मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-31

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रूही ने साड़ी बदल ली थी, मोहित के शॉर्ट्स और उसकी टीशर्ट पहन ली थी। गर्दन झुका कर, रूही ने, टीशर्ट को कंधे पर से चूम कर मोहित को जीभ चिड़ाई और नीचे चल दी। ये उसका ख़ास शगुन था, जब जब वो मोहित के कपड़े पहनती थी, अपनी गर्दन टेड़ी करके, अपने कंधे पर मोहित की शर्ट को सूँघती रहती थी और अपने कंधे को चूमती रहती थी।
मोहित पूछता था, क्या है ये सब और रूही का हर बार जवाब होता था,
“तेरी खुशबू अपने अंदर बसा लेना चाहती हूँ इडियट”

थोड़ी देर में मोहित और रूही, नदी किनारे पगडण्डी पर थे। शाम हो सी चुकी थी। नदी का वो हिस्सा, अपार्टमेंट के नीचे से गुज़रता था और आम रास्ता नहीं था। नदी तक जाने के लिए अलग से पगडण्डी बनी थी, गेट लगा हुआ था। आगे जा कर नदी का मुहाना चौड़ा हो जाता था और वहीं ओर एक गेट और लगा था। गेट बंद ही रहता था और उसके बाद आम रास्ता शुरू हो जाता था जो कि वाकई में जंगल जैसा ही था। नीचे आते-आते रूही एक बास्केट में बियर के कुछ कैन ले आयी थी।

नदी के सबसे आखिरी वाले कोने पर एक छोटी सी हट बनी हुई थी जो वाक करने वालों को बारिश से बचाने के लिए बनायी हुई थी। वो हट इतने कोने में थी कि वहाँ से अपार्टमेंट नहीं दिखता था। रूही और मोहित वाक करते हुए वहाँ तक गए। रूही ने बास्केट वहीं रखी और आगे जाकर एक पत्थर पर चढ़ कर नदी में पैर डाल के बैठ गयी। मोहित वहीं किनारे पर बैठा हुआ था। वहीं से मोहित ने रूही को एक कैन फेंका जो शानदार तरीके से रूही ने लपका और पाँच मिनट में खाली भी कर डाला। बियर पीने का यही तरीका था रूही का। आवाज़ लगायी मोहित को,
“ए हीरो”
कुछ सुनने से पहले ही मोहित ने एक और कैन रूही की तरफ फेंका। मोहित वहीं ज़मीन पर रेत में पसरा पड़ा हुआ था।
रूही की आवाज़ आयी,
“ऐ हीरो, इधर आ” अनसुना कर दिया मोहित ने। हाथ का तकिया बनाये हुए ठंडी सी रेत में अच्छा सा लग रहा था।
शाम से ही गार्ड वहाँ आकर अलाव जला जाते थे जिसकी चटकी हुई कोयले की आवाज़ अलग सा माहौल बन देती थी।
थोड़ी-थोड़ी देर में लकड़ियाँ चटकती और चिंगारी उड़ कर पानी की तरफ उछल जाती। थोड़ी ही देर में शायद वो आग बुझ जाने वाली थी। उधर एक आग जो मोहित के अंदर जल रही थी बस वही बरसों से जले जा रही थी, जले जा रही थी।
उस के चिटकने की आवाज़ किसी और ने सुनी ही नहीं आज तक। रूही भी कहाँ सुन पायी।
“इधर आ ना स्वीटी”, फिर बुलाया रूही ने।
धीरे-धीरे पानी में आगे बढ़ता हुआ मोहित रूही के पास पहुँचा। पत्थर सपाट सा था और असली नहीं था जिसे वहाँ बैठने के लिए ही रखा गया था। मोहित वहाँ पहुँचा तो रूही ने बढ़कर पहले मोहित की बियर छीनी और एक झटके में ख़तम।
“मुझे तेरे साथ रहना है स्वीटी” शुरू हो गयी थी पहेली।
“तू रखेगा मुझे अपने साथ”?
“प्यार बहुत करता हैं ना तू?”
“मेरे लिए कुछ भी कर सकता है?”
“अगर मेरे से कुछ गलती हो गयी तो माफ़ कर देगा अपनी बब्बल को?”

मोहित ने हाथ थामा और उस गीले पत्थर पर रूही को लिटा दिया। अँधेरा सा होने लगा था। रूही की ऑंखें बंद थी, होंठ मोहित ने अपने होठो से बंद कर दिए। फिर भस्म होने को बेताब थी आज रूही। मोहित ने रूही को गोद में उठाया और ले जाकर धीरे से नदी के किनारे अलाव के पास रेत पर लिटा दिया। रूही की गीली टीशर्ट एक कोने में अलाव के पास सिकुड़ी शरमाई सी पड़ी हुई थी। आकाश, नदिया, अग्नि, धरती सब आज रूही और मोहित का मिलन देख रहे थे।
दो दीवाने जल रहे थे। रेत रूही के जिस्म पर बहती रही। मोहित की आग उस रेत को और पाक रही थी। वो रेत आज शायद कुंदन बन जाने वाली थी। थोड़ी-थोड़ी देर में नदी की एक लहर आकर रूही मोहित को छू जाती और रूही सिहर उठती पल भर को और मोहित में समां जाती। रूही के नाख़ून जब मोहित की पीठ को तार-तार करने लगे तब तक अलाव भी बंद हो चुका था। नदी की लहरें तेज़ हो चुकी थी। और फिर ऊपर वाले का आशीर्वाद रिमझिम करके बरसने लगा। मोहित उठने को हुआ तो रूही ने फिर खींच लिया और अपने गले में मोहित का चेहरा छुपा लिया। गहरी सांसे सुना रही थी मोहित को वो अपनी।
“बस ऐसे ही मार देना एक दिन मुझे स्वीटी”
“बस तेरी बाँहों में, सिर्फ ऐसे ही”

मोहित ने रूही के होठो पर ऊँगली रख दी, “हम जियेंगे रूही साथ में”

दूर कहीं नौ बजे का घड़ियाल बज उठा। दोनों उठे, विदा का वक़्त आ गया था। ऊपर जाकर रूही ने फिर साड़ी पहनी, सारी दीवारों को चूमा, मंदिर में सर झुकाया और फिर बाहर जाकर खड़ी हो गयी।
मोहित जल्दी से बाहर आया, “इतनी जल्दी एक दम से बब्बल?”
“हाँ बस ऐसे ही”
घर के पास मोहित ने कार रोकी और एक छोटा सा बॉक्स निकाला।
“ये तेरा एक और सपना, जन्मदिन की मुबारक बाद”
विजटिंग कार्ड बॉक्स था, रूही ने कार्ड देखा।
रूही,
सीईओ,
मुद्रा टेक्सटाइल्स।
सिंगापुर

रूही मुँह खोले बैठी रही।
“स्वीटी….”
“कुछ नहीं बब्बल, सिंगापुर वाली कंपनी में तू सीईओ है बस और क्या? काम तो मैं ही करूँगा, बस तेरा नाम है कार्ड पर”
रूही वहीं सर टका कर बैठी रह गयी।

“मैं कुछ बोलूं बस स्वीटी तू बस पूरा करेगा?

मोहित मुस्कुराया।

तू जानती है ना मुझे?

“हाँ रे, इसीलिए डरती हूँ, इतनी मोहब्बत करता है रे, और अगर नफरत हुई तो”
मोहित मुड़ा,

“’पहले बात तो वो होगा नहीं और अगर हुई तो तू उस नफरत को भी बेहद याद करेगी बब्बल। दुआ करना आज के बाद कि ऐसा कुछ ना बोले तू, झूठे को भी नहीं। वो दिन बहुत बदनसीब होगा जिस दिन ऐसा कुछ हुआ। मैं चला जाऊंगा, बिना कुछ बोले”
मोहित संजीदा था, आँखों में जूनून था।

“दुआ करना रूही, रोज़, बे नागा, मेरी नफरत इस बार मेरी मोहब्बत से जीत जायेगी मुझे पता है”

“चल निकलता हूँ। मोहित को कुछ कसकने लगा था।
रूही को लगा कि कुछ गलत हो गया।
“स्वीटी हमें नज़र ना लग जाये। इतना प्यार………. इतना प्यार??”
“कोई ना बब्बल, फिर मिलते हैं, इस बार कुछ सोचेंगे सीरियसली”
रूही की जान हलक में आगयी, उठी और ‘“आती हूँ स्वीटी” कह कर चली गयी वो।

जून के बाद वाले दिनों में काम इतना बढ़ गया कि इंडिया जाना हुआ नहीं, एक बार गया बस, रूही के बच्चों के इम्तिहान चल रहे थे और कुछ रिश्तेदारी में शादी थी तो बस दो एक घंटे की मुलाकात हुई रूही से।
एक-एक बियर, कुछ हल्का फुल्का। पता नहीं, पर जून वाली मुलाकात जो काफी कहर बरपा देने वाली मुलाकात थी, कुछ हुआ था। मोहित ने सारी हदें पर करके अपने प्यार की ऐसे बारिश की थी कि रूही की ज़िन्दगी में तूफ़ान आ गया था। उसे पता था मोहित ऐसा ही है। बेहद, बेहद, वाला, जो भी हो बस बेइंतिहा हो। कोई आगे ना देखना, ना पीछे, जो चाहिए बस वो चाहिए, हद दर्ज़े का ज़िद्दी।

26th जून की रात के बाद कुछ हुआ था जो दोनों को साल रहा था। दिसम्बर में नए साल पर मोहित ने रूही और रोशन को सिंगापुर बुलवाया, ऑफिस का उद्घाटन हुआ।

रौशन COO था, बहुत खुश हुआ। रूही का कार्ड देखा तो हैरान रह गया।
“सर आप इतना कुछ कर रहे हो हमारे लिए”
डिनर वगरैह हुआ, शहर घूमी पर इस बार मोहित साथ नहीं गया। रूही और रोशन को सेंटोसा रिसोर्ट में ठहराया हुआ था। तीन दिन बाद जब वो ओग लौट कर गए वो तो मोहित मिला भी नहीं। रौशन और रूही साथ में ज़हर सा लगता था मोहित को। रूही रौशन के साथ होती थी तो इतनी अजनबी सी होती थी की मोहित को मार डालने का मन होता था उसे। मोहित ने पेज पलटा।

“फरवरी आने वाली है”

ढेर सारे दिल बने हुए थे उस पेज पर बस और उसके आगे कुछ नहीं लिखा था।

आगे की डायरी खाली थी ….

2 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-31

  1. Ek hi bhaag me itna kuch hone ke baad, aage ki paheli ki jigyasa saath me rehti hai aur ye kahani jis din khatm hogi. Bahut khaali khaali lagega. Shayad 1-2 din tak 1-2 baar fir se saare parts ek baar padhe jaayenge

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