”
मुझे याद आया, रूही ने एक दिन बहुत खुश होकर बताया था कि भाई ने एक नया घर लिया है ओएसिस विला में। फिर बोलते-बोलते चुप हो गयी थी। मैंने पूछा था कि कहाँ है, तो हँस कर टाल गयी थी। उसी ओएसिस विला के सामने मैं अपनी कार में खड़ा था। पिछले महीने एक मोहित रूही के साथ एक अपार्टमेंट में था और आज भी एक मोहित उसी रूही के साथ एक अपार्टमेंट में था। पर राधा, फर्क बस इतना था कि आज एक मोहित बाहर अपनी ज़िन्दगी को हाथ से जाते जाते देख रहा था और एक मोहित अंदर रूही के साथ अपनी ज़िन्दगी बसा रहा था।

रूही कार से बाहर निकली तो अपनी आँखे पोंछ रही थी। रूही ने गार्ड से बढ़कर कोई चाभी ली और लिफ्ट की तरफ बढ़ गई।
मैं कार मैं मरने के लिए बैठा रहा। अचानक जेब में हाथ गया तो लिफाफा हाथ में आया, खोला,एक कार्ड था,
“हमारी अठारवी सालगिरह की मुबारक बाद रूही”
“अठारह फरवरी”
ये बात थी, तभी रूही ने आज मिलने का मना किया था जब मैं दुबई से आया था। पिछले कई साल याद आ गए अचानक से जब रूही भाई से मिली थी। मैंने अपना फ़ोन खोला, कैलेंडर निकाला, वो सारी डेट्स चेक की जब जब पिछले सालों में रूही भाई से मिलने गयी थी। अठारह फरवरी सारे सालों में अलग चमक रही थी। मैं बैठा रहा कार में, हिम्मत बाँधी, ऊपर वाले को देखा और मुस्कुराया, पूछा था मैंने उस दिन राधा, फिर से ऊपर वाले से कि अब क्या इरादे हैं आज?”

अपने दिल को समझाया, अरे ये तो बस मिलने ही आयी है ना, पहले भी तो बता कर आती थी, कोई चोरी थोड़े ही कर रही है रूही। मेरी रूही मुझे धोखा नहीं देगी और मुझे तो पहले ही बता रखा था उसने भाई के बारे में तो इतना परेशान क्यों?
समझाया दिल को मैंने राधा और बैठ गया। फिर भाई का नाम याद आया,
“मोहित”

फिर जान हलक में आयी, साला दिल में कुछ होता था। क्या होता था पता नहीं। जान निकल भी नहीं रही थी और निकले जा रही थी। सोचा देख कर आऊं ऊपर, एक घंटे होने को आया था। जब दो घंटे हो गए बैठे-बैठे तो मन बैचेन होने लगा।
अंदर क्या हो रहा होगा। दिमाग करवटें बदलने लगा था। दिल जैसे धड़कना ही बंद कर चुका था। थोड़ी देर में मोहित की कार बाहर निकली तो मेरी साँस में साँस आयी। मोहित ड्राइव कर रहा था, साथ में रूही नहीं थी। मैं बाहर आया एक दम से, गार्ड के पास गया बोला कि मोहित साहब का पैमेंट है कुछ। गार्ड बोला, साहब तो चले गए पर मैडम हैं आप दे आईये”

मोहित का बोलते-बोलते गला खुश्क होने लगा था। हाथ बढ़ा कर गिलास उठाया तो राधा ने गिलास खींच लिया,
“आप वैसे ही बहुत पी चुके हो, और कितना पियोगे आप आज?”
“पी लेने दे यार, वरना बोलते-बोलते जान ही ना निकल जाए” राधा कुछ नहीं बोली। उसे समझ आ रहा था कि कुछ तो खौफ़नाक हुआ था उस दिन।

रूही का मोहित के साथ रहते हुए दूसरे मोहित को मिलना और प्यार में पड़ जाना ही सब कुछ गज़ब नहीं था। और भी कुछ था जिसने मोहित कि ज़िन्दगी अठारह फरवरी को बदल दी थी।

“तुझे पता है राधा, रूही ने इतने सालों में कभी मेरा नाम लेकर मुझे नहीं पुकारा था। उस दिन एहसास हुआ था कि मेरे इतना कहने के बाद भी कि “मेरा नाम लिया कर न रूही, तेरे मुँह से अपना नाम सुनने को तरस गया” पर वो बस मुस्कुरा देती थी।
उस दिन समझ आयी वो मुस्कराहट। जब मेरे साथ दुबई ऑफिस में थी और जाने कितने लोगों ने मेरा नाम पुकारा था तो हर बार जैसे सिहर जाती थी रूही। मैं कुछ और समझता था, हकीकत कुछ और थी। मोहित सुनते ही वो इस मोहित से दूर जाकर अपने मोहित के पास चली जाती थी, उसको भी क्या सज़ा दी थी भगवान ने न राधा?

मोहित ने गिलास खाली किया।
“मैं ऊपर गया, फ्लैट के बाहर लिखा था,
“हमारी जन्नत”

मोहित बोले जा रहा था।

“खड़ा रहा मैं, रूही और मोहित की जन्नत के दरवाज़े के सामने। वही रूही पर मोहित कोई और। इस जन्नत में रूही के साथ कोई और ही मोहित था। देखा दरवाज़ा बंद नहीं था। दिल काबू में नहीं था, दोनों मुट्ठियाँ भींची। हल्का सा छूआ तो खुल गया।
पहला कदम अंदर, स्टूडियो अपार्टमेंट था। मैं रुका फिर आगे बढ़ा। सामने की दीवार पर रूही की कुछ तस्वीरें, जो मैंने कभी रूही को भेजी थी। एक साँस रुकी। कमरे में कोई नहीं था। टेबल पर दो बियर की बॉटल्स थी। देख कर कुछ साँसे और रुकी।
बाजु वाला दरवाजा बंद था। एक और दीवार पर नज़र गयी तो रूही के मेंहँदी लगे हाथ की तस्वीर एक फ्रेम में जड़ी हुई। एक साँस और रुकी। सब कुछ वही जो रूही मेरे साथ जी रही थी। वही सब पहले जी चुकी थी। क्यों मेरा कुछ भी करना, रूही को हिला देता था। वो मेरा घर ले जाना, ऑफिस ले जाना घर में रूही की तस्वीरें, दीवार पर रूही के महावर लगे पैरों के निशान।
वही ज़िन्दगी, वही मोहित, वही सब कुछ, वही रूही और वही पहेली।

“उसी दीवार से टेक लगा कर बैठ गया था मैं राधा, मेरे पैरों में हिम्मत नहीं बची थी खड़े होने की। बैठा तो हाथ टेबल से टकराया और गिलास ज़मीन पर गिरा। अंदर से आवाज़ आयी, कौन है? मैं निढाल दीवार से टेक लगाए बैठा दरवाज़े को देख रहा था। बैडरूम ही था और रूही अंदर थी। बाहर बियर की बॉटल्स थी और मैं रूही को जानता था। दरवाज़ा खुला, रूही ने मुझे देखा,

“तू स्वीटी?????????????”
“यहाँ???????”

साड़ी का पल्लू ढलका हुआ, मेरी साँस जाती हुई।
काजल फैला हुआ, मेरी ज़िन्दगी तारतार होती हुई।
बाल बिखरे हुए, मेरी साँसे उखड़ती हुई।
मैं मुस्कुराया, बस। कभी देखा है किसी को रोते हुए मुस्कुराते हुए तूने राधा?
मैं चिल्लाना चाह रहा था राधा, आवाज़ घुट कर रह गयी। बहुत कोशिश की कि चिल्लाऊं पर नहीं निकली आवाज़।
रूही वहीं की वहीं खड़ी हुई थी अपने सर को पकड़े हुए फिर सामने वाले सोफे पर आकर बैठ गयी। कभी अपने होंठ छूती कभी अपने सर पर हाथ रखती, कभी अपने हाथों को मसलने लगती। मैं एक पहेली को सुलझते हुए देख रहा था।

“जन्नत”
“दीवार पर रूही की तस्वीरें”
“रूही के हाथ की मेंहँदी से जड़ा हुआ फ्रेम”
“स्टूडियो अपार्टमेंट”
और
“मोहित”
सब कुछ एक ही जैसा लेकिन बस रूही अलग अलग।

“तू यहाँ कैसे?” रूही बुदबुदाई।
मैं बस मुस्कुरा रहा था। मैंने बियर की तरफ निगाह घुमाई और फिर रूही को ऊपर से नीचे तक निहारा।
रूही ने कुछ कहना चाहा, मैंने अपने होंठों पर ऊँगली रख दी। सिगरेट निकाली, जलाई, चार कश में ख़त्म की, मुड़ा, रूही सामने कसमसाई सी बैठी थी।
“मेरी बात तो सुन”
मैंने फिर अपने होंठ पर ऊँगली रख दी। मेरे हाथ काँप रहे थे, पैरों में से जान निकाल के कोई ले जा चुका था। होंठ सूखे हुए, कलेजा चीर कर तारतार हो चुका था, रूही पास आयी। उबकाई सी आ गयी मुझे राधा। मैं पीछे हट गया। वो फिर पास आयी।
मैंने हाथ से रोक दिया,
“बस”
और मुस्कुरा दिया। कंपकपाती आवाज़ में सिर्फ इतना कहा
“मुझे रौशन से तकलीफ नहीं थी रूही, क्योंकि वो सच था, पर जो आज देखा वो झूठ था और बस झूठ, बस ये ही बर्दाश्त नहीं तेरे स्वीटी को। कह कर माँग लेती मेरी ज़िन्दगी, मेरा प्यार। उफ़ किये बिना चला जाता रूही। पर ये तूने क्या कर दिया”

“सुन तो मेरी बात” रूही कुछ कहना चाह रही थी।
मैंने हाथ से इशारा किया, गर्दन हिलायी, कहा नहीं। दीवार का सहारा लेकर बाहर आया। रूही ने बहुत मिन्नतें की कि उसकी बात एक बार सुन ले पर मुझे पता था कि वो जो भी कहेगी तो मैं मान जाऊंगा और इस बारे मैं मानने वाला नहीं था।
नहीं मानना था बस। मैं खोने के लिए ही पैदा हुआ था और उस दिन मैं अपनी आख़िरी चीज़ भी खो चुका था”

अचानक से ज़िद आ गयी थी राधा। रूही बाहर नहीं आ सकती थी। शायद मोहित लौटने वाला था उसका इंतज़ार था पर जो मोहित जा रहा था उसका किसी को कभी इंतज़ार नहीं था। रूही बाहर नहीं आयी वहीं खड़ी रही होगी अंदर।
शायद?
शायद रोयी होगी?
हँसी होगी शायद?
पीछा छूट गया एक पागल से, पता नहीं राधा”

राधा मुँह खोले बैठी हुई थी। मोहित की आँखें बंद थी पर आँसू बहे जा रहे थे। राधा ने बहुत चाहा कि रोक ले उन्हें पर हिम्मत नहीं हुई। ये क्या तमाशा बना दिया था ऊपर वाले ने मोहित का। किस मोहित का? मोहित चुप बैठा था राधा के सामने। डायरी सीने से लगाए हुए। उसमें से ग़ुलाब झांकता हुआ। बारिश ना अंदर की रुक रही थी न बाहर की। मोहित का रोना ज़रूरी था। इस बारिश को होना ज़रूरी था। इन बादलों को छंटना ज़रूरी था वरना आज नहीं तो कल ये बारिश मोहित को अपने साथ बहा ले जाती। राधा उठी, मोहित का गिलास भरा और मोहित के हाथ को अपने हाथ में लिया। मोहित ने आँख खोली, लाल दहकती हुई आँखे। ज़हर उनमें पहली बार राधा ने देखा था। ये आदमी क्या था? राधा काँप गयी। इतनी नफरत इन आँखों में वो भी रूही के लिए?

“शांत हो जाओ आप”
“शांत ही तो हूँ मैं राधा वरना” आँखें बंद की मोहित ने खड़ा हुआ।

ये बारिश जो उसकी मोहब्बत थी आज उसकी को मिटाने के काम आने वाली थी। गिलास हाथ में लेकर लॉन में आ गया। राधा चुप खड़ी हुई थी दीवार से टिकी हुई। मोहित पीता रहा, भीगता रहा, आँसू कब बारिश में घुल गए दिखा ही नहीं।
“चलिए अब अंदर” थोड़ी देर बाद राधा ने पुकारा।
“चलिए प्लीज, आप तबियत ख़राब कर लेंगे”

कौन सुनने वाला था। मोहित तो वैसे ही किसी और दुनिया में बह रहा था। आखिरकार राधा गयी और मोहित का हाथ पकड़ कर अंदर लायी। मोहित का नशा उन दोनों बारिश ने उतार दिया था रात गहरा गयी थी। मोहित शांत हो चुका था।
खाने का तो मतलब ही नहीं था।

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