मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-15

शेयर करें

रास्ते कैसे भी हों टेड़े-मेंढे, उलटे-सीधे, लंबे। अगर आपका हमसफ़र आपका हमनशीं भी है तो तो मंज़िल तक कौन जाना चाहता है। और कुछ रास्ते आपको मंज़िल से दूर ,बहुत दूर ले जाते जाते हैं और आपको मालूम भी नहीं पड़ता। आप चलते जाते हैं, चलते जाते हैं और फिर मंज़िल तक पहुँच के ही जान पाते हैं बस कि…ये कहाँ आ गए हम । ये मंज़िल की तलाश तो थी ही नहीं।
क्या कीजियेगा? लौट के जाना हर किसी के बूते में तो होता नहीं है।
राधा ने जीप रोकी और उतरी, एक फ़ोन किया तो एक यूनिफार्म वाला बन्दा आकर जीप की चाभी ले गया। मोहित समझ गया था कि इंतज़ाम पहले से था। राधा ने बैग उठाया और दोनों को साथ आने को बोला। गलियों से होते जब आगे बड़े तो सामने एक पहाड़ी दिख रही थी और दिख रही थी ढेर सारी सीढ़ियाँ।

कितनी होंगी?
100, 200, 500, 1000??

मोहित वहीं बैठ गया,
“भाई मेंरे बस की नहीं है, मेंरे से नहीं हो पाएगा, कितनी चढाई है यार ये तो, कितनी सीढ़ियाँ हैं?, उसने राधा से पूछा,
“ज़्यादा नहीं है, सिर्फ तेरह सौ के आसपास”

“क्या??????????????? “
दीपाली हंसे जा रही थी। मोहित बाबू, आज तो फंस गए। मोहित बच्चों वाली ज़िद पर उतर आया था,
मैं नहीं जाऊंगा, मैं नहीं जाऊंगा। तुम लोग हो आओ, मैं यहीं इंतज़ार करूँगा नीचे। फिर उसने देखा की राधा का चेहरा रुआंसा हो रहा है तो आखिरकार हथियार डाल दिए।
बोला, “चलो यार”
राधा के चेहरे की रौनक लौट आई फिर से। राधा अपना बैग टाँगे हुई थी। बीच में रुकते रुकते करीब ढाई घंटे में ऊपर पहुंचे। रास्ते में कभी दीपाली आगे निकल जाती थी तो कभी मोहित। मोहित ने कई बार कोशिश की कि राधा से उसके बारे में जाने पर राधा अपने बारे के अलावा सब बताती थी। एक जगह कीर्तन वालों की टोली जा रही थी । सब लोग एक एक त्रिशूल थामें हुए थे और साथ में एक मटकी या कलसिया जैसा कुछ, पानी रहा होगा उसमें। मोहित को याद आ गयी मन्नत वाली बात।
राधा कीर्तन की टोली के साथ हो ली और दीपाली को बोली, जीजी ऊपर मिलेंगे आप लोग आ जाओ आराम से। एक जगह रुक कर दीपाली और मोहित बैठे तो मोहित ने पूछा।
“कौन है ये राधा, दीपाली?”
“तुम्हारी कोई छोटी बहिन भी थी, मुझे बताया नहीं कभी? मैं इसके साथ यहाँ क्या कर रहा हूँ?ये अस्पताल में क्या कर रही थी? प्लीज यार सब एक साथ बताओ डिटेल्स में, मैं बड़ा परेशान हूँ सोच सोच कर”
“किस्मत के फेर है मोहित और कुछ नहीं, इस जैसे पगली लड़की मैंने नहीं देखी आज तक। तुझे तो पता है कि पापा मेंरे काम के सिलसिले में कितना बाहर रहते थे और जब वो महाराष्ट्र में पोस्टिंग पर थे तो उनके एक दोस्त बने थे। कोई ठेकेदार थे, पुश्तैनी ज़मीन जायदाद के मालिक। फिर दोस्ती इतनी बढ़ गयी कि बाद में उनका और हमारा परिवार एक हो गया। ये उन्ही सलूजा साहब की बेटी हैं, 2018 में मुंबई आई थी पीएचडी करने के लिए, तब से हमारे यहाँ रह रही थी। तू तो हॉस्पिटल में था, पर मैं रोज़ दोपहर में एक बार तेरे पास आती थी ।बैठती थी और बस गहरी साँस ले कर चली आती थी” दीपाली ने फिर एक गहरी साँस ली।

गुस्सा भी आया अचानक उसे, “कुत्ते, तूने बहुत रुलाया है हम सब को”
फिर मुस्कुरा दी दीपाली, पर मुझे भरोसा था कि तुझे कुछ नहीं होगा।
मैं तो हस्पताल से आजाती थी, शाम को भानु तेरे साथ ड्रिंक्स लेकर आता था।
“मेंरे साथ” मोहित चौंका
“हाँ तेरे साथ घोंचू”, दीपाली बोली,
“जितने दिन भी तू अस्पताल में रहा एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जिस दिन भानु ने कोई पार्टी अटेंड की हो या कहीं और शराब को हाथ लगाया हो। डॉ नाराज़ हुए अस्पताल में तो डॉ का तबादला करवा दिया,
तुझे तो पता है की भानु और तेरे बीच में कोई आये ये उसे बर्दाश्त ही नहीं । दो ड्रिंक्स लेकर भानु घर आ जाते थे। फिर एक दिन राधा की छुट्टी थी, वो बोली मैं भी चलूंगी आपके साथ। वो आई, उस दिन मैं दिन भर तेरे साथ बैठी थी, तेरा जन्म दिन था ना उस दिन। राधा को उस दिन तेरे और रूही के बारे में सब कुछ बताया, शबाना के बारे में भी बात हुई। कई बार राधा की आँखों में आँसू आये और कई बार मुस्कुराई।
रात को भानु आया था केक लेकर,हम सबने मिलकर केक काटा था, अस्पताल वाले तो वैसे ही पागल हो चुके थे हम सबको इतने दिन से देखदेख कर पर उस दिन सब रो दिए”

दीपाली की आवाज़ भर्रा रही थी … रुकी और फिर शुरू हुई,
“रात को लौटे तो राधा ने पूछा था किजीजी, अगर आप परमिशन दें तो मैं संडे को चली जाया करूँ अस्पताल । हमें क्या प्रॉब्लम थी,वो अब हर संडे को तुम्हारे पास आती थी।
धीरे-धीरे उसने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। तुमको हॉट बाथ देना, कपड़े चेंज करना, साफ़ करना, सब”
मोहित सुने जा रहा था, हाथ पैर ठन्डे हुए जा रहे थे उसके। मंदिर अब ऊपर दिखने लगा था, कुछ एक सीढ़ियाँ रह गयी थी, राधा आगे आगे चली जा रही थी,मोहित उसको दूर से पास आते देख रहा था।

ज्यूँ ज्यूँ दीपाली बोले जा रही थी,राधा और भी बहुत करीब आती जा रही थी।
“फिर एक रात राधा घर आई तो उसकी आँखें लाल हो रखी थी, सूजी हुई थी। मैंने पूछा कि क्या हुआ?
बहुत पूछा कुछ नहीं बोली वो। रात को जब सब सो गए तो मैं धीरे से उसके कमरे में गयी कि शायद अब बात करूँ। कमरे में गयी तो देखा सो रही थी । मुड़ने वाली थी कि साइड टेबल पर तेरी डायरी दिख गयी।

“रूही एक पहेली”

“उसने शायद वो नावेल समझ कर अस्पताल से उठा ली थी और अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल कर चुकी थी। मोहित को पढ़ने की भूल कर चुकी थी, मोहित को जानने की। दीपाली समझ गयी कि तूफ़ान आ गया है, राधा की ज़िंदगी में। लाल आँखें रूही की वजह से थी”

“जीजी, ये देखिये मंदिर” राधा ऊपर खड़ी थी, खिलखिलाती हुई।
मोहित कभी उसे देख रहा था ,कभी महादेव के मंदिर को। क्या अभी और कुछ रह गया था मेरी ज़िंदगी में? मोहित ने आँखें बंद की और महादेव के चरणों की तरफ कदम बढ़ा दिए।

“ओह प्रभु, कहाँ ले आई थी राधा उसे?”
अद्भुत नज़ारा था वहाँ का, एक अलग ही दुनिया थी,चारो तरफ बादल ही बादल, कभी धुंध आ जाती कभी साफ़ हो जाती। घंटो की आवाज़ से, हवन सामग्री की खुशबु से और मंत्रोच्चार से एक अलग ही माहौल बन गया था। एक कोने में ढेर सारे त्रिशूल ज़मीन में गड़े हुए थे, ये त्रिशूलों का जमघट शायद वही था जो श्रद्धालु महादेव के चरणों में अर्पण करने आते थे। लाल या पीला या नारंगी या कुछ मिला जुला सा रंग हो रखा था आसमान का और बीच से सूरज आँख मिचौली खेलने में लगा हुआ था।

राधा मोहित के पास आई, सर पर चुन्नी से ढका और मोहित को बोली आप भी सर पर रुमाल रख लीजिए, अंदर चलना है। मोहित ने कहा मेंरे पास रुमाल नहीं है,
“जेब में देखिये, एक वाइट कलर का है”, राधा मुस्कुराई ,दीपाली भी मुस्कुराई।
मोहित ने हाथ डाला, रुमाल था, मोहित ने सर ढका और दीपाली के साथ मंदिर की और चल पड़ा,
“सुनिए, रुकिए” राधा की आवाज़ आई, “ये ज़रा पकड़ेंगे?”
मोहित मुड़ा, राधा के हाथ में एक त्रिशूल था और पानी का छोटा पीतल का कलसा, लाल रंग से बंधा हुआ ऊपर से।
“ये कब लायी ये पागल लड़की?”

मोहित रुका, दीपाली की और देखा, दीपाली ने इशारा किया तो मोहित ने त्रिशूल ले लिया। उसके तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था,दीपाली पीछे हो गयी, राधा मोहित के बाजू में आगयी और अब मोहित और राधा साथ-साथ थे।
मंदिर पहुंचे तो पुजारी ने देख कर कहा
“आ गयी री बिटिया तू? ,कहे रहे न हम?, बाबा कउनौ को निरास न किये आज तक। बम बम भोले”
कस के जयकारा लगाया पुजारी ने फिर मोहित की तरफ देखा,
“ई हैं मोहित बाबू?”
“हाँ बाबा” पुजारी बाबा ने मोहित के सर पर हाथ फेरा और अंदर आने को बोला।
मोहित अब मशीन बन चुका था । “क्या हो रहा था ये सब? सब मेंरे बारे में जानते है और मैं किसी को भी नहीं? कौन लगती है ये राधा मेरी? क्यों कर रही है इतना सब?”

अंदर गए तो पुजारी ने राधा से कळसा लेकर जलाभिषेक किया, त्रिशूल बाबा के सामने रख कर कुछ मंत्रोच्चार किये, राधा और मोहित का नाम लिया।

राधा मोहित के और करीब आ गई थी। इतना करीब कि अब राधा के हाथ की उँगलियाँ मोहित की कलाई को छू रही थी। उँगलियाँ काँप रहीं थी राधा की । मोहित ने कनखियों से देखा, राधा की आँख बंद थी और कुछ बुदबुदा रही थी। राधा की उँगलियाँ कुछ करना चाह रही थी और फिर मन्त्र ख़त्म होते होते, राधा ने मोहित की सबसे छोटी ऊँगली पकड़ ही ली। पहले धीरे से और फिर इतनी कस के खून ही रुक गया मोहित की उस ऊँगली का। मोहित ने फिर राधा की और देखा,अब राधा शांत थी …..ऊपर से।

जब दोनों बाहर आये, राधा मोहित की शर्ट की आस्तीन का कोना पकड़े हुए थी । फिर उसने, धीरे से मोहित का हाथ पकड़ा और कहा त्रिशूल का वहाँ लगा दीजिये आप। मोहित सिर्फ चुप था। अंदर से नाराज़ बहुत पर माहौल ख़राब नहीं करना चाहता था। दीपाली को समझ आ गया था मोहित का मूड, इशारा किया, शांत रहने को बोला। मोहित ने उन त्रिशूलों के पहाड़ में एक कोने में अपना त्रिशूल लगा दिया और पीछे आ गया। नीचे उतरते हुए ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

माहौल को हल्का करने के लिए दीपाली बोली,
“मुंबई कब आ रहे हो मोहित?”
मोहित कहीं और ग़ुम था ।
फिर पूछा उसने,
“मुंबई कब आ रहे हो मोहित?”
“हैं??”
“अरे भाई, क्या प्रोग्राम का मुंबई का?”
“ओह, मुझे नहीं पता यार”

अचानक मोहित को समझ आ गया कि उसकी वजह से सबका मूड बिगड़ रहा है, ऑंखें बंद की, गहरी साँस ली, आँखे खोली तो मुस्कुरा रहा था।

बस इतना ही वक़्त लगता था मोहित को सब कुछ खत्म होने के बाद फिर से शुरू करने को। दीपाली तो समझ गयी की कुछ ठीक नहीं हुआ पर राधा फिर नार्मल हो गयी थी। फिर शुरू हो गयी वो,
“वो जो दुर्गावती रानी थी ना ….
“उनके साथ एक बार ऐसा हुआ….
“एक बार…
“एक दिन…

किस्से कहानी सुनते कॉटेज पहुंचे तो भानु बाहर बरामदे में बैठा हुआ इंतज़ार कर रहा था। जाते ही बुरा सा मुंह बनाया,
“भूखा मार डालो सब मिलकर मुझ गरीब को” राधा अंदर दौड़ी। दस मिनट में खाना लगा हुआ था।
“फोटो वगैरह?” भानु का सवाल आया
“अभी दिखाती हूँ खाने के बाद”, राधा बोली।
“खाते-खाते रात का प्लान बन गया कि बारबेक्यू लगाते है रात को”
भानु अच्छा कुक था, बोला मैं करवाता हूँ शाम को इंतज़ाम।
रामसिंह को आवाज़ लगायी भानु ने और शाम की तैयारी करवाई। बोला, थोड़ा आराम कर ले फिर मिलते है शाम को।
“फोटो कहाँ हैं?”
मोहित अभी भी शांत था, वो उठा और अंदर चला गया। इस गधे को क्या हुआ, भानु ने पूछा,
थक गए होंगे, पहला दिन था उनका बाहर का।
“होंगे” “उनका” भानु दोहराया और कस के हंसा और राधा फिर झल्लाई।
दीपाली ने भानु को आँख दिखाई,
“फोटो?” भानु ने फिर पूछा , राधा ने कैमरा आगे बढ़ाया।
भानु एक एक करके फोटो देखने लगा। ज़्यादातर फोटो मोहित की ही थी, कैमरा जो राधा का था
सीढ़ी चढ़ते हुए । दीपाली के साथ सीढ़ियों पर बैठ कर बतियाते हुए। कभी आँख बंद कर एक पेड़ से टिका हुआ । फिर एक तस्वीर पर अटक गया, दीपाली ने ली थी वो तस्वीर। मंदिर के बाहर की थी, मोहित आँखें बंद किये हुए,राधा उसकी कमीज की बाँह के आखिरी सिरे के कोने को पकड़े हुए कनखियों से देखते हुए। भानु ने दीपाली को बुलाया, उसे वो तस्वीर दिखाई ।
“क्या होने वाला है अब दीपाली इस मोहित के साथ” दीपाली मुस्कराई, बोली,
“वही जो किस्मत में होगा” फिर जीने लगेगा।

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-15

  1. “ऑंखें बंद की, गहरी साँस ली, आँखे खोली तो मुस्कुरा रहा था।
    बस इतना ही वक़्त लगता था मोहित को सब कुछ खत्म होने के बाद फिर से शुरू करने को। ”
    बड़ा अनोखा किरदार है मोहित आपके कहानी में… शरीर से आहत व्यक्ति के ठीक होने में कोई आश्चर्य नही… लेकिन भावनाओं से जो छलनी कर दिया गया है और स्नेह के तनिक छाँव मात्र से फिर मुस्कुरा दे… ऐसा है मोहित…अगले भाग का इंतजार रहेगा….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *