मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-22

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रूही एक्सपर्ट थी आग भड़काने में और बुझती हुई आग को फिर से हवा देने में। रूही तो ऐसी शै थी कि सीली हुई लकड़ियों को भी सुलगा देती थी। मोहित तो वैसे भी वो राख का ढेर था जो बरसों से सिर्फ एक हलकी सी चिंगारी का इंतज़ार कर रहा था। और रूही ?
वो तो आग से खेलने में माहिर थी। वो खुद होली वाले दिन होलिका बन कर आज मोहित को ख़ाक करने आई थी। हश्र क्या होना था??? मोहित ने हाथ दिया रूही को , रूही ने मोहित को अपनी और खींचा, नहीं हुआ । मोहित ने झटके से उसे पूल में खींच लिया। दूसरे ही पल वो फिर से मोहित की बाँहों में थी। रूही की आँखों में उलाहना थी और याचना भी और आमंत्रण भी। मोहित ने उलाहना और याचना को परे किया और आमंत्रण को तवज्जो दी। एक हाथ से बाल पकड़े पीछे से रूही के और दूसरे हाथ से दोनों गालों को हलके से दबकर बोला।
“मत ले पंगा मेंरे से, बर्बाद हो जाएगी”
“अब और कुछ बाकी रह गया है बाबू?”
“क्या करने पर उतारू है आज तू बब्बल?”
“जो तू चाहे आज”

मोहित ने बाल छोड़े, गालों से हाथ हटाया रूही को सीने से लगाया। अचानक पता नहीं मोहित को क्या हो जाता था। बस सीने से लगाए रहा। बारिश और तेज़ हो गयी थी। इतनी तेज़ की दोनों की साँसों की आवाज़ भी आनी बंद हो गयी थी या पता नहीं दोनों की साँसे ही चलना बंद हो गयी थी। ये बारिश ही थी जो मोहित की ज़िंदगी के हर लम्हे से जुडी हुई। कभी नमकीन पानी का सागर बन कर तो कभी कभी मीठे पानी के चश्मे सी। इसी बारिश ने मोहित की ज़िंदगी के पन्ने बदले थे हर बार। आज इस बारिश में फिर सब कुछ धुल के निकल रहा था मोहित के अंदर से।

“चलो ना अब बाहर” रूही बोली। मोहित ने रूही को अपने कलेजे से लगा कर उस आग की तपिश को कम कर दिया था जो रूही ने लगायी थी। पर आग लगी हुई थी , चिंगारी सुलग रही थी। मोहित ने हाथ थामा रूही का और पूल की सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। बार के दाहिनी ओर रेन डांस चल रहा था। रूही ने मोहित को धकेला उस तरफ पर मोहित ने मना कर दिया । अचानक से शांत सा हो गया था। रूही ने आग जो लगा दी थी उस पर मोहित का दिल भारी पड़ रहा था। रूही के तेवर वो जानता था।
वो कब, क्या और क्यों करती थी ये रूही को भी नहीं पता होता था। वो रूही को खोना नहीं चाहता था।
उस एक पल के लिए जो रूही उसे देना चाहती थी मोहित रूही को ताउम्र के लिए खोना नहीं चाहता था।
समेट लिया मोहित ने अपने जज़्बातों को।
मार लिया फिर मन , क्यूंकि पाना चाहता था रूही को हमेशा के लिए। रूही ने हाथ छुड़ाया और स्टेज की तरफ दौड़ गयी। आज रूही बच्ची बनी हुई थी। शायद यही ज़िंदगी रूही को मयस्सर नहीं थी और यही ज़िंदगी जीना चाहती थी रूही मोहित के संग और आज मोहित साथ था। रूही डांस ग्रुप में खो गयी जा कर। बीच-बीच में आकर मोहित को खींच कर ले जाने की कोशिश की पर मोहित ने हर बार मना कर दिया। वहीं पूल के पास बैठ कर बियर के घूँट लेता रहा। आधे घंटे बाद रूही आई और मोहित के ऊपर ढेर हो गयी।

“हाय राम, बहुत थक गयी। कित्ता मज़ा आ रहा था । तू क्यों नहीं आया?”
“मैं पहले ही थका हुआ हूँ यार”
“चल कपड़े निकाल दे, घर नहीं जाना है तुझे??”
“आती हूँ” रूही अंदर चेंज रूम में गयी और बाथरोब चढ़ा कर आ गयी।
मोहित के बाल तौलिया से पोछे। मोहित फिर मुस्कुराया , चुपचाप उसने रूही को करने दिया। आज वो रूही के किसी भी हक़ को मारना नहीं चाहता था और रूही कर भी वो सब रही थी जो मोहित को चाहिए था। बाल पोंछ कर रूही ने तौलिया मोहित के कंधो पर लपेट दी, बैग कंधे पर लिया और मोहित का हाथ पकड़ कर लॉन के कोने की तरफ बढ़ गयी जहाँ पार्किंग थी।

शालीमार रिसोर्ट नाम था उस जगह का मोहित ने पढ़ा। काफी बड़ी जगह में बना हुआ। आम तौर पर जैसे होते है रिसोर्ट , दूर-दूर तक कॉटेज बिखरी पड़ी थी जिनमे डुप्लेक्स थीं ज़्यादातर कॉटेज। पगडंडियों के रास्ते सारी कॉटेज आपस में मिली हुई थी और फिर सारी पगडण्डीयाँ एक जगह जा कर गड्मड्ड हो जाती थी। पगडंडियों के आजु बाजू छोटे छोटे गमले झाँक रहे थे। किसी में चमेली, गुलदाउदी, रात की रानी और भी जाने किया क्या महक रहा था पर आज रूही की महक इन सब पर भारी थी। वो एक महकता हुआ गुलदस्ता थी जिसमें हर रंग के गुल सजे हुए थे अपनी अपनी खुशबु बसाये हुए। सारी पगडण्डियाँ सीधे एक तीन मंजिला इमारत की तरफ जाती थी जहाँ शायद मेन लॉबी थी और रिसेप्शन भी उसके बाएँ और पार्किंग थी जहाँ रूही की कार खड़ी थी। मोहित उस तरफ बढ़ा तो रूही ने उसे अपनी तरफ खींचा,
“बहुत जल्दी पड़ी है भागने की?”
“फिर?”
“फिर क्या, साथ आओ” रूही के क़दमों से कदम मिलाता मोहित उसके साथ हो लिया।
उन सारी पगडंडियों से अलग एक रास्ता थोड़ा चढ़ाई की तरफ जा रहा था, रूही उस ओर बढ़ गयी।
मोहित के पल्ले कुछ नहीं पड़ा।

पाँच मिनट के बाद जब और ऊपर आगे गया तो सपाट मैदान था और एक अकेली कॉटेज दिखाई दे रही थी। वहाँ खड़े हो कर देखा मोहित ने वैसी ही तीन कॉटेज और थी जो रिसोर्ट के बाकी तीनों कोने में बसी हुई थी। रिसोर्ट को घाटी का रूप देकर उन्होंने इन चार कॉटेज को वाच टावर जैसा बना रखा था।
करीब डेढ़ सौ गज में होगी कॉटेज, सिक्योरिटी आटोमेटिक गेट वाली थी। कॉटेज के पीछे की तरफ, रिसोर्ट की मेन इमारत और बाकी तीन कॉटेज दिख रहे थे। सामने दिख रही थी पार्वती हिल्स की पहाड़ियाँ और उन पर बसा हुआ हरियाली के पीछे छुपा हुआ पार्वती देवी का काले पत्थर से बना हुआ सत्रहवीं शताब्दी का खूबसूरत मंदिर जो पहाड़ी पर एक पेंटिंग की तरह दिख रहा था। बहुत खूबसूरती से बनायीं गयी थी वो पेंटिंग, ऊपर वाले ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी उस पेंटिंग के आसपास के दृश्यों को अपने ब्रश से ज़िंदा कर देनी की। बदली के बीच से झांकती एक बेहद शानदार कलाकारी का नमूना
चूँकि बारिश हल्की-हल्की अभी भी हो रही थी सो कुछ गज़ब ही नज़ारा सा बन आया था। मोहित को बड़ा प्यार था ऐसी जगहों से ,जहाँ हरियाली हो, पहाड़ियाँ हो, मंदिर हो। बोला करता था रूही से वो ये सब और
ले आई थी रूही उसे वहाँ। रूही ने कॉटेज के दरवाजे में चाभी लगायी और अंदर। मोहित भौचक्का था।
इस बार रूही ने मोहित को ढेर सारे सरप्राइज देने का मन बना रखा था। मोहित का इंतज़ार किया रूही ने फिर, साथ अंदर लेकर आ गयी। अंदर एक छोटा सा घर ही था वो। जाते साथ ही बड़ी सी लॉबी, एक कोने में एल शेप में दो दीवारों को घेरे हुए सोफे,उसके ऊपर बड़ी सी एक खिड़की, जिस पर परदे पड़े हुए थे और सटा हुआ एक पल्ले वाला दरवाजा। मोहित ने खोल कर देखा, एक छोटा सा किचन था।
दूसरी दीवार के नीचे मोटा सा गद्दा और ढेर सारे कुशन्स उन पर रंगबिरंगे, उसके बाजू में एक दो पल्ले वाला दरवाजा।

रूही ने अपना और मोहित का बैग वहीं रखा और दोनों पल्ले खोले। बैडरूम था बड़ा सा, बेड के पीछे काले रंग की काँच की दीवार जिस पर बारिश की बूँदें फिसल रही थी एक कोने में चमड़े की आराम कुर्सी पड़ी थी जिसके बगल में एक था दरवाजा। मोहित की और चलने की हिम्मत नहीं थी वहीं कुर्सी पर ढेर हो गया। रूही ने अपने खुले गीले बालों का जूडा बाँध लिया था तब तक। गीले हुए बाल, बेशर्मी की हद पार करते हुए बार-बार लबों को चूमते हुए मोहित को मुँह चिड़ा रहे थे जैसे।

आँखें अभी भी लाल थी, रंगो का नशा? बारिश की मार? बियर के घूँट या मोहित की चाहत? किस का नशा अभी भी चढ़ा हुआ था रूही की लाल-लाल आँखों में?
चेहरे पर एक ऐसी मुस्कराहट जो जितना बता रही थी उस से ज़्यादा छुपा रही थी, उस ना-ना में जितनी मोहब्बत छूपी थी वो कभी हाँ-हाँ में कहाँ मयसर हुई थी।
मोहित जब तक सूख चुका था और शॉर्ट्स था नहीं बदलने को।
अब???

रूही ने अपने बैग से एक शॉर्ट्स निकाला और मोहित की तरफ उछाल दिया। चेंज कर लो मैं नहा कर आती हूँ , फिर कुछ खायेंगे। मोहित ने शॉर्ट्स हाथ में लिया और रूही के अंदर जाने का इंतज़ार करने लगा।
रूही हंसी , “इडियट”
मोहित कुछ न बोला। रूही बाथरोब पहने-पहने अंदर चली गयी। बाथरूम के दरवाज़े पर एक छोटी सी काँच की खिड़की थी जो अंदर से बंद होती थी,ऐसा मोहित को लगा। मोहित शॉर्ट्स बदल कर फिर कुर्सी पर ढेर हो गया।
“सुनो”, रूही आवाज़ आई , मोहित ने आँखें खोली।

मोहित दरवाजे के पास गया, रूही ने दरवाज़ा खोला, बाल खोल चुकी थी, बाथरोब पहने हुए थी पर बेल्ट खुली हुई थी। मोहित सामने था , उन्नींदा सा , शॉर्ट्स में , बिना टीशर्ट के , रूही मुस्कुरा रही थी। उसने बाथरोब सामने से खोला, मोहित को कस के झप्पी मारी और दरवाज़े के पीछे गायब। मोहित को जब तक कुछ समझ आता तब तक रूही गायब हो चुकी थी। मोहित की आँखों से नींद ऐसे गायब कर गयी थी कि अब शायद मोहित कभी सोने वाला नहीं था। रूही को महसूस करता तब तक रूही फिर राख के ढेर को कुरेद के जा चुकी थी । मोहित कसमसा के रह गया ,आवाज़ लगाई,
“रूही ……………रूही …………..”
रूही ने छोटी सी काँच की खिड़की पर से लकड़ी की तख्ती हटाई और बोली।
“क्या हुआ हीरो”
“यार ऐसे न किया करो”
“अब क्या किया मैंने”, मासूम सी लड़की बोली।
“तुझे नहीं पता तू क्या करके गयी?”
“ना-ना, मैंने क्या किया??”
“सुनो न, बाहर आओ ना प्लीज” मोहित ने मिन्नत की।
“क्यों?”
“आओ तो सही”
“अच्छा आती हूँ” मोहित की बाछें खिल गयी।
“नहा कर आती हूँ”, वहीं काँच की खिड़की से मुँह सटाये रूही बोली।
“जाओ मैं नहीं बात कर रहा”
रूही खिलखिला के हँस पड़ी,
“अच्छा सुनो इधर आओ” काँच की खिड़की से सिर्फ रूही की लाल लाल ऑंखें दिख रही थी। मोहित पास आगया, रूही ने अपने होंठ उस काँच पर टिका दिए।

“जान ……………………..” अंदर से धीरे से आवाज़ आई
मर मर जा रहा था मोहित, साँस ऊपर नीचे। मोहित पास आया काँच के , होंठ काँच पर टिकाये और रूही ने अपने होंठ हटा लिए। ऐसे ही मारती थी रूही ,धीरे-धीरे, तिल-तिल करके।

मोहित के हाथ पावं सब काँप रहे थे। रूही दूर जाती हुई दिखाई दी ,टब के पास गयी , बाथरोब पीछे उतारा, पीछे फेंका। मोहित की आँखे जवाब दे रही थी अब। टब के जाने से पहले पीछे मुड़ी , बाल पीठ से करके आगे लिए , एक फ्लाईंग किस दी मोहित को आँख बंद करके और टब के अंदर। मोहित की जान बाहर , साँस रुकी हुई। रूही ने पर्दा डाल लिया था।
आवाज़ आई , “सो जाओ डार्लिंग, थक गए होगे, अभी आती हूँ”

उस परदे के पीछे से अब सिर्फ रूही की हिलती हुई परछाईं ही दिख रही थी। उस काँच पर रूही के होंठों के निशान अभी भी बने हुए थे। गर्म पानी की भाप से मिटने को ही थे वो निशाँ कि मोहित ने उनको अपने होंठों में समां लिया।

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