प्रहार – मंडली
मंडली

प्रहार

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रात भर से सोई नहीं थी, किन्तु मन प्रफुल्लित था। मुख पर आज अतिरिक्त कान्ति थी। रात को केवल कुछही क्षणों के लिए नेत्र मूँदे होंगे, और उस तन्द्रा में भी मन ही मन नृत्य करती रही। उसे प्रतीत हुआ कि उसने अपने जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय कर लिया था। दो माह से जीवन में चल रही उथल-पुथल, व्याकुल हृदय, भटकते हुए मन का रहस्य समझ आ गया था। उसने अपने हृदय से सब कुछ tनिचोड़कर चार पंक्तियों में लिख दिया था, और रात्रि का एक एक क्षण वही पंक्तियाँ पढ़ते हुए व्यतीत कर दिया था। उसने ये चार पंक्तियाँ ऐसे गुथी थीं जैसे प्रत्येक अक्षर एक पुष्प हो और वह चुन चुनकर कोई विशेष हार गुथ रही हो। उसका मन इसी विचार से हिरनी की तरह कुलांचे भर रहा था कि आज ये चार पंक्तियाँ, उसका गुंथा हुआ पुष्पहार, वहाँ पहुँच जाएगा जहाँ उनको पहुँचना चाहिए।

रूपसी तो वह थी ही। श्रृंगार करने की आवश्यकता थी नहीं। उसने केश सँवारे, हल्का सा काजल लगाया, एक छोटी सी बिंदी माथे पर लगाई, अपना मुख एक बार दर्पण में देखा, और स्वयं को देखकर ही लजा गई। एक बार होंठों को गुलाबी रंग में रंगा, फिर न जाने क्या विचार करके पोंछ दिया। फिर स्वयं को देखकर मंद-मंद मुस्काई और आनंद में डूबी हुई वह अपने महाविद्यालय की ओर चल पड़ी। प्रथम वर्ष था, सुबह जल्दीनिकलना और लगभग शाम तक लौटना दिनचर्या थी। पहले राज्य सड़क परिवहन की बस से शहर तक जाना होता, और उसके बाद स्थानीय साधनों से महाविद्यालय पहुँचना होता था। एक घंटा लग जाता था।

वह बस से उतरी, अब भी अपने आप में मग्न थी। जैसे किसी पूर्वनिर्धारित घटनाक्रम में सब स्वतः ही हो रहा हो, वह एक ऑटो में बैठ गई। उसकी दृष्टि साथ ही बैठी हुई लड़की पर पड़ी। उसके वस्त्र देखकर वह समझ गई कि वह विश्वविद्यालय की छात्रा है। फिर भी उसने पूछा “आप विश्वविद्यालय से हैं, विज्ञान विभाग से?”

उस छात्रा ने उसे देखा और कहा- “हाँ, और तुम?”

मैं श्रीराम महाविद्यालय से। प्रथम वर्ष।

क्या नाम है तुम्हारा?

अहा, और आपका?

रीति

फिर कुछ देर दोनों चुप रहीं, कुछ संकोच तो था, फिर भी अहा ने धीरे से पूछा, “आप धवल सर को जानती हैं?”

हाँ

“वो पढ़ाते हैं हमारे महाविद्यालय में।” यह कहते कहते वह वहीं बैठी बैठी जैसे अहा अपने आप में सिमट गई।

रीति ने उसे एक बार फिर देखा। इस बार केवल देखा ही नहीं उसे पढ़ लिया। उसके भाव भंगिमाएँ और हृदय में जो चल रहा था वह कुछ अलग नहीं था। नेत्र चंचल हो गए थे, ठहरते ही न थे, केवल एक नाम लेने भर से मुख दमक उठा था

“मुझे मालूम है।” रीति ने कहा।

“बहुत अच्छे हैं न सर?” अहा ने कहा।

यह प्रश्न है? या तुम्हे ऐसा लगता है?

अहा लजा गई।

रीति के सुर भी कुछ बदल गए, बोली, “इतना भी विशेष नहीं। तुम अधिक ही प्रभावित लगती हो।”

नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं। बस ऐसे ही पूछा था।

“कुछ तो है!” रीति ने छेड़ते हुए कहा।

नहीं, बस अभी उनकी ही क्लास है थोड़ी देर में। सबको अच्छे लगते हैं वो तो।

नहीं, धवल की कोई क्लास नहीं है आज।

“है न! आज तो टेस्ट भी है!” कुछ उत्तेजित होकर उसने यह कहते हुए हाथ अपने बैग पर रखा, जैसे उसमें रखे अपने पत्र को छूकर कुछ निश्चित कर लेना चाहती हो।

इतने में रीति फोन पर बात करने लगी, “हाँ धवल, आज कोई क्लास है क्या तुम्हारी?”

“हाँ, है तो” फोन पर से स्वर सुनाई दिया।

आज रहने दो न, मैं आज जल्दी जा रही हूँ, मुझे तिराहे से लिफ्ट दे दो आज। पराठे बना कर लाई हूँ, नाश्ता साथ कर लेंगे।

आज क्लास-टेस्ट के लिए बोला था। आधा घंटा देर से नहीं चलेगा?

नहीं, मैं महत्वपूर्ण हूँ या क्लास? टेस्ट ही तो है, पेपर देकर आ जाओ, कोई और देख लेगा। मैं पाँच मिनट में पहुँच रही हूँ।

ये भी ठीक है, आता हूँ मैं भी पाँच ही मिनट में।

अहा का हृदय धक् से रह गया। धड़कन थी भी या नहीं, श्वांस चल रही थी या नहीं, उसे कुछ समझ नहीं आया। इतने में रीति ने ऑटो रुकवाया, पैसे दिए, और अहा की ओर देखकर बोली, “आज क्लास नहीं है।”

बाइक पर धवल वहीं प्रतीक्षा कर रहा था। रीति जाकर बाइक पर बैठ गई और एक बार फिर अहा की ओर देखा। यह अंतिम प्रहार था और चोट गंभीर। अहा ने ऑटो में से ही देखा कि बाइक दूसरी दिशा में तेजी से निकली जा रही थी। उसका मुख पीला पड़ गया था, आँखे नम हो चुकी थीं। उसका हाथ उस कागज़ के टुकड़े पर गया, उसमें लिखी हुई उन चार पंक्तियों के अक्षर बिखरे हुए लगने लगे, मात्राएँ जैसे उसकी उँगलियों में काँटों की तरह चुभ गयीं।

लेखक – अजय चन्देल (@chandeltweets)

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