रूही – एक पहेली: भाग-17

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सुबह मोहित सो ही रहा था जब भानु आकर बोल गया कि वो निकल रहा है।
“मुंबई आ जा जल्दी ठीक हो कर वहीं मिलते है, बोलता हुआ निकल गया”
बाहर टैक्सी इंतज़ार कर रही थी, राधा और दीपाली भानु के जाने के बाद वहीं बरामदे में बैठ कर गपशप मारने लगी। मोहित की फिर आँख लग गयी । आठ बजे के करीब मोहित की आँख खुली, देखा राधा करीब खड़ी थी।
“आपको उठाने आई थी, जीजी बुला रही है”
मोहित उठा, मुँह पर पानी के छींटे मारे और तौलिया कंधे पर डाल कर बाहर आ गया। दीपाली बैठी चाय पी रही थी और राधा रामसिंह को शायद कुछ समझा रही थी गार्डन की तरफ इशारा करके।
“छोटी तो थोड़ा बिज़ी है आज,अपन ऐसा करते है थोड़ा तफरी मार के आते हैं, छोटी बता रही है, कोई झील है पास में यहाँ। एक दो घंटे में लौट आयेंगे, जब तक छोटी भी फ्री हो जाएगी और फिर लंच के बाद अगला प्रोग्राम देखते है” दीपाली ने पूरा शेड्यूल बता दिया।

थोड़ी देर में दीपाली तैयार हो कर आगयी, आज दीपाली ड्राइव करने वाली थी, राधा ने उसको रास्ता बताया। घर की चार दीवारी से बाहर निकल के सीधा रास्ता जाता था। एक दो बार दाएँ-बाएँ करने के बाद सीधा रास्ता पनारपानी की तरफ ही जाता था जहाँ पर कुछ झरने थे और एक छोटी सी झील थी। हरियाली पंचमढ़ी की ख़ास बात है, जहाँ नज़र डालो ऐसा लगता है की हरे पेंट से ऊपर वाले ने बेमिसाल चित्रकारी की हुई है। लंबे-लंबे पेड़ आसमान से जैसे शर्त ही लगाये रहते हैं, पहाड़ियों से उतरते समय अगर सीधे हाथ पर गहरी ढाल जा रही होती है तो बाएँ हाथ पर आपका लगेगा कि पेड़ों ने आपके ऊपर एक आसमान बना रखा है कभी-कभी तो यूँ लगता है कि आप हरियाली चांदनी के बीच से गुज़रते हुए एक लंबी सी फिसलपट्टी पर फिसले चले जा रहे हैं।

रामसिंह ने आकर एक बॉक्स और एक फ्लास्क रखा। बॉक्स में सैंडविच हैं आप दोनों के लिए और फ्लास्क में काफी रख दी है। फिर राधा ने मोहित के हाथ में एक नई सिगरेट की डिब्बी थमाई और कहा,
“आपकी वाली में तीन बची है” और मुस्कुरा दी।

ये छोटी-छोटी बातें मोहित को दिन ब दिन मुशिक्ल में डाले जा रही थी । दीपाली ने सीट संभाली और मोहित उसके बाजू में बैठ गया। बाहर निकल कर थोड़ी दूर गये होंगे कि मोहित ने जीप रोकने को कहा।
“वहाँ देख..”
दीपाली ने मुड़ कर देखा तो क्या ही शानदार दृश्य था । सांप की तरह लहराती हुई छोटी-छोटी पगडंडियां, एक छोटा सा गोल सा बगीचा और उस बगीचे के बीचो बीच में एक लम्बा से देवदार का पेड़ और बाजू में एक छोटी सी कॉटेज। मोहित पहाड़ और हरियाली देख कर बहुत खुश हो जाता था। दीपाली ने जीप मोड़ कर उस बगीचे की और मोड़ दी और नीचे पहुँच गयी दस मिनट में।
कॉटेज एक छोटा सा रैनबसेरा सा था जो शायद बारिश में बचने के लिए बनाया हुआ था। एक छोटी सी चाय बिस्किट की दूकान खोली हुई थी। पहाड़ों पर आपको ऐसे छोटी-छोटी चाय की दूकान ढेर सारी मिल जायेंगी, साथ ही आपको मिलेगा उनमें एक छोटा सा ,आपका बिछड़ा हुआ घर । इतना प्यार उड़ेल देते है आपकी चाय में और इतनी मीठा बना देते है आपकी एक उस छोटी सी मुलाकात को कि आप ज़िन्दगी भर उस चाय को भूल नहीं सकते।

पर उस दिन वो घर बंद था, दीपाली और मोहित वहीं बैठ गए और दीपाली ने कॉफ़ी निकाल ली।
मोहित और दीपाली को आज मौका मिला था अकेले में बात चीत करने का। दीपाली को पता था कि मोहित के दिल दिमाग में क्या चल रहा है।
“छोटी के बारे में पूछना है ना?” दीपाली बोली
“हाँ”, मोहित मुस्कुराया।
“हम्म्म्म” कॉफ़ी हाथ में उठाई और बोली,
“ये भी तेरे जैसी दीवानी है रे मोहित, किस्मत की मारी, जैसे तैसे अपने को सम्भाल पायी थी कि तू मिल गया ।तू मिला तो मिला, उसके बाद रूही दिख गयी ।जिस दिन से छोटी ने रूही को पढ़ी है, वो वो न रही”

मोहित सुन रहा था।
“बताया था ना अंकल पापा के दोस्त थे, ये जब पाँचवी क्लास में थी तभी रीति रिवाज़ के चलते शादी तय कर दी गयी थी और दसवीं में आई तो शादी हो गयी इसकी। तब तक इसने अपने पति की शक्ल भी नहीं देखी थी पर संस्कार ऐसे थे कि दिल दिमाग सब अपने उस पति को दे चुकी थी जिसके बारे में कुछ नहीं जानती थी। जब इंटर किया तब उसका पति उस से पहली बार मिलने आया था, मुझे फ़ोन करके खूब रोई थी, बहुत खुश थी, कहती थी, जीजी, सपनो का राजकुमार मिल गया मुझे, जैसा मैंने सोचा था ये तो उस से भी ज़्यादा अच्छे है। फिर मिलना शुरू हो गया, तय ये हुआ था कि इंटर के रिजल्ट के बाद गौना हो जाएगा”

“रिजल्ट आया, गौना हुआ और छोटी अपने नए घर चली गयी। बड़ा पूरा घर था, पुराने ठाकुर थे उसके ससुराल वाले, अंकल के पुराने बचपन के दोस्त और रिश्ता तभी बचपन में तय कर दिया गया था। शुरू के एक हफ्ते छोटी के ज़िंदगी के सबसे सुहाने दिन थे, रोज़ दो-दो घंटे फ़ोन करके बताया करती थी,
“जीजी ये, जीजी वो, ऐसा-वैसा, सब…”
“आज मैं मूवी गयी, आज बाहर खाना खाने गयी”
“ये मुझे बहुत प्यार करते हैं”
“इन्होने मुझे पहली रात को अंगूठी दी”
“ये…. वो……….” दीपाली रुकी ,बोली, “वापिस चलते है, अगर पूरा किस्सा सुनाने बैठ गयी तो रात यहीं हो जाएगी”
मोहित कुछ नहीं बोला उठा और जीप में बैठ गया। दीपाली फिर शुरू हुई,
“हफ्ते भर तो सब ठीक रहा, फिर एक दिन छोटी का फ़ोन आया। बहुत रो रही थी। फफक-फफक के रो रही थी।
“जीजी ये बहुत गंदे है”

“इन्होने आज मेंरे साथ खाना नहीं खाया और बाहर से शराब भी पीकर आएं हैं”

“फिर तो रोज़ का बेचारी का रोना शुरू हो गया। बच्ची ही तो थी उस समय, कहाँ समझ होती है उस उम्र में नए रिश्तों को समझने की”

दीपाली ने ऊपर आकर फिर गाड़ी रोकी, मोहित ने फिर एक बार नीचे घाटी में देखा। वो सांप जो नीचे जाते हुए दिख रहे थे, अजगर बने हुए अब उसकी तरफ आते लग रहे थे।

“उस दिन जब तीन तक छोटी का फ़ोन नहीं आया तो मैंने फ़ोन किया, पता चला अस्पताल में थी और फिसल कर गिर पड़ी थी। यकीन नहीं हुआ, मैं मिलने गयी तो पहले उसकी ससुराल वालों बहुत ने टालने की कोशिश की पर ज़्यादा ज़िद करने पर मिलने दिया। अस्पताल में जब मिली तो उसके चेहरे पर काले निशान देख कर समझ आ गया था कि ये कैसा फिसलना था। छोटी गले लग लग के बहुत रोई मोहित उस दिन। बेचारी बच्ची , नरक निगलने लगा था उसे”

“दीपाली, घर चलते है , आगे जाने का मन नहीं” माहौल उदास सा हो रहा था अचानक से। दीपाली समझ गयी, मोहित ने इशारा किया, दीपाली उतरी और मोहित ने जीप सम्भाल ली। जीप मोड़ ली उसने फिर उन्ही पगडंडियों से , राधा की तरफ …

ये रास्ता सीधे राधा की तरफ जाता था, ना दाएँ , ना बाएँ।

वो घाटी पीछे रह गयी थी, उस गोल बगीचे में खड़ा एकलौता देवदार का पेड़ अब हवाओं के न चलने से शांत था। कॉटेज दिखना बंद हो गयी थी। मोहित सब कुछ पीछे छोड़ कर उस रास्ते पर जा रहा था जहाँ राधा रहती थी।

“फिर क्या हुआ दीपाली?”
“अभी तो और भी बुरा होना था, मुझे बेहद गुस्सा चढ़ा, छोटी से पूछा कि सास ससुर क्या कर रहे हैं, तो छोटी ने मेंरे दोनों हाथ पकड़ कर कहा जाने दीजिये, उनसे गलती हो गयी है, उन्होंने माफ़ी माँग ली है और अब नहीं करेंगे। मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर चुपचाप चली आई। हफ्ते चार दिन बात नहीं हुई, फिर खबर आई कि उसका पति जॉब के लिए कनाडा चला गया।“ दीपाली शांत हो गयी दोबारा।

“क्या हुआ फिर दीपाली?”

वो जो गया तो गया मोहित, फिर नहीं लौटा”
“क्या?” एक झटके से गाड़ी रोक दी मोहित ने।

“ये क्या कह रही हो?”
“हाँ मोहित, दो साल तक इंतज़ार करती रही छोटी और फिर जिस दिन खबर आई कि उसने वहाँ एक गोरी से शादी कर ली है, छोटी ने चुपचाप सामान लिया और अपने घर लौट आई”

मोहित की आँखों के सामने राधा का भोला मासूम चेहरा घूम गया, हँसता हुआ, खिलखिलाता हुआ।
इतना दर्द अंदर और किसी ज़माने को ख़बर नहीं। वो तसल्ली उसके चेहरे पर उस दर्द की थी जिसके बाद सारे दर्द बेमानी हो जाते थे। सही तो कहा है किसी ने, मोहब्बत से बेहतर तजुर्बा कोई और नहीं और बेवफा से बड़ा कोई उस्ताद नहीं। एक लम्हे में आप सारी दुनियादारी सीख जाते हैं।
दीपाली की आँखें भरी हुई थी। मोहित सदमें में था,कैसे ऊपर वाला हर अच्छे लोगों को खिलौना बना लेता है ।
“छोटी को न बताना कि मैंने तुझे कुछ बताया है”, दीपाली ने रुमाल से आँखें पोंछते हुए कहा।
जीप ड्राइव वे में दाखिल हुई, तब तक मोहित संभल चुका था । राधा बाहर ही थी, बोली
“अरे, जीजी इत्ती जल्दी आ गए”
हाँ” बस एक चक्कर लगा के आगये, झील तक नहीं गए”
“चलो, कोई ना, घर पर ही बैठेंगे”
मोहित राधा से नज़रें नहीं मिला पा रहा था, राधा भांप गयी, पास आई, पूछा,
“क्या हुआ, तबीयत ठीक नहीं लग रही?”
मोहित कुछ नहीं बोला, हल्के से मुस्कुराया और उठ कर अंदर चला गया। बाहर राधा और दीपाली बैठे थे । बाहर से ज़ोर ज़ोर से खिलखिलाने की आवाज़ें आ रही थी। मोहित को नहीं समझ आया कि क्या लड़की है ये राधा? कोई ग़म नहीं, कोई परेशान नहीं और एक वो है जो एक “ज़रा” सी बात का अफ़साना बना के बैठ गया। नहीं, अब नहीं। शाम को फिर बैठक जमी। भानु की कमी खल रही थी दीपाली को भी और मोहित को भी । दूसरे दिन दीपाली को जाना था, महफ़िल जल्दी उठ गयी। सुबह दीपाली जाने से पहले मोहित के कमरे में आई,
“सुधर के आइयो मुंबई, जब तक रहना है यहाँ रह, पर अब मुंबई आये तो रूही को साथ नहीं लाना”
मोहित मुस्कुराया, दीपाली को टैक्सी में बिठाया और हाथ पकड़ आकर बोला,
“वादा”
दुबारा सो कर उठा, बाहर आया। लॉन के कोने में फिर आज वही टेबल, छतरी और एक कुर्सी लगी हुई थी। राधा आई ,
“बहुत दिन हुए न रूही से बिछड़े हुए? ये लीजिए”

डायरी मोहित के हाथ में थमाई और अंदर चली गयी। मोहित ने डायरी कुर्सी पर जा कर खोली तो गजरा सूख कर बिखर कर कहीं ग़ुम हो चुका था। बुकमार्क में एक ताज़े गुलाब की कली झाँक रही थी ।

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-17

  1. “सही तो कहा है किसी ने, मोहब्बत से बेहतर तजुर्बा कोई और नहीं और बेवफा से बड़ा कोई उस्ताद नहीं। एक लम्हे में आप सारी दुनियादारी सीख जाते हैं।”
    ऐसा निजी अनुभव तो नहीं है लेकिन बहुत करीब से देखा है दूसरे लोगों को इससे गुजरते हुए…

    “मोहित ने डायरी कुर्सी पर जा कर खोली तो गजरा सूख कर बिखर कर कहीं ग़ुम हो चुका था। बुकमार्क में एक ताज़े गुलाब की कली झाँक रही थी ।”
    कम शब्दों में ही रूही व राधा दोनों के भाव व्यक्त कर दिए सूखे गजरा व कली के माध्यम से… आपकी यही कला मन मोहे हुए हैं…
    अगले भाग का इंतजार रहेगा… 🥰

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