रूही – एक पहेली: भाग-16

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गतांक से आगे

शाम को जब मोहित की आँख खुली तो कमरे में अकेला था ।नज़र पड़ी तो राधा कमरे से बाहर जा रही थी। खिड़की के परदे खोलने आई थी शायद क्यूंकि वो तो बंद करके सोया था।
एक बात नोटिस की थी मोहित ने कि राधा जब अकेले में होती थी तो न तो ज़्यादा सामने पड़ने की कोशिश करती थी और न ज़्यादा बोलने की। इतने दिनों में कभी भी नज़रें मिलाकर बात नहीं करती थी,
जब भी नज़रें कभी मिली तो एक दम से नज़रें चुरा लेती थी।
क्या चोर था राधा के दिल में ?
मोहित ने सर को झटका दिया और उठ गया। भानु, राम सिंह को कुछ समझा रहा था, दीपाली राधा के साथ किचन गार्डन में कुछ देख रही थी।
“उठ गया हीरो?” भानु उसे देख कर बोला।
दीपाली और राधा ने पीछे मुड़कर देखा ,मोहित ने सिगरेट जलाई तो दीपाली ने इशारे में मांगी, मोहित ने मना कर दिया। दीपाली ने मुँह बनाया ,राधा मुस्कुराई ,भानु ने अनदेखा कर दिया।
“चाय काफी कुछ”? दीपाली ने पूछा।
“नहीं” भानु और मोहित दोनों के साथ बोले और फिर हँस दिए।

लग ही नहीं रहा था कि मोहित इतने दिनों के तूफ़ान झेल कर आया है। भानु के साथ भर होने से अपनी ज़िन्दगी को पूरी समझने लगता था।
कैसा रिश्ता था दोनों का? दोनों ही अपनी दोस्ती को अपनी छाती पर एक तमगे की तरह टांग कर चलते थे। किसी जीत की निशानी की तरह ,चेहरा पर ढेर सारी तसल्ली और छाती चौड़ी। बस यही था वो रिश्ता जिसे लोग शायद दोस्ती ही कहते होंगे।

अँधेरा नहीं हुआ था और बारिश का आज कोई आसार नहीं था, राम सिंह ने ऐसी भविष्यवाणी कर दी थी जो कि अब मौसम विभाग भी नहीं बदल सकता था। राम सिंह ने सारी तैयारी करके रखी हुई थी।
ग्रिल बीच लॉन में लगी हुई थी ,आइस बॉक्स तैयार था, चार कुर्सियां और चार छोटी-छोटी साइड टेबल्स कुर्सियों के बाजू में थी। उन पर एक-एक गिलास, कुछ नेपकिन रखे हुए थे और बीच में एक गोल मेज रखी था। कुछ काजू, भुनी हुई मुंगफली और छोटे-छोटे महीन कटे हुए खीरे, टमाटर, प्याज, अनन्नास के टुकड़े एक प्लेट में रखे थे।

“हाँ भाई शुरू करें”
ऐसे जैसे कोई एयरलाइन्स कि फ्लाइट टेक ऑफ करने वाली हो।
मोहित ने पूछा, “बेल्ट बाँध ली सबने?” सब खिलखिला पड़े
एक वोडका की बोतल, एक सिंगल माल्ट की बोतल , एक रेड वाइन और लिम्का की बोतल टेबल नीचे से झाँक रही थी। मोहित ने अपने और भानु के गिलास में स्कॉच डाली, दीपाली के गिलास में वोडका और लिम्का डाली।
तभी राधा आ गयी, बोली ,“लाइए मैं करती हूँ”
मोहित ने गिलास में आइस डाल कर भानु को दिया और खुद कुर्सी पर पालथी मार के बैठ गया।
भानु ने चुस्की ली एक, मुँह बनाया, बोला, तेरी छूट गयी होगी बे, मैं अभी भी प्रैक्टिस में हूँ,और डाल थोड़ी। राधा फिर उठी, भानु से पूछ कर गिलास में थोड़ी और स्कॉच डाली । दीपाली ने तीन घूँट में गिलास खाली किया और बोली,
“राधा, थोड़ा सूनासूना सा नहीं लग रहा?”
“कुछ म्यूजिक लगा ना” राधा अंदर चली गयी इंतज़ाम करने । पाँच मिनट में एक छोटा सा स्पीकर ले आई, शायद मार्शल का था। भानु बोला, कैसे चलेगा ये?
“वाई-फाई से या ब्लू टूथ से”, झट जवाब आया।

शाम से रात अब एक दम से हो गयी थी। पहाड़ों का यही मज़ा है ,कब दिन, कब रात, कब बादल, कब सूरज और कब चाँद ,कुछ पता नहीं। यहाँ सिर्फ ऊपर वाले की मर्ज़ी चलती है । रामसिंह ने कहा तो था कि आसमान खुला रहेगा पर लगता था किचाँद हड़ताल पर था, नाराज़ ही होगा अपने महबूब से और दूर-दूर तक कहीं आने की उम्मीद नहीं थी आज उसके। चाँद के शागिर्द ज़रूर यहाँ वहाँ टहलते हुए दिखाई दे जाते थे।

गौर किया है कभी आपने कि प्रेमी को चाँद पसंद होता है और प्रेमिकाओं को टूटता हुआ तारा। लगा लीजिये अंदाजा अब आप कि, दिल इतने क्यों तोड़े जाते हैं प्रेमियों के। एक मिनट नहीं लगाती वो किसी दिल को तोड़ने में क्योंकि शायद उनके लिए तो हर धड़कती शै ही दिल होती होगी। काश वो जान पाती कि उस कमबख्त धड़कती शै को दिल बनाने में बरसों लग जाते है।

भानु आया, उसने दूसरा पेग अपना और मोहित के लिए बनाया, तब तक दीपाली ने भी अपना बना लिया और बैठ गयी। राधा ने अपने मोबाइल से सज्जाद अली की कोई ग़ज़ल लगा दी थी।
“तुम नाराज़ हो”
मोहित पहली बार सुन रहा था। राधा की और देखा तो चुप सी बैठी थी,शायद उसे समझ आ गया था कि मोहित नाराज़ है। मोहित बहुत ध्यान से ग़ज़ल सुन रहा था । दीपाली अपने में मस्त थी, भानु ग्रिल पर मुर्गे कि टांग तोड़ रहा था। और फिर राधा का वो एक टपकता आँसू मोहित को ग्रिल की हलकी सी आंच में भी दिख गया। उठा, राधा के पास गया ,नेपकिन दिया और बोला,
“नहीं हूँ अब”
राधा के लिए इतना ही बहुत था।

तभी भानु के खांसने की आवाज़ सुनाई दी। देखा भानु और दीपाली साथ खड़े मोहित और राधा को ही ताक रहे थे । मोहित इस बार नहीं झेंपा और मुस्कुरा दिया। एक घंटे बाद भानु की फरमाइश हुई कि एक गाना लगाओ राधा।
“कहाँ तक मन के अँधेरे” ऐसा करके कोई गाना था किशोर का। गाना लगा, पूरा सुना और फिर दीपाली को गई रात फिर याद आ गयी । चार-चार पेग हो चुके थे जब तक सभी के। फिर शुरू हो गयी, दीपाली “मीना”कुमारी।
“हाँ जी भानु बाबू, आप ने बताया नहीं कि मेंरे में क्या देखा था”
भानु ने अपने सर पर हाथ मारा, बोला फिर शुरू और ये बात दीपाली के कान में पहुँच गयी।
अब असली वाली मीना कुमारी बन गयी थी वो । धीरे-धीरे आँसू बहने शुरू हुए और साथ में डायलॉग भी।
“कोई मजबूरी थोड़े ही थी”
“न करते शादी”
“तुम्हारे पीछे तो बहुत पड़ी थी”
“लगता मैं ही ज़बरदस्ती कर के पीछे पड़ गयी”
हर एक डॉयलॉग के बाद रोने का वॉल्यूम और तेज़। राधा घबरा गयी, मोहित ने इशारा किया शांत रहो
उसने पहले भी देखा था दीपाली को मीना कुमारी बनते हुए । जब दीपाली का रोना नहीं रुका, तो भानु को लगा कि शायद इस बार सीरियस है दीपाली। उसने एक बड़ा सा पेग बनाया, एक साँस में खाली किया और खड़ा हुआ।

“इधर आओ जान”
मोहित ने पोजीशन बदली, आज कुछ नया सा होने वाला था।
“सुनो, मैंडम जान”
अब तो दीपाली की चौंकने की बारी थी, ये तो कुछ पुराना सा था। मुँह ऊपर उठाया, राधा पास आई, नेपकिन दिया, दीपाली ने आँखें साफ़ कर डाली।
“सुनो मैंडम जान, आज कुछ कह रहा हूँ, बार-बार नहीं पूछना, तुम्हारे सारे सवालों के जवाब एक साथ दे रहा हूँ”
अब दीपाली मुस्कुराई।
भानु ने बोलना शुरू किया,
“तुम्हे पता है ना जान कि तुम मुझे तितली सी जैसे चंचल लगती थी”
“इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा”
“मेंरे ख्वाबों की मुक़म्मल तस्वीर लगी तुम”
“बस इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा”
“तुम्हारा ये चुलबुलापन मेंरे दिल को बेहद भा गया था”
“जान, इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा”
“दिन भरकी बक-बक करना दिल को भाने लगा था”
“जान….. इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा”
“तुम्हारा खिलखिला के हँसना मुझे ज़िंदा कर जाता था”
“इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा”
“तुम्हारी सूरत पर एक जो बच्चों जैसे निश्चलता थी”
“बस इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा”
और एक आखिर बात, तुम मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत और सबसे प्यारी लड़की लगती थी इसलिए तुमसे प्यार कर बैठा जान”

मोहित की ऑंखें फटी की फटी रह गयी। उसने एक गिलास तुरंत बनाया, खींचा और फिर आँखें मली, भानु के पास आया, उसको हिलाया।
“भाई तू ठीक है? क्या अनापशनाप बोले चला जा रहा है?
भानु मुस्कुराया, दीपाली के पास गया, उसके पैरों के पास जा के बैठा, उसके हाथ दोनों हाथ में लिए, अपने कंधे पर रखे फिर अपने दोनों हाथों से उसके गालो को पकड़ कर बोला,
“अब ज़िंदगी भर के लिए सारे गुनाह माफ़ न मैंडम जान?
दीपाली ने बड़ी लम्बी वाली एक पप्पी दे मारी भानु के गाल पर। चारों तरफ खुशियां उस रात बरस रही थी। शायद सब फिर से ठीक होने वाला था। दीपाली बहुत खुश थी इसलिए भानु का खुश होना लाज़िमी था। मोहित उन दोनों को देख कर बहुत खुश था। और राधा के लिए इस से बड़ी ख़ुशी और क्या हो सकती थी कि अब मोहित की ख़ुशी उसके चहेरे पर दिख रही थी।

भानु ने दीपाली को उठाया, अपनी बाँहों में थामा और अंदर की ओर चल दिया। वहाँ रह गए थे सिर्फ राधा और मोहित और रह गया था खुला हुआ आसमान ढेर सारे तारों के साथ। सामने की झाड़ियों से फूल चमकते हुए दिख रहे थे। बादलों में लुका-छूपी फिर चलने लगी अचानक और दूर ड्राइव वे से झांकता हुआ चाँद ऐसे लग रहा था जैसे पैदल चल कर, तारे अपनी जेब में रख कर चला आ रहा हो।
चाँद ने भी इतना प्यार बरसते हुए देख कर आज अपनी हड़ताल कैंसिल कर दी थी ।तभी चाँद के बाजू से एक तारा टूट कर गिरा और राधा ने एक दम से अपनी आँखें बंद कर ली।
क्या माँगा था फिर से राधा ने ?
या फिर टूटते हुए तारे ने किसी एक धड़कती हुई शै को दिल बना दिया था।
चाँद , टूटते हुए तारे , बिना कुछ कहते हुए बहुत कुछ बयाँ करते हुए अपना सफ़र तय किये जा रहे थे।

क्रमश: …

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-16

  1. “चाँद ने भी इतना प्यार बरसते हुए देख कर आज अपनी हड़ताल कैंसिल कर दी थी ।तभी चाँद के बाजू से एक तारा टूट कर गिरा और राधा ने एक दम से अपनी आँखें बंद कर ली।”
    ऐसा लगता है लेखक महोदय ने अपनी यात्राओं के अनुभव का भरपूर प्रयोग करते हुए किरदारों को बड़ी ही रोचक ढंग से इनसे जोड़ दिया है…जो कहानी को जीवंत कर देते हैं…
    अगले भाग के इंतजार में…

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