रूही – एक पहेली: भाग-2

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साल वही 2009, महीना बारिशों का, तारीख याद नहीं, रात के 12.04 पर बात हुई,
5 मिनट तक बिज़ी मिलने के बाद जब रूही ने फ़ोन उठाया तो आवाज़ आई,
“मोहित बोल रहा हूँ”

रूही चहक कर बोली, “मुझे मालूम था कि तुम फ़ोन करोगे”
“कल मिल सकती हो” मोहित ने पूछा
रूही ने अपनी आदत के हिसाब से कहा, “तुम आओगे मिलने?”
मोहित बोला, “मै तुम्हारे शहर में ही हूँ,मिलने ही आया हूँ”
रूही सकते में आ गयी,सन्नाटा सा छा गया उसके सामने।अटकते हुए बोली, “मुश्किल होगा, मेरे कुछ प्रोग्राम्स होते है स्पेशल और मैं उन्हें नहीं छोड़ सकती”
मोहित ने कहा “कोई बात नहीं, मै उसी होटल में हूँ। अगर टाइम निकाल सको तो आ जाना। मेरी फ्लाइट शाम 6 बजे की है”
“I am sorry , नहीं आ पाऊँगी, आप वेट नहीं कीजियेगा”

दोपहर 1 बजे रूही का फ़ोन आया,
“मै सिर्फ 10 मिनट के लिए आ पाऊँगी” मोहित मुस्कुरा दिया।
रूही आई, रूही को क्या पता था कि ये 10 मिनट उसकी ज़िन्दगी और मोहित की ज़िन्दगी के कई हज़ार मिनट, कई लाख मिनट पर भारी पड़ने वाले हैं। मोहित से पहली मुलाकात थी उसकी और उस दिन का दूसरा झटका रूही का इंतज़ार कर रहा था।
एक कॉर्नर की टेबल पर मोहित बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था। मोहित उठा,मुस्कुराया। रूही बहुत नर्वस थी,उसके साथ पहली बार ऐसा हुआ था। मोहित ने इशारा किया, वेटर बड़ा सा केक लेकर आया। रूही सकपका गयी और फिर सकपकाई सी रूही ने केक काटा। मोहित ने उस दिन पहली बार रूही को अपने कैमरे में उतारा था।
क्लिक करता रहा मोहित ,शर्माती रही रूही और सब मिला कर 20 मिनट में सब कुछ हो गया।
रूही बोली “मुझे जाना है”
मोहित ने कहा “मै कुछ लाया हूँ तुम्हारे लिए”
“अरे, तुम इतनी दूर से मेरे लिए आये हो,ये बहुत है, ये तो सबसे बड़ी गिफ्ट है मेरे लिए”
मोहित ने छोटा सा गिफ्ट बॉक्स निकला और रूही को दे दिया, बोला घर जाकर देखना। छोटी से चीज़ है,एक दोस्त की तरफ से दूसरे दोस्त को। रूही ने बहुत मना किया पर मोहित नहीं माना और बॉक्स रूही के बैग में रख दिया।
रूही चली गयी, रूही मुस्कुराती हुई आई थी पर जब गयी तो मुस्कुराती हुई “सी” थी।
कुछ हुआ था, जो उसकी समझ से परे था या वो तैयार नहीं थी। कुछ तो था, पर वो रूही थी, उसने सर को झटका दिया, कार स्टार्ट की और चली गयी। लंच पर रोशन, उसका पति, उसका वेट कर रहा था। शाम को जब पार्टी में जाने के लिए वो तैयार हुई तो उसने बैग में बॉक्स देखा। टाइम देखा, मोहित की फ्लाइट का टाइम हो चुका था। बॉक्स खोला, उसमे से एक छोटी सी डायमंड रिंग झाँक रही थी। ये था तीसरा झटका उस दिन का। उसने तुरंत मोहित को फ़ोन मिलाया, मोबाइल ऑफ था, मोहित जा चुका था। रूही की समझ में नहीं आया कि वो खुश हो या नाराज़।
एक टेक्स्ट किया,
“तुम पहले शख्स हो जिसने मेरे जन्मदिन को बहुत स्पेशल बना दिया पर मै ये रिंग नहीं ले पाऊँगी। बुरा मत मानना पर ये मेरा हक नहीं है, मैं शायद समझा न सकूँ अच्छे से, पर बस”

मोहित को रात को 10 बजे टेक्स्ट मिला,उसने जवाब दिया,
“कोई बात नहीं” मत पहनना।
उस रात को मोहित ने रूही का बहुत इंतज़ार किया पर वो गुड नाईट टेक्स्ट नहीं आया।
सुबह आया, “कल रात मै अपनी पार्टी में बिज़ी हो गयी थी,तुम कैसे हो?”
“मै ठीक हूँ, थोड़ा बिज़ी हूँ, बाद में कॉल करता हूँ”
रूही के एक भी टेक्स्ट का जवाब उस दिन मोहित ने नहीं दिया। एक भी मिस कॉल नहीं दी पर रूही के टेक्स्ट का वेट करता रहा और उसकी मिस कॉल का भी और फिर शाम को रूही का टेक्स्ट आया,
“एक बार तो बात कर लो ना”
मोहित से नहीं रहा गया अब और उसने कॉल बैक किया,
“हाँ, रूही बोलो”
“नाराज़ हो”
“नहीं रूही”
“फिर क्या हुआ? बात क्यों नहीं कर रहे, टेक्स्ट का जवाब क्यों नहीं दिया?”
“थोड़ा बिज़ी था” झूट बोलना नहीं आता था मोहित को सो पकड़ा गया।
रूही ने कहा, “मुझे पता है तुम नाराज़ क्यों हो, पर प्लीज समझो मै ये रिंग नहीं ले सकती। ये ठीक नहीं है, कैसे समझाऊं तुमको?” रूही समझाती रही , मोहित समझता रहा, फिर बोला, “रूही, कोई बात नहीं,मै समझ गया।” रूही भी समझ चुकी थी।

शाम को मोहित को एक MMS आया।
रूही के हाथ की फोटो थी,वो रिंग पहने हुई थी।कैप्शन था, “For you only”
वक़्त करवटें बदलने लगा था, जाते जाते मोहित के वक़्त ने शायद फिर एक बार पलट कर आवाज़ दी थी, ऊपर वाले ने अपनी डुगडुगी फिर बजायी थी। खिलौने में जान आने वाली थी।

रूही को क्या पता था कि वो ज़रा सी ख़ुशी जो उसने मोहित के लिए दी थी क्या रंग दिखाने वाली थी।

तारीख 17 नवम्बर, 2009, वक़्त रात 8 बजे

मोहित ने रूही को फ़ोन किया, वो कुछ कहना चाह रहा था, पर हिम्मत जवाब दे रही थी पर जी कड़ा किया और लगा ही दिया।
“हेलो, रूही ने चहक कर फ़ोन उठाया”
“क्या हाल?”
“बढ़िया”
“क्या चल रहा है”
“कुछ नहीं,बस यूँ ही”
मोहित ने कहा, “रूही मुझे कुछ कहना है”
“हाँ बोलो”, रूही ने कहा
“I am in love with you, Roohi”
रूही ने इतनी जोर से ठहाका लगाया कि मोहित की सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। उसकी समझ में नहीं आया कि ये कैसा जवाब था।
रूही बोली, “हेलो सर जी, दिमाग ठीक हैं? इतना मज़ाक न करो यार, ये प्यार-व्यार मेरे बस की बात नहीं है”
मोहित ने कहा, “नहीं रूही, I am serious”
रूही बोली, “Please , don’t spoil the relation. I care for u, I respect you. ऐe have shared some very good moments, but i am not interested in this love sho And most importantly, I am committed to someone else. I have a past which is beyond all these new relations.” मै तुम्हे पसंद करती हूँ पर कभी दुबारा से प्यार की बात नहीं करना, मुझे नफरत है इस शब्द से” रूही बोलती रही, मोहित सुनता रहा।
फिर बोला”कोई बात नहीं” मै तो मज़ाक कर रहा था।
रूही फिर भड़क गयी, “आज के बाद कभी मेरे से बात करने की ज़रुरत नहीं है। प्यार जैसा शब्द तुम्हारे लिए मज़ाक होगा मेरे लिए नहीं। दोबारा फ़ोन नहीं करना, मुझे तुमसे बात नहीं करनी” फोन काटा रूही ने, स्विच ऑफ किया और सो गयी।

तारीख 18 नवम्बर, 2009, वक़्त सुबह 8 बजे

रूही के फ़ोन की घंटी बजी, मोहित की काल थी, काट दिया।
10 काल काटी और फिर एक टेक्स्ट दिया,
“तुमको समझ में नहीं आता कि मुझे तुमसे बात नहीं करनी?”
मोहित ने टेक्स्ट का जवाब नहीं दिया और पीसीओ से फिर फ़ोन किया और बोला,
“नाराज़ हो अभी भी??”
रूही चौंक गयी, “बोली तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
मोहित बोला, “ मै तुम्हे ये बताने आया था कि मै भी प्यार को मज़ाक नहीं समझता पर तुमसे जो कहा वो मज़ाक ही था और तुम जब जब नाराज़ होगी मै तुम्हे मनाने आ जाया करूँगा रूही, कितनी देर का सफ़र है? दो ही घंटे की तो फ्लाईट लेनी पड़ती है”
“कहाँ रुके हो?”
“वहीँ उसी होटल में”
“कुछ काम से आये हो?”
“नहीं रे, बस तू नाराज़ हो गयी सो मनाने आ गया”
शाम को रूही, पहली बार मोहित की पसंद की रंग की ड्रेस पहन कर आई, ब्लैक कलर। वो पहली शाम थी जो रूही ने मोहित के साथ बितायी। घूमे, शॉपिंग की, डिनर किया और की ढेर सारी मस्ती।

शबरी नाम था उस रेस्तरां का, शिवाजी नगर में FC रोड पर बसा हुआ> महाराष्ट्रियन थाली परोसने वाला रेस्तरां था। बृहस्पतिवार की रात थी और हफ्ते का बीच का दिन होने के कारण गहमागहमी ज़्यादा नहीं थी।रूही के साथ बाहर निकल के जाने का पहला मौका था मोहित का। कार ड्राइव करते हुए शहर की भीड़-भाड़ से बाहर लेकर रूही लौट कर जब शबरी रेस्तरां पहुंचे तो 10 मिनट के रास्ते को पार किये एक घंटा हो चुका था। पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने से लेकर लौट के आने तक बस मोहित की यही कोशिश रही कि रूही के जितना करीब हो सके रहे। पर करीब आना इतना आसान कहाँ हुआ है किसी के और वो तो फिर भी रूही थी।
मोहित के मनाने से रूही मान गयी थी, एक नया रिश्ता पनपने लगा था। “I am in love with you, Roohi” बोल के मोहित ने जो गुनाह किया था, रात होते होते जो उस गुनाह की माफ़ी वो रूही से बख्शवा चुका था पर जो वो गुनाह कर चुका था उसे भी बड़ा एक गुनाह मोहित फिर कर चुका था। वो उस रास्ते पर चल चुका था जहाँ से आगे या तो सिर्फ रूही थी या फिर रूही सिर्फ रूही। अगर मोहब्बत गुनाह थी तो मोहित उस गुनाह की सारी हदें पर करने वाला था। अगर ख्वाब देखना गुनाह था तो मोहित वो गुनाह कर बैठा था, रूही को अपनी दुआओं में मांग बैठा था।
लोग तो पूरी कायनात मांग लेते हैं जनाब, ये तो बेचारा एक कुछ पलों की दुआ कर बैठा था और ऊपर वाले के दरबार में मोहित के इस गुनाह की कोई माफ़ी नहीं थी। ऊपर वाला इस गुनाह को कभी माफ़ करने वाला था या नहीं? ये तो उसे भी नहीं मालूम था।

इस वक़्त के दौरान दो वाकये हुए ,एक तो रूही को एक अच्छा सा दोस्त मिला और दूसरा,मोहित का प्यार ठुकरा दिया गया।
मोहित को तसल्ली बस इतनी थी कि उसे रूही का साथ मिल गया था। बिना रूही से पूछे, बिना रूही के परमिशन के बिना रूही के जाने हुए, मोहित प्यार कर बैठा था । पगला ही तो था, ऐसे कब कौन प्यार करता है भला? दीवाने ने कुछ न सोचा ,बावले ने कुछ न समझा ,बिना सोचे, बिना समझे बूझे ना इन्द्र के बारे में सोचा, ना शबाना के बारे में।

दिसम्बर 2009 आने वाला था और इस दौरान मोहित दीवानगी की हद को पार कर चुका था। हर आधे घण्टे में या तो टेक्स्ट या मिस कॉल पर जवाब बराबर आते थे। रूही भी शायद मोहित का इंतज़ार कर रही थी और फिर शुरू हुआ दीवानापन मोहित का।
कहाँ हो, क्या कर रही हो, कौन है साथ में? अब दोस्त होता तो सहन कर लेता रूही की ज़िंदादिली को पर दिखाने को ही तो दोस्त था,दिल तो प्रेमी का था।

और रूही तो आखिर रूही ही थी, एक आज़ाद पंछी के माफिक। बंध के रहना उसको पसंद ही नहीं था और अब मोहित की हद से ज्यादा चाहत उसको थोड़ी अखरने लगी थी। मोहित में उसको अपना बहुत अच्छा दोस्त मिल चुका था और वो उसको खोना नहीं चाहती थी। इसलिए गाहे बगाहे मोहित की हर बात मान लेती थी और बस मोहित को अपनी सपनो की दुनिया में एक और लाइन लिखने का मौका मिल जाता था। रूही अपनी ज़िन्दगी की ”लगभग” सारी किताब मोहित को सुना चुकी थी पर अभी भी ”सबकुछ” बाकी था। कुछ था ऐसा रूही की ज़िन्दगी में जो सिर्फ रूही के अन्दर दफ़न था और जो हर लम्हे उसको रुलाता था और अब तो मोहित भी रुलाने लगा था। साल भर के अन्दर ही मोहित और रूही में तकरार बढ़ने लगी थी।
मोहित का बार बार ये पूछना कि कहाँ हो?
फ़ोन का टाइम पर जवाब न देने पर पूछना कि “किसके साथ हो?”
“कहाँ जा रही हो?”
“कब आओगी?”
“किसके साथ जा रही हो?”
और फिर ये भी शुरुआत हो गयी कि “क्यों जा रही हो??”

और फिर उस दिन, उस दिन शायद रूही के ”दोस्त” का जन्मदिन था। सुबह से रूही बहुत खुश थी। पवन उसका कॉलेज टाइम का दोस्त था। वो दोस्ती जो आमतौर पर लड़के लड़कियों में नहीं पायी जाती, वैसे रिश्ता था उसका पवन के साथ।
वो कहते है न ”पवित्र रिश्ता” वैसा ही कुछ पर अब वो भी मोहित को बर्दाश्त नहीं था। सुबह से तिलमिला रहा था कि रूही पवन को मिलने जायगी पर कह पा नहीं रहा था।
दोपहर को रूही का फोन नहीं मिला तो टेक्स्ट किया “कहाँ हो?”
और फिर उस रोज़ रूही ने तंग आकर कह दिया,
“तुम्हे क्या मतलब, मै किसी के भी साथ हूँ, तुम कौन होते हो मुझसे इतने सवाल पूछने वाले? मेरे पति ने आज तक इतने सवाल नहीं किये जितने तुम पूछते हो” बात वही ख़तम नहीं हुई, ये शुरुआत थी। रात को रूही से फिर बहस हुई और इस बार फिर रोना गाना हुआ।
रूही ने कह ही दिया,
“क्यों कर रहे हो मेरे साथ ऐसे?, क्या ग़लती है मेरी?, क्या बिगाड़ा है मैंने तेरा?”

मोहित ऊपर से तो दोस्त ही था पर रूही को कैसे बताता कि दिल में आग लग जाती है रूही को किसी और के साथ देख कर।
इस बहस ने पहली बार रूही और मोहित को 2 दिन क लिए अलग कर दिया।
2 दिन बाद रूही का कॉल आया, मोहित ने अचानक पूछ लिया,
“रूही तुम मुझे प्यार करती हो?”
रूही ने सुना,फिर कहा, “ये प्यार शब्द मेरी डिक्शनरी से हट चुका है। मै तुम्हे पसंद करती हूँ, तुम्हारी केयर करती हूँ। अगर ये प्यार है तो तुम प्यार समझ लो और कुछ और समझना है तो वो समझ लो, जो जी करे वो समझो। बस और कुछ नहीं कहना है मुझे और उसने फ़ोन काट दिया”
मोहित सकपका गया। इतनी साफ़ साफ़ सुनने की उम्मीद नहीं थी उसको।

15 दिसम्बर 2009

फिर वही बात, “कहाँ हो, किसके साथ हो?” लड़ाई हुई। मोहित, रूही के पास पुणे पहुंचा, रूही आई पर इस बार सिर्फ 10 मिनट के लिए। कुछ बात नहीं हुई, रूही अनमने मन से आई थी, दिख रहा था। दोनो की समझ में आया रहा था की रिश्ता गड़बड़ा रहा है।
वजह?
दोनो का ही अपने आप से झूट बोलना। और मोहित लौट आया।

28 दिसम्बर

एक और बहस, एक और फ्लाइट रूही के शहर की और … इस बार रूही नहीं आई।
शायद वो भी इस खींचातानी से तंग आ चुकी थी। जीने के लिए आगे बढ चुकी थी, फिर से मरने लगी थी। मोहित दोस्त से आशिक बना और फिर लगभग पति ही बन गया। इन्ही सब से दूर जाने के लिए रूही आगे आयी थी मोहित के पास और फिर वही सब पुराने किस्से और अंदाज़ उसे मोहित से दूर जाने को मजबूर कर रहे थे। रूही को पहेली बने रहना ही पसंद था, उसे सुलझ जाना भाता नहीं था और ना उसे वो लोग भाते थे जो रूही को सुलझाने और समझने की कोशिश करें।
मोहित ग़लती कर बैठा था पहेली को सुलझाने की और पहेली पहले से ज्यादा उलझने लगी थी। इतनी, इतनी ज़्यादा कि शायद अब धागा टूटने वाला था। कच्चा धागा तो पहले ही होता है इकतरफा प्यार, कब टूट जाए, किस बात पर टूट जाए, कौन जाने ?
रूही ने कदम खीचने शुरू कर दिए थे। मोहित ने कम से कम 100 कॉल किये होंगे उस दिन पर रूही उस दिन पत्थर बन चुकी थी। ना जवाब दिया ना मुस्कुराई, मोहित को जवाब मिल चुका था।

पर अभी नया साल आना बाकी था और बाकी थी वो एक काल और वो काल आयी 30 दिसम्बर को …

3 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-2

  1. बहुत सुंदर और भावनात्मक । ऐसा लगा जैसे मोहित की जगह मैं ही हूँ ! अगले पार्ट की प्रतीक्षा रहेगी ।
    करबद्ध प्रणाम । 🙏🙏

  2. भावों का ज्वार सहजता से कोरे कागज पर उकेरना आसान नहीं होता, लेकिन लेखक महोदय पाठक के हृदय में दिलचस्पी बनाये रखने में सफल हुए, जैसे- जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है, हृदय अधीर हो उठता है कि आगे क्या?? 🙏

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