रूही – एक पहेली: भाग-26 – मंडली
मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-26

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डायरी बंद की मोहित ने, रात के बारह बजने को थे। सुबह उसे राधा से कुछ बात करनी थी साफ़-साफ़। बारिशें रुक ही नहीं रहीं थी पहाड़ की, जब देखो तब टप्प से शुरू हो जाती थी। रात बहुत आँधी तूफ़ान आता रहा, कई बार बिजली की आवाज़ से मोहित की आँख खुली पर करवट बदल कर फिर लेट गया। सुबह आँख खुली तो बारिश तब भी नहीं रुकी थी। अलसाया सा उठा मोहित, खिड़की के पास गया तो देखा, राधा कुछ बच्चों के साथ बारिश में दौड़ दौड़ कर खेल रही थी। कहीं बैठ जाती ज़मीन पर, उठ जाती, फिसल जाती, बस अपनी ही दुनिया में थी। कुछ होशो हवास नहीं था उसे, कपड़ो में कहीं कहीं गिरने की वजह से मिटटी के निशाँ पड़े हुए थे। नंगे पैर दौड़ती हुई एक पागल सी लड़की पहले कहीं देखी नहीं थी उसने । रामसिंह बाहर दिखाई दिया, कुछ बोल कर पुकारा उसने, राधा को शायद सुनाई नहीं दिया होगा। बारिश की रफ़्तार इतनी तेज़ थी की लग रहा था आज ही सारी बारिश हो लेगी। एक बच्चे ने राधा का हाथ पकड़ा और इशारे से रामसिंह को दिखाया। रामसिंह ने घड़ी का इशारा किया और एकदम से राधा ने दोनों गालों पर हाथ रख के अंदर दौड़ लगाई। कुछ याद आ गया होगा शायद।

मोहित ने ब्रश किया और दस मिनट में बाहर आया तो अभी भी गैलेरी के फर्श पर राधा के मिटटी वाले क़दमों के निशान बने हुए थे। मोहित को कुछ याद आ गया,मुस्कुरा दिया। बातों-बातों में एक दिन रूही बोली थी,
“सुन स्वीटी, मेंरे कुछ मन की रह गयी है, या ये कह ले कि और बढ़ गयी है तमन्नाएँ, तू पूरी करवायेगा न अपनी बब्बल को?”
“पक्का करवाऊंगा, बोल तू बस” और फिर एक लिस्ट तैयार हुई थी।
1. बारिश में भीगना था, हाथ खोल कर गोल गोल घूमना था, मोहित के साथ
2. किसी बीच पर रात के घनघोर सन्नाटे में बियर पीना, मोहित के साथ
3. खेतों में फसलो के बीच दौड़ लगाना, मोहित के साथ
4. मोहित के शहर जाना, मोहित के साथ
5. मोहित को उसके ऑफिस में देखना बैठे हुए
6. कभी इंडिया से बाहर नहीं गयी, बाहर जाना था उसे, मोहित के साथ
7. स्कूबा डाइविंग करनी है, मोहित के साथ
8. डिस्को जाना है,मोहित के साथ

कहाँ-कहाँ से रूही को मिटाता मोहित, हर कोने में तो बिखरी पड़ी हुई थी रूही। बाहर टेबल पर राधा का गीला सा दुपट्टा पड़ा हुआ था, साथ में था एक तौलिया जिस पर थे कुछ उलझे हुए बाल। उतने ही उलझे हुए जितनी कि उलझी राधा की ज़िन्दगी थी या मोहित की उलझी हुई ज़िन्दगी से थोड़ी ज़्यादा यह तय नहीं कर पाया मोहित। मोहित बैठने ही वाला था की रामसिंह चाय लेकर आ गया।

“मेमसाब कहाँ हैं?”
“जी अंदर हैं”
“बुलाइये ज़रा”
“जी मालिक”
राधा आयी और वही दरवाजे के पास खड़ी हो गयी ।
“यहाँ आओ ज़रा” राधा नहीं आयी,
“यहाँ तो आइये कुछ बात करनी है” तभी फ़ोन की घंटी बजी और राधा अंदर चली गयी । आकर सिर्फ इतना कहा,
“इन्द्र आ रहा है”
इन्द्र बैंगलोर में बायो टेक्नोलोजी का कोई कोर्स करने के लिए गया था। उस रात जब इन्द्र ने पूछा था दुबई से बाहर जाने के लिए तो मोहित ने तुरंत हाँ कर दी थी। बचपन से ही उसने देखा था इन्द्र को अंदर ही अंदर घुटते हुए और मोहित चाहता था कि इन्द्र अब खुली हवा में साँस ले। अपनी बर्बाद हुई ज़िन्दगी की परछाई वो इन्द्र पर नहीं पड़ने देना चाहता था। बीते हुए दिन में कैसे हुआ होगा क्या हुआ होगा मोहित को कुछ नहीं पता था पर अगर की पढ़ाई ज़ारी थी तो इसका मतलब भानु ने अपना वादा एक बार फिर से निभाया था।

इन्द्र करीब ग्यारह बजे आया, मोहित बाहर ही इंतज़ार कर रहा था। राधा खुद गयी थी उसे लेने। जीप से उतर कर इन्द्र ने सीधे दौड़ लगा दी मोहित की तरफ और कस के गले लगा लिया। कुछ नहीं बोला पर जवान इन्द्र के हाथों की जकड़ बोल रही थी सब। सिर्फ इतना बोला,
“थैंक यू पप्पा, मुझे पता था कि आप आओगे लौट के इसलिए कभी नहीं रोया, बस ये मान लिया था कि आप किसी लम्बे टूर पर गए हो”
बचपन से इन्द्र पप्पा को टूर पर ही तो जाता देखता आ रहा था। मोहित ने इन्द्र के माथे को चूम कर अपने से अलग किया तो आँखें गीली सी थी मोहित की। गबरू सा जवान हो गया था इन्द्र, नज़र का चश्मा लग जाने से और भी समझदार दिखने लगा था हलक हलकी सी मूंछे भी उभरने लगी थी पर चेहरे से वो मासूमियत और भोलापन नहीं गया था। वक़्त ने अभी ठोकर नहीं मारी थी इन्द्र को या उस ठोकर के निशाँ ऊपर से नहीं दीखते थे। इतना वक़्त हो गया था मोहित को इन्द्र को देखे हुए। तीन साल में ज़िन्दगी ऐसे भाग सी जाती है। ऊपर वाले ने मोहित पर अपना मेहर बरकरार रखा था और ज़िन्दगी को तहस नहस होने से बचा लिया था। मोहित को धीरे-धीरे सब वापिस मिल रहा था।
भानु, दीपाली और अब इन्द्र पर,पर रूही कहाँ थी????
कोई क्यों नहीं बता रहा था?
इन्द्र के साथ दिन भर गप्प बाजी चलती रही, रूही एक कोने में डायरी में बंद पड़ी रही। राधा बीच में सिर्फ दो बार खाने को पूछने आयी और खाना लगा कर चली गयी कहीं। कहाँ जाती वो? बाहर जाती थी कमरे के उर दरवाजे की ओट से कान लगा कर बाप बेटे को सुनती रहती थी। कई बार बातें सुनते हुए आँख में आँसू छलक आये। शाम को मोहित ने पूछा इन्द्र से अगर वो बियर पीना चाहे साथ में पर इन्द्र ने मुस्कुरा कर मना कर दिया।
“आप घर आ जाओ फिर सेलब्रेट करेंगे पप्पा”
“बस, आता हूँ जल्दी से”
अपने करियर के बारे में सब विस्तार से इन्द्र ने मोहित को बताया की आगे का क्या प्लान है। कब जहाँ जाना है और कैसे करना है। मोहित सुनता रहा, मुस्कुराता रहा। बच्चा बड़ा हो गया था और बहादुर भी। इतना सब ख़तम होने के बाद भी इन्द्र संभला रहा। आँख बंद करके मोहित ने ऊपर वाले का कई बार शुक्रिया अदा किया और सुनता रहा। करीब तीन बजे के आसपास राधा ने आकर टाइम का याद दिलाया। मोहित को अचरज हुआ कि इन्द्र ने एक भी बार नहीं पूछा की राधा कौन है। तो क्या इन्द्र भी राधा से पहले मिल चुका था?

कौन थी ये राधा??
सुबह रामसिंह ने आकर पूछा ब्रेकफास्ट के लिए तो राधा की पीछे से आवाज़ सुनाई दी, इन्द्र भी वही खायेगा जो ये खाते है। इन्द्र ने मुड़कर पीछे देखा और मुस्करा दिया साथ में दिया थम्स अप का इशारा। लंच से पहले इन्द्र जा चुका था ये कह कर कि आखिरी साल है पप्पा, अब छूट्टियां बाकी नहीं है सो करीब छः महीने बाद मुलाकात होगी दुबई में।
इन्द्र ने बताया था कि मोहित के बाद शबाना ने अपना इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का काम शुरू किया था जिसमें मोहित के पुराने साहब ने पूरी मदद की थी। अब शबाना खुद हैंडल कर रही थी बिज़निस को और साथ में वही पुराना स्टाफ था तो तकलीफ कोई नहीं थी। रुपये पैसे की कोई कमी नहीं थी आज भी पर मोहित के एक्सीडेंट के बाद से शबाना बिलकुल ही बदल गयी थी। काम के अलावा जो भी वक़्त मिलता था कई सारे NGO में उसको बाँट लेती थी।
अपने और इन्द्र के लिए ज़रुरत के हिसाब से पैसे बचा कर बाकी सब बाँट देती थी।

मोहित को अच्छा लगा था सुनकर पर देर से हुआ जो भी हुआ। मोहित के चेहरे पर सुकून सा था आज जो राधा दूर से भी देख सकती थी। इन्द्र के जाने के बाद मोहित बड़ी देर तक लॉन में टहलता रहा था । आगे क्या करना था कुछ समझ नहीं आरहा था। ज़िन्दगी कहाँ से शुरू करे कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा था ।सब इतना जल्दी हो रहा था कि कुछ नहीं सोच पा रहा था। जब टहलते-टहलते और सोचते-सोचते सर दर्द होने लगा तो आकर कमरे में लेट गया।
कब आँख लग गयी पता नहीं चला। शाम छः बजे के आसपास रामसिंह ने पूछा कॉफ़ी के लिए। आज राधा नहीं थी पूछने के लिए। पता नहीं क्यों पर भानु के जाने के बाद राधा कुछ बदली-बदली सी नज़र आने लगी थी। मोहित ने कॉफ़ी मग लिया और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर रूही के साथ आगया, गुलाब हटाया और गहरी साँस ली।

लेखक मुख्य रूप से भावनात्मक कहानियाँ और मार्मिक संस्मरण लिखते हैं। उनकी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में होती हैं और उनमें बुंदेलखंड की आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक का मानना है कि उनका लेखन स्वयं की उनकी तलाश की यात्रा है। लेखक ‘मंडली.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी रचनाएँ 'ऑप इंडिया' में भी प्रकाशित होती रही हैं। उनके प्रकाशित उपन्यास का नाम 'रूही - एक पहेली' है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मैं मुन्ना हूँ' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। लेखक एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत हैं।

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-26

  1. राधा का बारिश में भीगना…मोहित और इन्द्र का मिलना… बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया है आपने हर क्षण को… अच्छा लगा पढ़ कर…
    अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी…

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