मंडली

रूही – एक पहेली: भाग-14

शेयर करें

मोहित की आँख सुबह घण्टियों की आवाज़ से खुली, खिड़की से झाँक कर देखा कुछ दिखाई नहीं दिया, सुबह हुई सी थी, रिमझिम सी फिर होने लगी थी, मोहित फिर आकर लेट गया। दीपाली और भानु भी शायद सो रहे थे । सोचा डायरी खोली जाए पर कमरे में अँधेरा था तो आँख बंद कर के पड़ा रहा। कब आँख लग गयी पता नहीं चला । थोड़ी देर में दरवाजे पर खटखटाने की आवाज़ से आँख खुली, दीपाली भी उठ गयी थी। पता नहीं क्या वक़्त हुआ था । राधा की आवाज़ आई, “जीजी, चाय ले आऊं?”

दीपाली उठी और दरवाज़ा खोल का अंदर आ गयी। राधा अंदर आई, “जीजी , चाय बना ले आऊं आपकी?”
“हाँ ले आ”
“अच्छा ऐसा कर बाहर बरामदे में लगा चाय, वहीं आती हूँ, यहाँ जीजू सो रहे है”
दीपाली ने मोहित को उठाया और चाय का इशारा किया,मोहित ने हाँमी भरी और उठ गया।
दस मिनट बाद राधा की फिर आवाज़ आई, “जीजी चाय लगा दी है”

मोहित और दीपाली बाहर आये। कॉटेज के बाहर बरामदे में एक गोल मेज पर एक फ्लास्क में चाय रखी हुई थी। चार बेंत की कुर्सियां राम सिंह लगा गया था। मोहित और दीपाली बैठ गए, राधा वहीँ एक खम्बे से टेक लगा कर खड़ी हो गयी। चाय के साथ कुछ लेंगी जीजी आप, राधा ने पूछा?
“मठरी लायी हूँ घर से वही खोल ले छोटी”
राधा अंदर गयी, मठरी का डब्बा ले आई और साथ में मोहित के लिए सिंकी हुई रोटियां ले आई।
दीपाली ने राधा की और देखा और मुस्कुराई,
“काफी सीख गयी है छोटी तू”
राधा हलके से हँस दी। मोहित समझ गया था कि दीपाली ने ही बताया होगा राधा को मोहित की पसंद और ना पसंद के बारे में।
“क्या प्रोग्राम है आज का जीजी?”
“कुछ ख़ास नहीं”, दीपाली बोली
“कब जाना है आपको?”
“आज शाम का सोच कर आये थे और अब भानु और मोहित जाने”
“एक दिन और रुक जाओ न जीजी आप”
“अच्छा, भानु को उठने दे”
चाय खत्म हुई तो दीपाली ने एक कप और उड़ेल ली चाय। वो हमेशा एक साथ 2 कप ही पीती थी ।
“टाइम कितना हुआ है?”
“आठ बजने को है जीजी”
“आज मौसम ऐसा सा है सो सूरज नहीं दिख रहा आपको वरना आपको तो पता ही है यहाँ तो छः बजे ही रौशनी हो जाती है”
दीपाली ने बात शुरू की, “मोहित तुझे पता है कौन सी जगह है ये?”
“नहीं”
“जिस कॉटेज में हम लोग ठहरे हुए हैं,वो सतपुडा पहाड़ियों के सबसे ऊपर वाला इलाका है”
“धूपगढ़ कहलाता है ये इलाका”
“सुबह जल्दी उठ जाओ तो सूरज को आते हुए देख सकते हो और शाम को जाते हुए, बहुत कम जगह ऐसी होती है जहाँ सूर्योदय और सूर्यास्त साथ देख सको पहाड़ियों पर। राधा के परदादाओं के वक़्त से ये ज़मीन का टुकड़ा इन्ही के पास है और अभी कुछ साल पहले ये छोटा सा कॉटेज बनवाया है।
प्यारा सा है ना?”
मोहित मुस्कुराया,खड़ा हुआ और राधा को बोला,
“शुक्रिया राधा, यहाँ लाने के लिए, ऐसा लगा है कि फिर से ज़िंदा हो गया हूँ”
“हाँ भाई, चाय पार्टी क्या सीन है आज का?” पीछे से भानु की आवाज़ आई। उठ गया था वो भी।
“फिलहाल तो कुछ नहीं है प्रोग्राम सिवाय इसके कि तुम आज वापिस नहीं जा रहे हो”
“अरे यार काम है ज़रूरी”
“कुछ काम वाम नहीं है, यही से निपटाओ और बात खत्म बस”
“जी सर”
भानु का”जी”वर्ल्ड फेमस था, फिर बोला,
“तो फिर क्या करना है आज, दारु खोले?”
“पागल हो गए क्या तुम दोनों”, दीपाली चिल्लाई, “सुबह से दिमाग न ख़राब करो, अभी रात की उतरी नहीं कि फिर से चढ़ा लो”
“शांत रहो आज, कोई दारु वारु नहीं”
“जी” भानु कि आवाज़ आई
“जीजी, एक काम करते है, चौरागढ़ चलते हैं,इनको”शिव मदिर भी ले जाना है”
भानु बोल उठा “इनको” अच्छा जी? ये अब “इनको” हो गए इतनी जल्दी?
“जीजी, देखो जीजू को समझा लो वरना मैंने बात नहीं करनी है कभी इनसे” राधा झल्लाई
“यार न परेशान किया करो बच्ची को”,दीपाली ने भानु को हड़काया
“जी”
प्रोग्राम ये तय हुआ कि मोहित, राधा और दीपाली, चौरागढ़ मंदिर जायेंगे और तब तक भानु अपना काम कॉटेज में बैठ कर निपटायेगा और लंच तक दोबारा मिलेंगे। भानु उठा और अंदर चला गया।
दीपाली ने ट्रे उठाई और रामसिंह को आवाज़ देती हुई अंदर चली गयी।
रह गए राधा और मोहित ।
“चलेंगे न मंदिर आप?”
“कोई ख़ास बात इस मंदिर में?”
“कुछ ख़ास नहीं, बस मन था”
“जाना मेरा ज़रूरी है?”
“अगर आप चलेंगे तो अच्छा लगेगा” राधा उठी और बोलते हुए अंदर चली गयी।
“एक मन्नत मांगी थी”
मोहित की समझ में नहीं आया कि क्या बोले अब वो।
“ठीक है, कब चलना है, मोहित पीछे-पीछे आया।
“नौ बजे तक निकल चलेंगे और दो-तीन बजे तक लौट आयेंगे”
राधा बहुत खुश थी, बहुत खुश।
“जीजी, फटाफट तैयार हो जाओ हम मंदिर चल रहे हैं । रामसिंह, जीजू को आलू के पराठे का नाश्ता लगा देना, साथ में दही दे देना, हम लोगों के लिए कॉफ़ी रख दो बस फ्लास्क में, मैं नहा कर आती हूँ फटाफट।मोहित आप भी नहा लीजिए, प्लीज जल्दी से”

राधा के अंदर का रोबोट फिर जाग गया था , लगता था कोई मन मांगी मुराद पूरी हो गयी थी।

मोहित फटाफट नहा कर निकला, कपड़े निकालना भूल गया था वो , बाहर आया तो एक जीन्स और कुर्ता बेड पर रखा हुआ था । पहन कर बरामदे में आया तो दीपाली बैठी चाय पी रही थी। भानु अपना काम कर रह था लैपटॉप पर । पीछे से गाड़ी की आवाज़ आई और साथ में ड्राइव करती हुई दिखी राधा।
सलवार कुरता पहने थी शायद, गहरे सुर्ख पीले रंग का, बाल खुले हवा में उड़ते हुए। दीपाली ने कॉफ़ी का फ्लास्क उठाया, साथ में एक बास्केट ली और एक बैग रामसिंह ने जीप में रख दिया। दीपाली पीछे बैठने को हुई, मोहित ने आँख दिखाई और दीपाली मुस्कुराती हुई आगे राधा के साथ बैठ गयी।

“ओ भाई लोग, टाइम पर आ जाना पूजापाठ करके”, भानु ने जाते जाते सब को वार्निंग सी दे डाली थी
ड्राइव वे से गाड़ी निकाल कर राधा ले आई, ये रास्ता वो नहीं था जहाँ से मोहित उस दिन आया था। हरियाली बारिश की वजह से और बढ़ गयी थी, सब कुछ धुलाधुला सा लग रहा था, जैसे अभी कोई सारे पेड़ों को और सड़क को धोकर गया है। पहाड़ी इलाको में बारिश के बाद जैसे नई सी ज़िन्दगी सी आ जाती है । सुबहसुबह तो और भी एक अलग सी दुनिया बस जाती है। रात भर जो पखेरू छुपे रहते हैं अपनी जान की बाजी लगाए, सुबह-सुबह अपने ज़िंदा रहने का ऐलान करते हर पेड़ पर उड़ते बैठते, चीखते चिल्लाते दिख जाते हैं । पेड़ों के पत्ते, नहा धोकर जैसे कहीं जाने के लिए तैयार बैठे होते है।
बारिश भले ही बंद हो गयी हो पर अगर आप किसी पेड़ के नीचे से निकले और एक हवा का झोंका आ जाये तो वो बदमाश पत्ते आपको पूरा भिगो कर आपको अपने जैसा बना लेते है ,भीगे भीगे से । उस रास्ते पर ज़्यादा चहल पहल नहीं थी।

“कहाँ जा रहे हैं हम, मोहित ने पूछा?”
”चौरागढ़ फोर्ट चल रहे हैं हम, वहाँ एक शिव मंदिर है, काफी मान्यता है वहाँ की। कहते हैं कि भस्मासुर से बचते-बचते शिव जी वहाँ आये थे और फिर अपना त्रिशूल वहीं छोड़ के चले गए थे और ये जो चौरागढ़ का किला है वो महाराज संग्राम सिंह ने बनवाया था जो गोंडवाना साम्राज्य और महारानी दुर्गावती के वंशज थे। ऐसा कहा जाता है कि अगर आपकी कोई मन्नत पूरी हो जाए तो आपको वहाँ त्रिशूल चढ़ाना पड़ता है और शिव जी को जलाभिषेक करना पड़ता है”

राधा ने पूरी कहानी एक साँस में सुना दी। मोहित सर टिका के बैठा हुआ था, उसकी जब भी निगाह सामने शीशे में जाती, हर बार राधा को अपनी और ताकते हुए देखता और हर बार राधा अपनी चोरी पकड़ जाने पर झेंप जाती थी । रास्ता ऐसा था कि जीप ज़्यादा तेज़ नहीं चला सकते थे। फिर भी राधा की ढेर साड़ी चूड़ियाँ खनके जा रही थीं बार-बार, जब बाल उसके ज़्यादा परेशान करने लगे उसके चेहरे पर आकर तो उसने अपने हाथ से हेयर बैंड उतार कर एक हलकी सी पोनी टेल बना ली। अब बाल नहीं परेशान कर रहे थे, पर अब मोहित का ध्यान पहली बार अच्छे से राधा के चेहरे के ऊपर गया था।
छोटी सी काली बिंदी लगाए हुए थी, काजल कुछ अलग सा लगाया हुआ था। जिस से आँखें कुछ अलग या बड़ी सी लग रही थी, कान में लम्बे से टॉप्स पहने थे या शायद झुमके, पता नहीं क्या थे पर राधा पर फब रहे थे, लिपस्टिक शायद थी या नहीं पता नहीं चल रहा था, बार-बार थोड़ी थोड़ी देर में अपने सीधे हाथ से अपने बालों को कानो के पीछे ले जा रही थी।

हाथ स्टेरिंग व्हील पर एक ही था और धीरे-धीरे उँगलियाँ थपथपा कर ड्राइव कर रही थी, उँगलियाँ बहुत महीन सी और नाखून पतले बड़े हुए जिन पर गुलाबी सी नेलपॉलिश लगी हुई । कुछ पहचानी पहचानी सी क्यों लगती थी वो । उसकी आवाज़ की खनक उसे क्या याद दिला देती थी?

मोहित ने बहुत दिमाग पर शोर डालने की कोशिश की पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा। सर झटक दिया उसने अपना । इस बार राधा ने जब बैक व्यू मिरर में देखा तो इस बार झेंपने की बारी मोहित की थी।
अचानक दीपाली बोली, “छोटी, गाड़ी रोक ज़रा”
राधा ने जीप रोकी और बोली “क्या हुआ?”
मोहित भी हैरान कि क्या हुआ?
“ऐसा करो पहले तुम दोनों अच्छे से एक दूसे को देख लो फिर आगे चलते हैं”
दोनों को काटो तो खून नहीं ।
“मैंने कुछ नहीं किया जीजी, मैं तो चुपचाप गाड़ी चला रही हूँ”
“पता है छोटी मुझे, चलो अब ध्यान से और तुम मोहित बाबू, होशियार रहो, पंगे न लो”
दोबारा से राधा की कमेंट्री चालू हुई,अब उसकी सारी बातें मोहित से ही हो रही थी,दीपाली चुपचाप दोनों को सुन रही थी और मुस्कुरा रही थी।
“अभी तो ज़्यादा गर्मी शुरू नहीं हुई है वरना ये सारे पेड़ फलों से लदे हुए दीखते आपको । यहाँ आम, जामुन और शरीफा बहुत होता है। हमारे बाग़ वाले आम खिलाऊंगी इस बार आपको, हमारे यहाँ के जामुन जैसे कहीं नहीं होते। आपने कभी खिन्नी खायी है? यहाँ की बड़ी मशहूर है पर हर जगह नहीं होती, हमने लगा रखी है अपने बाग़ में, इत्त्त्ति मीठी इत्तनि मीठी की क्या बताऊँ आपको।”

बेतकल्लुफी आने लगी थी मोहित और राधा के बीच,
“पर बाबा, रात को नहीं निकलते हम कभी, यहाँ न रात को सड़क पर कभी-कभी शेर चीते भी दिख जाते हैं”, फिर एक कस के झुरझुरी ली उसने और चूड़ियां फिर खनक गयी।
“जीजी, एक दिन और रुक जाओ न, फिर कल हम बी-फाल्स चलेंगे”
“ये क्या है बी फाल्स”, मोहित ने पूछा।
“अरे भाई, इतना भी नहीं पता?”
“बी माने मधु मक्खी और फाल्स माने झरना, बुध्धू” बुध्धू कहा और फिर खुद शर्मा गयी।
“यानि कि अगर उस झरने को दूर से देखो तो मधु मक्खी के छत्ते जैसा लगता है रे बाबा”
एक घंटा हो गया था ड्राइव करते करते,
“और कितनी देर है छोटी?”
“बस जीजी, थोड़ी देर और”
“अच्छा चल मैं कॉफ़ी पी लूँ”, दीपाली ने कॉफ़ी निकाली, एक कप मोहित को दिया और अपने लिए निकाली । राधा ने मना कर दिया कि ड्राइविंग के बाद। कॉफ़ी खत्म हुई तो दीपाली ने पीछे मुड़ कर इशारा किया।
“हाँ जी, हो जाए एक एक”
मोहित ने सिगरेट की डिब्बी निकाली, लाइटर से एक अपनी जलाई और एक दीपाली की। मिरर में नज़र गयी तो राधा ने बुरा सा मुंह बना कर चिढ़ाया मोहित को। मोहित हँस दिया । दीपाली ने एक सुट्टा लगाया, ढेर सारा धुआं पंचमढ़ी की पहाड़ियों में उड़ाया और एफएम लगा दिया।
“लता और किशोर की आवाज़ में एस डी बर्मन का संगीतबद्ध किया हुआ नगमा अब आपके पेशे खिदमत है”
फिर ढेर सारे नाम लिए गए फरमाइश करने वालों के, फिल्म का नाम है शर्मीली सुन कर राधा चिल्लाई,
“ये तो मेरा फेवरिट है”

1 thought on “रूही – एक पहेली: भाग-14

  1. “बारिश भले ही बंद हो गयी हो पर अगर आप किसी पेड़ के नीचे से निकले और एक हवा का झोंका आ जाये तो वो बदमाश पत्ते आपको पूरा भिगो कर आपको अपने जैसा बना लेते है ,भीगे भीगे से|”
    बड़ी सहज थी यह बात, अधिकांश लोग अनुभव कर चुके होगें इसे लेकिन “भीगे भीगे से” ने इसे जीवंत कर दिया….
    अगले भाग के इंतजार में….

Leave a Reply to श्रवण कुमार पाण्डेय Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *