रूही – एक पहेली: भाग-23

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आज क्या होने वाला था ? रात क्या साथ रुकने वाली थी रूही? घर क्या कह कर आई थी।
सोचते-सोचते आँख लग गयी मोहित की। गीले पानी के छींटों से आँख खुली मोहित की।
सफ़ेद कुरता पहने खड़ी थी ,सिर्फ कुरता , सफ़ेद कुरता , भीगी-भीगी सी रूही , सूखा-सूखा सा मोहित, भीगने को तैयार।
“भूख लगी है, कुछ मँगाओ खाने को” रूही का आर्डर आया।
फ़ोन करके मोहित मुड़ा तो रूही दरवाज़ा खोल कर बाहर बालकनी में खड़ी हुई थी। पहाड़ी पर मंदिर की तरफ आँख बंद करके हाथ जोड़े हुए , कुछ बुदबुदाती हुई। बारिश की जगह अब ठंडी हवाओं ने ले ली थी। रह-रह कर हवाओं की वजह से रूही के गीले बाल उसके चेहरे पर आ जा रहे थे। रूही मग्न खड़ी थी , कुछ माँगती हुई , कुछ देती हुई मोहित को । आँख खोली, फिर मुस्कुराई , अब वो दोपहर वाली रूही नहीं रह गयी थी। शांत, निश्छल, बिलकुल वैसी सी जैसे वो हमेशा से देखता आया था। गीले बालों को कुर्ते पर आगे किये हुए। पानी हल्का-हल्का टपक कर कुर्ते को सूखने नहीं दे रहा था या रूही सूखने नहीं देना चाहती थी?

थोड़ी देर बाद वेटर आर्डर लेकर आ गया। गर्मा-गर्म आलू के पराठे मक्खन के साथ खा कर मोहित की आँखे अब खुलने को तैयार नहीं थी। बेड पर कोहनी के बल लेटा हुआ था रूही को ताकते हुए पर कमबख्त रूही का गीला कुरता उसे सोने नहीं दे रहा था।
“सुनो..”
“हाँ स्वीटी?”
“एक काम करो तुम, एक बार में ही मार डालो न यार। क्या सुबह से धीरेधीरे जान निकाल ले रही हो”
“हा हा हा, पागल…”
“सच्ची यार , तुम समझ रही हो ना?”
“नन्ना”
“तू ये बता कमीनी, ये कसाई वाला कोर्स कब कर लिया तूने”
फिर हँसी रूही , “निन्नी आ रही है मेंरे बाबू को?”
“भाड़ में गयी निन्नी पिन्नी, तू इधर आ”
रूही उठी , पास आई मोहित के, मोहित बेड के सिरहाने तक लगा कर बैठ गया। रूही पास आई , हाथ बालों में फेरा मोहित के,
“सो जा हीरो, बस इतना ही आज के लिए, बहुत ऐश कर लिए आज तूने, होली खत्म बस”
मोहित ने गहरी साँस ली ,समझ गया, होली, हो ली।

रूही अंदर गयी और गाउन चढ़ा कर मोहित के बाजू में लेट गयी।
“आजा सोते है स्वीटी” रूही की आँखें बंद हो चुकी थी। कितनी शान्ति थी उसके चेहरे पर। क्या मिल गया था?
“मोक्ष???? आज़ादी? या क़ैद में आकर खुश थी??”

थोड़ी देर में रूही ने पैर सिकोड़े। शायद ठंडा सा हो रहा था। मोहित उठा, बालकनी का दरवाज़ा बंद किया , परदे ठीक किये और आकर लेट गया। रूही ने अब हाथ भी सिकोड़ लिए थे । उकड़ूं होकर सो रही थी झल्लो । मोहित ने रजाई ली और रूही को ओढ़ाने लगा। रूही ने टप्प से आँखें खोली ,बड़ी-बड़ी आँखे और फिर लाल-लाल आँखे , कुछ कहा उन आँखों ने। लेकिन इस बार मोहित ने उन्हें अनदेखा कर दिया । होश में आ चुका था मोहित , स्वीटी बन गया था फिर से। अपनी हथेली से आँखे रूही की बंद की हौले से रज़ाई ओढ़ाई और बाजु में लेट गया।

“मुझे ठंडा लग रहा है स्वीटी , इधर आजा मेंरे पास” मोहित रूही के बाजू में गया और कस के अपनी बाँहों में ले लिया ।

रूही रज़ाई के अंदर और मोहित रजाई के बाहर रूही को अपनी बाँहों में लिए पड़ा हुआ था और रूही मुस्कुरा रही थी। मोहित हँस दिया,
“हाँ, मैं इडियट हूँ, पागल हूँ, ऐसा ही हूँ पर”
बातों-बातों में रूही ने बताया कि रौशन दिल्ली गए है कोई काम से और दो दिन नहीं आने वाले। बच्चे अपने नाना-नानी के पास और वो, यानि मोहित की रूही, मोहित के पास। ऑनन-फानन में रोशन का जाने का प्रोग्राम बना था और तभी रूही को याद आया था कि मोहित का जन्मदिन होली वाले दिन ही पड़ता है। बस उसके दिमाग का शैतान जाग गया और मोहित से सारे बदले एक साथ लेने की ठान ली। सॉरी बोला मोहित को बारह घंटे सताने के लिए और फिर आँख बड़ी-बड़ी करके ये भी कहा कि इनाम भी तो दिया है ना सताने का???

रूही हँसी , मोहित हँसा और फिर रूही ने आँख बंद कर ली । रूही का सर मोहित की बाहों पर था।
बात करते-करते कब सो गया उसे भी नहीं पता चला। छःबजे रूही ने हिलाया मोहित को। तीन घंटे सोता रहा था मोहित। रूही डेनिम शॉर्ट्स में थी, बाल बंधे हुए रुमाल से पीछे , काजल लगा हुआ, कान में छोटी से बालियां हिलती हुई। फ्लैट चप्पल पहन कर सामने खड़ी थी,
“मुझे जलेबी खानी है, आर्डर आया”
“आर्डर कर दो”
“यहाँ नहीं मिलती”
“तो?”
“मुझे क्या पता, मुझे तो खानी है बस”
“अरे तो मैं कहाँ से बनाऊं?”
“मुझे नहीं कुछ पता, बस जलेबी लाओ”
“हे भगवन, कैसे पागल पल्ले पड़ गयी” मोहित ने फ़ोन करके पूछा रिसेप्शन पर। आसपास कोई दुकान नहीं थी ।
“शहर जाना पड़ेगा बब्बल, चलो”
“ना, मैं ना जा रही, तू लेकर आ”
“अबे पगला गयी हो का?”
“हाँ, बस खानी है, खानी है, खानी है”
“ओके मेरी माँ, जाता हूँ”
“मुआह…. रूही ने एक फ्लाइंग किस मारी” मोहित का गुस्सा गायब।

अब मोहित को पुणे में जाकर जलेबी लानी थी अपनी हीरोइन के लिए। रिसेप्शन पर जा कर पूछा मोहित ने तो बताया गया कि दो फेमस जगह है पुणे में। एक तो जलेबी जंक्शन और दूसरा कड़ाही। दोनों ही जगह की जलेबी का काफी नाम है। रास्ता बराबर है और आने जाने में लगभग एक से डेढ़ घंटा लग जाएगा। मोहित को बेवकूफी लगी इतनी दूर जाना और वो भी जब रूही उसके साथ है। उसने रूम में फ़ोन किया,
“सुनो, काफी दूर है यार शॉप”
“मुझे जलेबी खाना है”
“यार दो घंटे लग जायेंगे”
“मुझे जलेबी खाना है”

नहीं मानेगी ये पगली, समझ आ गया मोहित को। रास्ते तो सारे रटे हुए थे मोहित को पुणे के।
ड्राइव करते हुए , रास्ते भर पता नहीं कितने ख्यालो में खोया रहा।

2 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-23

  1. इतने दिन से आप बढ़िया रोज एक भाग डालते थे, आज तो इंतेज़ार में ही गुजर गया…..

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