मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-32

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“साहब मेमसाब ने पूछा है कि आप कहाँ हो? दवाई और खाने को भी पूछा, मैंने कहा कि ब्रेड खायी है तो मेरे से नाराज़ हो गयी। आप कुछ खा लो साहब वरना मेरी नौकरी चली जायेगी” राम सिंह सर के पास खड़ा हुआ बोले जा रहा था।
रूही के साथ उस डायरी में वक़्त ऐसे भागता था कि कुछ समझ नहीं आता था।
रात के आठ बज रहे थे और दर्जन भर कॉफ़ी हो चुकी थी लेकिन जब रामसिंह ने आकर राधा की डांट के बारे में बताया तो मोहित ने खाना लगाने को बोल दिया।
“अगर कुछ चिकेन है तो रोस्ट कर दे और ड्रिंक्स लगा दे ऊपर”

मोहित को अब सब याद आ रहा था कि क्या हुआ था उस दिन, लेकिन लिखता कैसे। लिखने से पहले ही तो तूफ़ान आ गया था और आज जाकर ठहरा था। पिछले कुछ दिनों में, डायरी में अपनी और रूही की ज़िन्दगी को फिर से जी लिया था। कड़वाहट बढ़ गयी थी आखिरी पेज को पढ़ते-पढ़ते। लिखना चाह रहा था, फिर मन में आया कि रूही से मिलना है। दिमाग सुन्न हो गया एकदम से अचानक मोहित का। रूही से मिलना है, बस रूही से मिलना है।
“राम सिंह………” आवाज़ लगायी उसने।
“मेमसाब को फ़ोन लगाओ” रामसिंह फ़ोन लेकर आया ऊपर, राधा लाइन पर थी।
“कहिये”
“मेरा एक काम करोगी”
“कहिये?”
“प्लीज ना मत करना”
“बोलिये तो”
“पहले कसम खाओ”
“आप काम बतायें”

मोहित ने गहरी साँस ली।

“मुझे रूही से मिलवा दे प्लीज, बड़ा एहसान होगा” राधा ने जवाब नहीं दिया, बस एक ठंडी, गहरी साँस की आवाज़ आयी दूसरी तरफ से।

“मिलवाओगी ना?
“राधा चुप थी”
“बोलिये ना”
“मिलवाउंगी” फ़ोन काट दिया राधा ने।

मोहित की जान में जान आयी, बोतल खोली उसने।
मोहित ने गहरी साँस ली और डायरी खोली।

आख़िरी एंट्री थी वो उस डायरी की..
17 फरवरी 2018 –
आँखे बंद थी मोहित की, लिखना चाह रहा था पर हाँथ काँप रहे थे। थोड़ी देर बाद आँख खोली तो धीरे से एक कतरा टपक गया। जहाँ दिल बने थे डायरी में उन पर पड़ा और धीरे-धीरे उन ढेर सारे दिलों की जगह सिर्फ कुछ धुंधले अक्स दिख रहे थे। मोहित की आँखे लाल थी। उसने झटके से अपनी हथेली से पूरे पेज को तितरबितर कर दिया। अब उस आखिरी पेज पर सिर्फ स्याही के हलके से रंग बिखरे हुए थे, दिल मिट चुके थे। डायरी को मोहित ने दूर फेंक दिया गुस्से में। गिलास में ढेर सारी शराब उड़ेली और एक साँस में पी गया। जब रुका तो एक ठसका लगा और उसकी साँस उखड गयी। बैठा रहा, दूर से डायरी को देखता रहा। बारिश शुरू होने को थी। जब रिमझिम सी शुरू हुई तो उठा, डायरी उठायी, बुदबुदाया,
“तुझे इतनी आसानी से अपनी ज़िन्दगी से नहीं जाने दूंगा, रूही” नीचे आया, रामसिंह को बोला मेमसाब को फ़ोन लगाओ। “साहब वो आ गयी है, पार्क कर रही है कार”
मोहित भाग कर आया। उसे रूही को देखना था। पार्किंग में गया, राधा कार की डिग्गी से कुछ निकाल रही थी।
“रूही कहाँ है” कोई जवाब नहीं।
“कहाँ है रूही” राधा ने मुड़ कर देखा।
“जवाब क्यों नहीं देती हो” राधा ने बैग उठाया और मोहित का हाथ पकड़ा और बोली,
“अंदर चलिए आप पहले”
“तुम बताती क्यों नहीं, रूही कहाँ है?
“शांत रहिये, बताती हूँ, आप अंदर तो चलिए ना”
मोहित लड़खड़ा सा रहा था। राधा समझ गयी थी कि क्या हुआ था।आराम से उसने मोहित को ले जाकर बिठाया और रामसिंह की आवाज़ लगायी,
“रामसिंह आप सो जाइये। खाना मैं देख लूँगी।
“आप ने इतनी क्यों पी रखी है आज? क्या हुआ अचानक से?”
“तुम ये तो बताओ पहले रूही कहाँ है? मोहित अब चिड़चिड़ा रहा था।
“मैं जाउंगी, लेकर आउंगी, आपने कल ही तो कहा था, आज कहाँ से ले आती?”
“तो बोलना था ना, मैं कल से इंतज़ार कर रहा था”, मोहित की आवाज़ डबडबा गयी। आवाज़ में झर-झर आँसू बाहर निकलने को बेताब थे। बस अब रोया कि तब रोया। राधा उठी, मोहित के पास आयी और फिर जो आजतक नहीं हुआ था वो हुआ। मोहित के सिरहाने जाकर खड़ी हो गयी। एक हाथ मोहित के कंधे पर रखा और एक हाथ मोहित के बालों में। मोहित फफक पड़ा। कंधे वाला हाथ मोहित के गाल से दबा हुआ था। रोये जा रहा था,
“क्यों किया था मेरे साथ रूही ने ऐसा”
“क्या बिगाड़ा था मैंने रूही का?”
“क्या माँगा था मैंने उस से?”
“इस रिश्ते में मैंने क्या गुनाह किया था”

“क्यों राधा क्यों???? आखिर क्यों?” राधा खड़ी रही। फिर मोहित के पैर के पास आकर बैठ गयी।
“क्या हुआ था 17 फरवरी को”
मोहित चुप था, आवाज़ हलक में अटकी हुई ।
“आखिर हुआ क्या था ऐसा जो आपकी ऐसी हालत हो गयी?”
मोहित की जुबां खुली…

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