रूही – एक पहेली: भाग-25

शेयर करें

जलेबी जंक्शन से आधा किलो जलेबी के साथ दही भी पैक कराया मोहित ने। गरम-गरम इमरती भी उतर रही थी तो वो भी आधा किलो पैक करा के मोहित लौट लिया।
“पागल ही है यार ये रूही ,अचानक से कुछ भी माँग लेती है । झल्लो”, फिर मुस्कुरा दिया।

रिसोर्ट में जब गाड़ी रोकी तो आठ बज चुके थे,अँधेरा सा हो चुका था। पार्किंग गार्ड ने बताया कि चूँकि वीआईपी सूट में ठहरा है मोहित तो वो अपनी गाड़ी सीधे ऊपर ले जा सकता है। मोहित ने गाड़ी फिर आगे बढ़ा दी । कॉटेज के आसपास न आदम और न आदम जात का अतापता था। दूर मंदिर से हलकी सी रौशनी आती दिखाई पड़ रही थी।मोहित मुड़ा तो दरवाज़े पर नज़र गयी, शायद लैंप से जल रहे थे चौखट के पास जिनकी रौशनी से बस दरवाज़े पर रौशनी नुमायां हो रही थी । पास गया तो देखा मोमबतियां थी, मोटी सी दो, मिटटी के सकोरे से घिरी हुई । दरवाज़े पर खटखटाया तो खुशबू सी आयी।
मोमबत्तियां महक रही थी और उनकी लौ मुस्कुरा रही थी, मोहित भी मुस्कुरा दिया।
फिर खटखटाया,नहीं खुला। दुबारा खटखटाया, नहीं खुला फिर भी। हल्का सा धकेला तो पाया कि दरवाज़ा तो खुला हुआ था। अंदर कदम बढ़ाये तो मोहित का पैर फिसल सा गया, उसने संभाला और नीचे देखा। गुलाब की ढेर सारी पंखुड़ियां उसके क़दमों तले । चौंक गया मोहित। आगे तक ढेर सारी पंखुड़ी उसके रास्ते में उसको बुलाती हुई । मोहित धीरे-धीरे आगे आया, कमरे में अँधेरा था। पंखुड़िये के रास्ते इशारे कर रहे थे कि कहाँ जाना है । अंदर खुशबुएँ तैर रही थी हवा में ।मोहित अंदर वाले कमरे की तरफ बढ़ गया। अंदर वाले कमरे का दरवाज़ा खोल तो आँखें खुली के खुली रह गयीं। दीवार से सटी हुई कमरे में ढेर सारी मोमबतियां जगमग करती हुई ,खुशबुएं फैलाती हुई। सामने नज़र गयी तो खड़ा का खड़ा रह गया मोहित। हाथ से जलेबी का पैकेट ज़मीन पर, अनगिनत फूलों से सजी हुई सेज। चारों तरफ से हज़ारों फूलों की मालाओं से ढका हुआ बिस्तर जैसे की फूलों का एक बॉक्स रखा हो सामने। रूही को आवाज़ दी उसने, नहीं दिखाई दी। बालकनी में झाँक कर देखा, नहीं थीं। मुड़ा तो चूड़ियों के खनकने की आवाज़ आयी। इधर-उधरदेखा, नहीं दिखी। फिर आवाज़ ज़रा ज़ोर से आयी।
“बुध्धू, यहाँ है तेरी रूही”

मोहित ने हाथ से फूलों को हटाया तो सेज पर लाल जोड़े में सजी हुई उसकी रूही। सुर्ख लाल साड़ी, बिना बाजु का सुर्ख लाल ब्लाउज, बड़ी-बड़ी आँखों में ढेर सारा काजल, लाल ज़हर सी लिपस्टिक, माथे पर बड़ी सी सिन्दूर की बिंदी, नाक में बड़ी सी नथ जो पीछे कान के जाती हुई, कानों में लंबे से लटके हुए झुमके, गले में झुमकों से मैच करता हुआ कुछ पहना हुआ, हाथों में महकती हुई मेंहन्दी, आँखों में ज़िन्दगी तैरती हुई और हाथ में एक बोर्ड …
“तेरा बर्थडे गिफ्ट स्वीटी”
मोहित वहीं का वहीं खड़ा हुआ था। पलंग के कोने से टिक कर रह गया, देखता रहा। फिर एक टपकने वाला था आँखों से तो कसम याद आगयी। चेहरा ऊपर आसमान की तरफ कर उस को अंदर किया और वहीं ज़मीन पर बैठ गया।
रूही थी वो???
यो तो वो सपना था जो उसने एक बार रूही को सुनाया था बातों बातों में । ये वो सपना था जो मोहित सपने में भी नहीं देख पाया था या यूँ कहिये कि सपने में भी देखने में भी डरता था और आज रूही ने उस सपने को हकीकत बन दिया था।
“पसंद नहीं आया गिफ्ट स्वीटी?

रूही ने अपनी बड़ी-बड़ी गोल आँखे घुमाई।
“बोल ना स्वीटी, नहीं अच्छा लगा??

रूही आगे बढ़ी और बिस्तर के कोने के पास आ गयी। मोहित बिस्तर के कोने पर अपना चेहरा रखे हुए रूही को एकटक देख जा रहा था। कुछ नहीं बोल पा रहा था। होंठ हिलते थे, कुछ कहना चाह रहा था पर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी। होंठ फिर फड़फड़ाये पर फिर आवाज़ नहीं निकली। गला सूखे जा रहा था। रूही को मोहित की हालत का अंदाज़ा हो गया था पर इतना असर होगा मोहित पर रूही को अंदाजा नहीं था।

जलेबी का तो बहाना था, वो मोहित के उस सपने को पूरा करना चाहती थी जो मोहित ने उसे सुनाया था एक बार साथ में दारु पीते हुए रेडियंट में। फिर सुनाते-सुनाते जब मोहित की आवाज़ भरभराने लगी थी तो रूही के गले लग गया था उस दिन। बात आयी-गयी हो गयी थी पर रूही के दिल को छू गयी थी।
रूही ने मोहित को हाथ पकड़ कर ऊपर बुलाया। मोहित खड़ा हुआ तो उसके पैर काँप रहे थे।
“क्या हुआ रे?”
“…………..”
“बोल ना स्वीटी”
“ये तूने क्या किया बब्बल?” मोहित की आवाज़ निकली।
“तुझे अच्छा नहीं लगा स्वीटी?”
“बहुत अच्छा बब्बल, बहुत अच्छा, बहुत-बहुत अच्छा, बता नहीं सकता मैं” मोहित ने रूही को बाँहों में ले लिया। मोहित अपने पर काबू नहीं पा रहा थ । रूही को तकिये के सहारे लिटाया और उसकी बाँहों में खुद सिमट गया। रूही समझ रही थी, सब समझ रही थी। वो मोहित को बस आज रोकना नहीं चाहती थी । एक बच्चे की तरह मोहित रूही के कंधे में छुपा हुआ था। पास खींचे जा रहा था रूही को।
“पास आ ना मेंरे पास बब्बल” रूही सिमटी
“और पास” रूही और सिमटी।
मोहित ने अपने पैर सिकोड़े और रूही के कंधे में फिर मुँह छुपा लिया। रूही ने करवट ली तो मोहित के होंठ रूही की गर्दन पर आ गए। रूही ने कस कर मोहित को अपनी बाँहों में जकड़ लिया। मोहित कुछ कहना चाह रहा था। होंठ उसके हिलते हुए से रूही को अपनी गर्दन पर महसूस हो रहे थे। कुछ पल बाद रूही को अपनी गर्दन पर कुछ गीला सा महसूस हुआ ,समझ गयी वो।
“रो ले आज स्वीटी, आज के लिए कसम वापिस ले ली मैंने”मोहित बिलख पड़ा ,फूट-फूट कर रो पड़ा।
रोये जा रहा था, रूही को चूमे जा रहा था। रूही ने मोहित की बाहों में अपने को बिखर जाने दिया। ये बाँध टूटना ज़रूरी था मोहित का, पता था रूही को। ये आँसू रूही ने ही मोहित को दिए थे और वो ही आज इन्हे सुखा देना चाहती थी। एक तेज़ रफ़्तार नदी एक विराट और विशाल समुद्र में मिलने वाली थी आज। ये तमन्ना भी आज नदी की ही थी कि उसे अब नदी बन कर नहीं रहना है बल्कि मिल जाना है समुद्र में।
“घोंचू इत्ती मेहनत से मेकअप किया है, सारा ख़राब कर दिया” रूही ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की। मोहित का सुबकना बंद हो चुका था। मुँह ऊपर किया, रूही की और देखा तो रूही का झूठा गुस्सा दिख गया।
“चल उठ, इत्ती मेहनत से सारी तैयारी की और तू रोन्टू बच्चा बन गया”
“तो मैं क्या करता बब्बल, ये तो एक्सपेक्ट ही नहीं किया था”
“तुझे पता नहीं कि मैं कौन हूँ?”
“……..”
“तेरी रूही ….. एक पहेली”
मोहित थोड़ा ऊपर हुआ। रूही अब बिस्तर से टेक लगा कर बैठ गयी थी और मोहित उसके बाएँ हाथ की बाँहों में सिमटा हुआ था मोहित का दूसरा हाथ रूही की कमर पर आया , रूही थोड़ा कसमसाई।
आँखे बंद थी रूही की।
“नो”
“ओके”
“मेरा गिफ्ट बस इतना ही, मोहित ने रूही को हिलाया?”
“क्या इतना ही?”
“बस ये सज़ावट, ये फूल? बस?”
“इडियट है तू स्वीटी, आंख बंद किये रूही बुदबुदाई”

मोहित नहीं था इडियट, स्वीटी था।
“क्यों इडियट हूँ मैं बबब्ल?”
“तू जब आया, तो मैंने दिया तो था ना गिफ्ट”
“क्या दिया था?” मोहित मुस्कुरा रहा था।
“मैं, मैं हूँ तेरा गिफ्ट, पूरी की पूरी, आज तेरे लिए”
मोहित ने कस कर भींच लिया रूही को अपनी बाँहों में। रूही बस कहने को ही मनचली थी, तभी तक मचलती थी जब तक मोहित शुरुआत नहीं करता था, जब मोहित ने शुरू किया तो रूही की मानो जान ही सूख गयी। दिन में पूल पर भी वो मोहित को देख चुकी थी। ऊपर से शांत पर अंदर से आग का गोला था वो। चूड़ियां छन-छन कर रही थी। रूही इतना करीब थी मोहित के कि मोहित की साँसों की आवाज़ भी सुन सकती थी।
“जाने दे ना स्वीटी”
“कहाँ जाना है?”
“छोड़ दे न प्लीज”
“क्यों?”
“मर जाउंगी मैं स्वीटी”
“नहीं मरने दूंगा पगली”
“तू समझता नहीं है, प्लीज छोड़ दे ना”

रूही का हाल था कि

“जाने दो मत रोको न”

आप अपने हिसाब से कोमा फुलस्टॉप लगा लीजिये।
जाने दो, मत रोको
या
जाने दो मत, रोको ना।

ये एक सूखी नदी की गुहार थी सागर से। मोहित ने ढीला छोड़ा तो रूही की नथ मोहित की शर्ट के बटन में अटक गयी। मोहित धीरे से हँसा,
“लाओ तुम्हरी नथ उतार दूँ” रूही ने देखा मोहित की तरफ।
“तू बहुत छिछोरा है रे सच्ची, नहीं पता था मुझे”
“हाहा- हाहा” मोहित की ये हँसी कमीनापन का ऐलान कर रही थी।
रूही ने धीरे से अपनी नथ उतारी । मोहित एक कोने में टिका हुआ था। रूही पलंग के दूसरे कोने में।
अपलक देखे जा रहा था मोहित अपने सपने को पूरा होते देख। गर्दन टेड़ी करके रूही ने एक झुमका उतारा। जब दूसरा उतार रही थी तो मोहित पर नज़र गयी तो शर्मा गयी ।

“ऐसे क्यों देख रहा है स्वीटी”
“कुछ नहीं”

रूही ने झुमके उतारे, फिर पायल उतरने वाली थी कि मोहित ने मना कर दिया, चूड़ियां उतारने वाली थी कि मोहित पास आ गया।
“इन्हे रहने दे। मुझे इनकी खनक सुननी है आज रात भर”
रूही ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। मोहित रूही के पीछे गया और उसके गले से उसका नैकलेस उतारने लगा । एक सेकिंड में मोहित ने रूही को अपनी और पलटा और उसके होटों पर अपने होंठ रख दिए। चूड़ियां खनकने लगी थी। आजमोमबत्तियां पिघल-पिघल कर अपना दम तोड़ने पर उतारूँ थी। पर खुशबुएं अपनी कमरे में घोल चुकी थी।

रूही ने मोहित को जब अलग किया तो रूही की साँसे रुकी हुई सी थी।
“मर जाउंगी स्वीटी में”
“नहीं मरेगी”
“सच्ची स्वीटी, ख़तम हो जाउंगी मैं”
“नहीं होने दूंगा, पास आ”
“तेरी कसम स्वीटी, जान निकल जाएगी मेरी”
“तो????”
“निकाल दे जान, मार डाल, ख़त्म कर दे मुझे आज” और फिर रूही ने आँखें बंद कर ली थी।

जल्लाद ने आँखें बंद की और फांसी देने की तैयारी में जुट गया। कैदी ने फांसी चढ़ने से पहले जल्लाद की पीठ पर के नाखून के गहरे निशाँ छोड़ दिए थे ताकि ताकीद रहे कि कैदी ने साँसे उखड़ने से पहले अपनी जान बचाने की बहुत कोशिश की थी।

पायल खनकती रही, चूड़ियाँ खनकती रही। पहले एक मोमबत्ती बुझी। फिर धीरे-धीरे कमरे में अँधेरे होता गया।

मोहित का जन्मदिन मुबारक हो रहा था, रूही ने उस रात मोहित की होली में ढेर सारे रंग बिखेर दिए और उस होली में खुद स्वाहा हो गयी। साँसे जब थमी दोनों कि तो निढाल हो चुके थे। मोहित की बाँहों में अब रूही सिमटी पड़ी थी उसको अपने में समेट कर। मोहित के सीने से लगी हुई रूही। होंठ मोहित के रूही के माथे पर।
“तू खुश हैं ना स्वीटी?”
“तू बता बब्बल”
“तू बोल स्वीटी, तेरे मुँह से सुनना है”
“तूने ज़िंदा कर दिया स्वीटी को बब्बल,बहुत खुश हूँ”

रूही ऊपर हुई, मोहित के होंठों पर फिर अपने होंठ रख दिए।
“बस, अब और कुछ नहीं चाहिए मुझे स्वीटी”

मोहित ने साइड लैंप जलाया। माथे पर बिखरा-बिखरा सिन्दूर का टीका, काजल फ़ैल के गालों तक आया हुआ। लिपस्टिक का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था उस चेहरे पर। रूही के चेहरे का जुग्राफिया एक घण्टे पहले की हिस्ट्री का ब्यान कर रहा था। रूही की कलाइयों पर टूटी हुई चूड़ी की खुरच के सूखे हुए खून के धब्बे नुमायां हो रहे थे। मोहित ने चूम लिया उन कलाइयों को। रूही ने मुस्कुराते हुए मोहित को देखा । पता नहीं उन आँखों में कितनी कहानियाँ छुपी हुई थी। रूही ने इशारा किया मोहित को ब्लाउज की डोरी पीछे से बाँधने को। मोहित पास आया और रूही को फिर झटके से अपनी बाँहों में पीछे से भर लिया । मन नहीं भरा था अभी भी दोनों का।

बाएँ कंधे पर जो एक तिल था रूही के। बस आज से पहले इतना ही देखा था रूही को मोहित ने और आज के बाद वो सारे तिलों को गिन के बता सकता था। रूही ने फिर अपने को ढीला छोड़ दिया। तकिये पर मुँह छुपाये हुए लेटी हुई थी करवट किये हुए। एक हाथ अपने सर में छुपाए हुए और एक हाथ पर ज़मीन पर कुछ लिखती हुई। मोहित ने उठ कर देखा। नीचे ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों की पंखुड़ियों से लिखा हुआ था,
“स्वीटी की बब्बल”

मोहित उठा और ड्रेसिंग रूम से रूही की एक लिपस्टिक उठा लाया। आकर फिर लेट गया रूही के पीछे ।
जैसे ही डोरी पर हाथ लगाया। रूही ने मोहित का हाथ पकड़ लिया। नाखून रूही के फिर अपना काम कर रहे थे ।
“कुछ नहीं करूँगा जान”
“जान नहीं है मेंरे अंदर अब, बस कर कुत्ते”
“अरे बाबा कुछ नहीं कर रहा हूँ” मोहित ने रूही की पीठ पर हाथ फेरा ।
“देख मर जाउंगी, मान जा” मोहित ने के हाथ से रूही के होंठों पर ऊँगली रख दी ।
“नहीं मरने दूंगा, बोला ना”
“कसम है तुझे स्वीटी” मोहित ने दूसरे हाथ से लिपस्टिक खोली और पीठ पर जैसे ही लगाई, रूही हिल गयी ।
“मत कर स्वीटी, मत कर”
पिघल-पिघल जा रही थी रूही पल भर में। ज़रा सी आंच सहन नहीं हो रही थी रूही से।
रूही की पीठ पर मोहित ने कुछ लिखा।
“बता क्या है”
“मेरा नाम स्वीटी” रूही मुस्कुराई।
मोहित फिर कुछ लिखने को हुआ। लिपस्टिक रख दी उसने। अब ऊँगली से लिखने वाला था कि हाथ किसी निशाँ पर हाथ रुक गया । कुछ गहरा सा निशान था, मोहित ने हाथ फिर फेरा। रूही एक दम से झटके से उठी। अपने को समेटा और बिस्तर से उठ कर खड़ी हो गयी।
“क्या था वो बब्बल?”
“…………….”
“क्या था वो?”
“कुछ नहीं”
“कुछ नहीं मतलब?”
“…………”
“मैं कुछ पूछ रहा हूँ” मोहित उठ के रूही के पास आया और चेहरे में हाथ लिया उसके, ऊपर किया तो गीली थी आँखे।
“ये क्या हुआ?” मोहित की समझ में नहीं आया कि अचानक रूही को क्या हुआ था। हाथ थाम कर रूही को बिस्तर पर लाया, धीरे से लिटाया और पैरों के पास बैठ गया।
“क्या हुआ बब्बल?”
“कुछ नहीं स्वीटी, जाने दे, कुछ चीजों को छोड़ ही देते हैं”
“ना रे, बता मुझे क्या था वो”
रूही ने करवट ली , पीठ पर से ब्लाउज हटाया। कमर के हिस्से की तरफ कई गोल गोल निशाँ थे, कुछ छोटे कुछ बड़े, कुछ हलके कुछ गहरे। मोहित काँप गया।
“क्या है ये रूही”

रूही मोहित के गले लग गयी और फफक पड़ी।
“ये मेरी शादी है स्वीटी”

2 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-25

  1. Arey waah,…. Aaj to badi jaldi upload kar diya aapne, pichhle bhaag ki kasar poori kar di. Timing aur story dono ke lihaaj se.
    Agle bhaag ke intezaar me……

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *