रूही – एक पहेली: भाग-1

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दोपहर के 2 बजे का वक़्त होगा जब मोहित के मोबाइल पर घंटी बजी थी।
सन 2008, महीना सितम्बर, तारीख़ याद नहीं।
“सर, मैं रूही बोल रही हूँ ।”
“क्या मैं आप से बात कर सकती हूँ?”
वो बातचीत 2 मिनट की थी पर न तो मोहित को पता था और ना रूही को की ये 3 मिनट 38 सेकंड की बातचीत की गूँज बीसियों साल तक सुनाई देने वाली थी।
चलिए अब आप की मुलाकात मोहित से करा देता हूँ। आप भी हो सकते है। मै भी हो सकता हूँ या कोई और भी।
उम्र 33 साल, शादी हुए 11 साल और एक 9 साल का प्यारा सा बेटा।
मोहित रांची का रहने वाला था ,एक छोटा सा परिवार था, माँ थी नहीं, बहन की शादी हो चुकी थी।
नौकरी की शुरुआत एक सेल्समेन के रूप में की थी। पिछले 15 बरस में छोटीमोटी तरक्की होती रही और एक दिन एक एक्सपोर्टर की नज़र उस पर ऐसे हुई कि उसने उसको अपने जयपुर ऑफिस का इंचार्ज बना कर बैठा दिया।
मोहित को वो कॉल उसके मुंबई ऑफिस की कैंटीन में आई थी।

सन 2008, महीना सितम्बर, तारीख याद नहीं।

और रूही???????
उम्र 25 साल, शादी हुए 1 साल, पति का एक्सपोर्ट का काम।
और 3 मिनट 38 सेकंड की ये काल मोहित को रूही ने अपने एक दूर के कज़िन के किसी ट्रांसफर के लिए किया था, मालूम पड़ा था कि मोहित कुछ कर सकता है सो फट से रूही ने कॉल कर लिया था।
दुसरे के फट्टे को अपना फट्टा समझने वाली रूही और दूसरों के फट्टे को अपना फट्टा बना लेने वाला मोहित।
सितंबर की उमस से दिसम्बर की कुनमुनी सर्दी तक आते-आते रूही मोहित की करीब दर्जन भर बात हुई होगी बस। काम के अलावा हलकी-फुलकी अपनी-तुपनी बात भी। सर से आगे बढ़ते-बढ़ते सिर्फ आप तक मामला सिमट आया था उस उमस से सर्दी तक।

31 दिसम्बर, 2008, मोहित ने फ़ोन कर ही दिया रात को।
“नया साल मुबारक़ हो रूही”

रूही ने कहा, “मैं आपके बारे में ही सोच रही थी कि कॉल करूँ या नहीं”
उस रात को पहली बार मोहित ने अपनी बात की और रूही ने अपनी बात और कब सुबह हो गयी बात करते करते दोनो को पता नहीं चला।

1 जनवरी, 2009
मोबाइल की टेक्नोलोजी ने अपना काम दिखाना शुरू कर दिया था। उस दिन रूही और मोहित ने दिन में एक दूसरे को 13 मेसेज भेजे।

और हाँ,आपको मोहित के बारे में बताना तो भूल ही गया मैं। एक खूबसूरत बीबी, बेहद हसीं, मोहित से बेहद प्यार करने वाली, शबाना नाम था उसका। पहली नज़र का जो प्यार होता है शायद दोनो ने वही सोच कर शादी की थी, घर, समाज, माँ, बाप, सबके खिलाफ जाकर।

फरवरी की कोई सुबह

तारीख़ का क्या करियेगा पर कभी कभी कुछ तारीखें आपकी ज़िन्दगी का रुख़ बदल का चुपचाप चली जाती है। फिर आप ताज़िन्दगी उन तारीखों के साये में जीते रहते हैं। तारीखें आती है, पन्ने बदलते हैं डायरियों के,कैलेंडर के, साथ ही आप भी बदलने लगते हैं। और नहीं बदलते तो बस वो लम्हे, जो आपने उन तारीखों में जीये थे।

सुबह होने में कुछ 5 या 6 घंटे बाकी थे, मोहित के मोबाइल में रिंग हुई।
Received 1 mms
रात के 12 बजे कौन mms भेज सकता है, मोहित ने सोचा।
मोबाइल चेक किया।
hi,
this is your Roohi 🙂
रूही ने अपनी पहली बार अपनी फोटो भेजी थी और वो मुलाकात थी मोहित की रूही से।
मोहित ने फोटो देखी और बस। तीर चल चुके थे, शुरुआत हो चुकी थी। बात जो एक आवाज़ से शुरू हुई थी, आँखों से होते हुए दिल पर असर करने लगी थी। मोहित को हर सुबह इंतज़ार रहता था उस गुडमोर्निंग टेक्स्ट का जो कभी आता था और कभी नहीं।

और शबाना??
वो 4 साल पहले ही मोहित की ज़िन्दगी से जा चुकी थी। शबाना ने मोहित को ये एहसास करा दिया था कि वो शबाना के लिए एक वो खिलौना था जो घर में रहना चाहिए भले ही आप उस से खेले या न खेले, पर होना चाहिए। गुज़रते वक़्त ने मोहित और शबाना के बीच एक ऐसी ख़ामोशी ला दी थी जिसकी गूँज मोहित और शबाना हर रात अपने अपने बेडरूम्स में अकेले सुना करते थे। शबाना टीवी देखते देखते सो जाती और मोहित अपनी स्टडी में। शबाना ने शादी की पहली ही रात मोहित को एहसास करा दिया था कि शबाना से जिंदगी की सबसे बड़ी भूल हो गयी थी मोहित से शादी करके। उस रात शबाना बात तो मोहित से कर रही थी पर कम से कम 4 बार उसके मुँह से नाम अमित का निकला था।

जिस रात को मोहित और शबाना को नज़दीक आना था उस रात को मोहित हमेशा के लिए शबाना से दूर चला गया।
जिस मोहब्बत पर मोहित को बड़ा गुमान था उसने उसे ऐसी चोट पहुंचाई थी कि प्यार, इश्क, मोहब्बत सब बकवास लगने लगा था। मोहित की ज़िन्दगी ऑफिस और क्लब के बीच में बंट गयी थी। सुबह 9 से रात 8 बजे तक ऑफिस और फिर 9 से 12, 1,2 जैसा मन हो दोस्तों के साथ क्लब में। घर सिर्फ कपड़े बदलने और बेटे को सुबह तैयार करके स्कूल भेजने के लिए मोहित आता था।अब उसका असली घर उसका ऑफिस था पर मौसम की रुतें अपनी पोशाकें बदल रही थी। रूही एक ठंडी हवा के झोंके की तरह मोहित की ज़िन्दगी में आ चुकी थी। रूही के अब टेक्स्ट नहीं आते थे, उसकी काल्स आती थी।
“तुमने नाश्ता किया?”
“लंच किया?”
“कहाँ हो?”
“घर कब जाओगे?”
“इतनी देर तक ऑफिस में क्या कर रहे हो?”
“घर पर बीबी बच्चे है ना?”
“फिर घर क्यों नहीं जाते हो?”
और मोहित सब जवाब देता था और सारे जवाब झूठे होते थे।

26th September 2009

सुबह से ही रूही के मोबाइल की घंटी बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी और फिर 10 बजे पहला गुलदस्ता आया, फिर 11 बजे, फिर 12 बजे और फिर ये सिलसिला शाम तक चलता रहा। पूरे 16 गुलदस्ते आये थे और सारे फूल अलग-अलग थे। रूही के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था क्योंकि उनमें से कुछ सहेलियों को तो वो जानती भी नहीं थी और फिर शाम को एक कॉल आई।
“हैप्पी एनीवर्सरी रूही,उम्मीद है कि, आपको फूल अच्छे लगे होंगे। आप जितने खूबसूरत तो नहीं है पर आप उनको चूम लेंगी तो उनकी महक और बढ़ जायगी”
रूही की आँखें खुली की खुली रह गयी,मोहित बोल रहा था। मोहित उसके शहर आया था। मोहित का मन था कि रूही से मिल ले,रूही का बहुत मन हुआ कि मोहित से मिल ले। पर जो आग लगनी थी वो अभी शायद लग नहीं पाई थी पूरी तरह से।
रूही की आँखें नम हो गयी,आवाज़ कंपकंपा गयी।
“कहाँ हो आप”
“होटल रेडीयंट”
“कब आये आप?”
“कल रात”
“बताया क्यों नहीं आपने?”
“आपको डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था”
“कुछ काम था यहाँ आपको?”
“हाँ,आपको फ्लावर्स भेजने थे और विश करना था”
रूही के सामने एक सन्नाटा सा छा गया।
“कब जाना है आपको?” पूछा उसने
“बस निकल रहा हूँ” आँखें मोहित की नम क्यों थी और कब 2 बूँद टपक गयी आँखों से मोहित को पता ही नहीं चला। उन आँखों को जो बरसों पहले रेत का सागर बन गयी हो, उनमें से पहली बूँद का गिरना बूँद को झुलसा देता है। कुछ देर ख़ामोशी सी छाई रही और फिर मोहित ने फ़ोन काट दिया। एक टेक्स्ट किया,
“फिर आऊंगा रूही,किसी और दिन”
बोर्डिंग के समय मोहित को टेक्स्ट आया,
“आपने मेरा दिन आज का बहुत स्पेशल बना दिया, जल्दी आइएगा”
मोहित रिप्लाई करता इस से पहले एयर होस्टेस ने आकर इशारा किया मोबाइल ऑफ कर दीजिये। मोहित जयपुर पहुंचा, सेल की बैटरी ख़तम हो चुकी थी। सोचा घर जा कर चार्ज करूँगा,टैक्सी मे बैठा और घर की तरफ निकल गया।
मोहित घर नहीं पहुँच पाया, रास्ते में टैक्सी का एक्सिडेंट हो गया और वहां रूही मोहित का इंतज़ार करती रही। रात को मोबाइल चेक किया, बार बार चेक किया, टेक्स्ट भेजे, कुछ जवाब नहीं आया।
एक दिन, दो दिन, तीन दिन, दिन गुज़रते गए। मोहित की आँख घर पर खुली तो तीन दिन बीत चुके थे। 2 दिन हॉस्पिटल में रखने के बाद उसको घर पर शिफ्ट कर दिया गया था। मोहित ने बिस्तर से उठने की कोशिश की तो जैसे किसी ने जान ही निकल दी उसकी। सर दर्द के मारे फटा जा रहा था। शबाना को आवाज़ दी उसने,जवाब नहीं आया। फिर आवाज़ लगायी, जवाब नहीं आया। हाँ, शबाना के कमरे से टीवी की आवाज़ और तेज़ आनी शुरू हो गयी थी। मोहित ने इंद्र को आवाज़ लगायी, वो भी शायद स्कूल चला गया था। मोबाइल तलाशा, इधर उधर, नहीं दिखा। प्यास के मारे गला सूखा जा रहा था मोहित का।
फिर शबाना को आवाज़ लगायी, और आखिर खुद उठ ही गया, उठा और फिर गिर गया।
“पप्पा,पप्प्पा, क्या हो गया?”

इंद्र की हलकी हलकी आवाज़ मोहित के कानो में पड़ी।
मोहित मुस्कुराया और बोला,
“कुछ नहीं”
इंद्र ने सहारा देकर मोहित को उसके बिस्तर तक पहुँचाया, पानी दिया और पैरो के पास आकर बैठ गया।
“माँ कहाँ है इंद्र?”
“अपने रूम में पप्पा”
“बुलाओ”
इंद्र गया और लौट आया,
“माँ का मूड नहीं है आपसे बात करने का”
“मेरा मोबाइल कहाँ है इंद्र?” इंद्र ले कर आया
मोहित ने इंद्र का सहारा लिया, बाहर बालकनी में आया, सिगरेट जलाई और कॉल लगा दी।
“हेलो रूही”
“कहाँ हो तुम???????
“कोई खबर नहीं, ऐसे क्या कह दिया मैंने??”
“ऐसे कोई करता है क्या? नाराज़ क्यों हो गए तुम??”
बोलते बोलते गला भरआया था रूही का और मोहित ”आप” से ”तुम” हो चुका था।
मोहित ने सुना और फिर कहा,
“रूही, मेरा एक्सिडेंट हो गया था,अभी ठीक हूँ,कल बात करूँगा”
“सुनो तो,एक मिनट बात तो सुनो ,प्लीsssज”
रूही बोलती ही रह गयी,मोहित सुनता ही रह गया।
मोहित ने फोन काटा और अपने दोस्त रवि को फ़ोन लगाया बोला हॉस्पिटल में शिफ्ट होना है। शाम को मोहित हॉस्पिटल में शिफ्ट हो गया और फिर रूही को फ़ोन मिलाया।
आगे आने वाले 17 दिनों ने मोहित की ज़िन्दगी बदल देनी थी
और ये मोहित को पता ही नहीं था। शबाना को अंदाज़ा ही नहीं था की उससे कितनी बड़ी भूल हो चुकी थी।
मोहित जा चुका था,रूही आ चुकी थी।

जब कुछ नए रिश्ते आपकी ज़िन्दगी में आने वाले होते हैं तो उनकी खुशबु पहले आने लगती है। वक़्त कुछ नया सा सिलसिला बनाने लगता है,आपके कुछ पुराने रिश्ते दूर जाने लगते है।
वो क्या है कि नए रिश्तों को ज़्यादा जगह की ज़रुरत जो होती है।

वो कहते है न कि कभी-कभी किसी की बददुआ भी दुआ का काम करती है। किसी की बददुआ ही रही होंगी जो मोहित इतना बेसहारा होकर हस्पताल में पड़ा हुआ था। वही हुआ, किसी की बददुआ ने मोहित की ज़िन्दगी में दुआ बन के कदम रख दिया था। उन 17 दिनों में मोहित की ज़िन्दगी बदल चुकी थी। रूही बस सामने ही नहीं थी, बाकी सुबह की दवाई से लेकर रात के खाने तक हर चीज़ का ख्याल रखती रही। मोहित को रूही का इंतज़ार रहता था और रूही बिलकुल सही समय पर फ़ोन करती थी। मोहित के लिए ये सब नया नया सा था। उसको आजतक इतना ख़ास किसी ने नहीं समझा था। केयर क्या होती है,अफेक्शन क्या होता है, सब भूल चूका था और रूही ने उसकी जिंदगी में आकर एक नयी सी हलचल मचा दी थी।
मोहित को लगा कि “कहीं?”
पर रूही को नहीं लगा था, रूही को कहीं कुछ नहीं लगा था और बस यही एक बात थी जो मोहित को नहीं पता थी कि आगे क्या गुल खिलाने वाली है। मोहित, जिसने बरसों से अपने को इन सब जज्बातों से अलग कर रखा था,फिर बहकने लगा था। पिछले कई बरसों में अकेला होते हुए भी किसी को कभी नज़दीक आने का मौका नहीं दिया था पर इस बार मोहित को ही मौका नहीं मिला कि अपने को अलग रख सके। मोहित के लिए प्यार के मायने थोड़े अलग थे और वहां रूही के लिए प्यार कोई मायने ही नहीं रखता था। न मोहित को ये पता था और न रूही को और शबाना को तो बिलकुल नहीं पता था कि उसकी एक छोटी से ग़लती आगे आने वाले वक़्त में कई जिंदगियां तबाह करने वाली है।
और फिर आया बारिशों का मौसम, यादगार बारिशों का मौसम। होता यूँ है कि वक़्त के साथ कुछ मौसम आपको प्यार करना सिखा देते हैं और कुछ मौसम नफ़रत करना और एक मौसम ऐसा होता है जिसे आप प्यार वाली नफरत करते हैं। ये होता है बारिशों का मौसम जो अक्सर भिगोता नहीं हैं बल्कि सुखा के रख देता है कई दिलों को और जनाब उन्ही बारिशों के मौसम में रूही का जन्मदिन होता था।

इस बेमुरव्वत बारिश ने कितने दिलो को ज़िंदा किया है और कितनो को रोज़ जलाया है ये तो बरसने वाले बादलों को भी नहीं पता होगा। वो तो नामुराद बस बरस के चले जाते थे और फिर नादान दिल या तो परवाने बन जाते थे या कोसी मिटटी। यूँ तो हर किसी के अपने अपने आसमाँ, अपनी अपनी ज़मीन, अपने तारे, अपनी नदी, अपनी बारिश होती हैं और होते हैं उनमे लिपटे किस्से कहानी पर जनाब जो किस्से कोसी मिट्टी पर बारिश की बूंदों की खुशबू वाले होते हैं वो आपको ज़िन्दगी भर याद रहते हैं।
उनकी महक आपको आपकी यादों से तलाक लेने नहीं देती। आप आँख बंद कर सकते है, सुनना बंद कर सकते हैं पर क्या सांस लेना बंद कर सकते हैं?
तो फिर कर लीजिये, अगर निज़ात पाना है तो उस खुशबू से…

क्रमश: …

24 thoughts on “रूही – एक पहेली: भाग-1

  1. Bahut hi bhavuk varnan kiya hai bhaiya ek bin pyar ki shadi ka aapne. Aajkal ki bhagdhod ke jeevan me, ek apne ka hona kitna mahatva rakhta hai badi hi kushlta se aapne bataya.

    1. आपके शब्दों के लिए आपका आभार

  2. Behtarin lekhani ka shandar namuna.. padhna shuru kiya to padhta hi gya..
    Bandhu, esake sare bhag kya pathakon ke liye prastut kiye jayenge?? agar kiye jaaye to hum apke shukragujar honge agar nahi to bhi..

    1. किताब अमेज़न पर है शायद किन्तु फिलहाल यहां पर आप धीरे धीरे २१ दिनों में पढ़ सकते हैं।

  3. अभी तक के कहानी से तो लग रहा है कि रिश्तों का काफी पेचीदा उलझन है । हां आगे क्या होने वाला है, अभी तक तो कोई अंदाजा नहीं है ।

  4. ये तो बहुत उलझी हुई है। अभी तक। अगर शबाना और मोहित का प्रेम विवाह था। तो अमित कौन है ? फिर प्रेम विवाह कैसे ? क्या आगे जवाब मिलेगा ?

    1. आखिरी पन्ने तक अगर ऐसे ही उलझा कर रख पाने में सफल हुआ तब बात बनेगी।

  5. बहुत ही अच्छा प्रारंभ, ढेर सारे सवाल और अगले भाग की प्रतीक्षा।🙏

  6. रिश्तों और बदलती परिस्थितियों का सुंदर वर्णन।
    शुभकामनाएं

    1. शुक्रिया, आगे भी पढ़िएगा।

  7. शब्द का प्रवाह अनुभूति में बदलते हुए मन में एक चलचित्र की तरह उभरकर आता है, ऐसा लगता है कि रूही, शबाना, मोहित, सब हमारे आस पास के रहने वाले हो और लेखक ने इन किरदारों को शब्द-मोतियों सा पिरोकर जीवंत कर दिया हो🙏

    1. मेरी कोशिश थी कि आप लोग कागज पर चलचित्र पढ़ें। अच्छा लगा कि कुछ सफल हुआ मै…

      आभार आपका

  8. परवाह शब्दों का , और पढ़ते पढ़ते लग रहा कि एक इमेज चल रही , बहुत ही उत्कृष्ट भैया ❣️❣️❣️

    1. उम्मीद है अगले भाग भी आपको पसंद आयंगे

  9. माय 3 एम् फ्रेंड रूही,
    वैसे आप रूही को कभी भी पढ सकते हैं लेकिन
    अरबों की आबादी वाले देश में जब आप अकेले हों, रात के 2 बजे भी जब आपका शरीर नींद मांग रहा हो लेकिन आंखे सोने को राजी न हो तभी आप रूही से जुड़ सकते हैं। एकांत अकेलेपन में पढ़िए और शरीर की थकान को आंखों से बहने दीजिए और हल्का कर लीजिए अपने दिल को।
    प्रणाम श्रीमान सर

    1. रूही आपको बुलाएगी , पर जाने का नहीं …

      पढ़ते रहिए 😇

  10. बहुत ही मार्मिक है। इसमें वर्णन डूब कर किया गया है।

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