तो क्या मैं भी …

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ढ़ेले के मोल भी

नहीं बिकती संवेदना

तो क्या मैं भी चंट बनूँ

बात बात में

उठती निष्ठुर वेदना

तो क्या मैं भी चंट बनूँ

या जी लूँ भाव विभोर

ये जीवन हरा भरा

लेकिन कभी ना चंट बनूँ

रोज रोज ही गर्त में

जा रही मर्यादा

तो क्या मैं भी नंग-धड़ंग बनूँ

जोर जार रोती है

शुचिता सर्वदा

तो क्या मैं भी नंग-धड़ंग बनूँ

या गरिमा का लिहाफ

ओढ़ लूँ जीवन भर

लेकिन ना नंग-धडंग बनूँ

क्षणिक लाभ पर

बदल रही है अब निष्ठा

तो क्या मैं भी अवसरवादी बनूँ

शब्द मात्र ही

शेष रही अब प्रतिष्ठा

तो क्या मैं भी अवसरवादी बनूँ

या निष्ठा ना तोड़ूँ

सतत रहूँ मैं जीवन भर लेकिन ना अवसरवादी बनूँ

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