मंडली

बेटी: पिता का अभिमान

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गैर धर्म के व्यक्ति के साथ भागी हुई एक सवर्ण लड़की के बारे में बात हो रही थी। परिवार के सभी सदस्य इस घटना पर उद्विग्न थे। अजय देवगन को अपना आदर्श मानने वाले मेरे चाचा हाल ही में ‘दिलजले’ देख कर आये थे। उन्होंने अपना विचार कुछ इस प्रकार रखा,”लड़की को इतनी छूट दोगे तो यही होगा ना।” पिता जी ने दहाड़ते हुए कहा, “छूट का अर्थ बच्चों पर विश्वास होता है, ना कि माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे उनकी नाक कटायें।” तेरह वर्ष की मैं चौकन्नी होकर ये बातें सुन रही थी। बुआ, चाचा और छुटकी मौसी ने जब मेरी ओर देखा तो ऐसा लगा आँखों ही आँखों से भविष्य के लिए मुझे आगाह कर रहे हों। पिताजी की बात के बाद मामला कुछ गम्भीर हो गया था। बुआ ने लिबिर-लिबिर करते हुए कहा कि आजकल प्रेम विवाह होना भी आम होता जा रहा है। पिताजी ने साँझ की बैठक की अंतिम बात कही, “जीजी, प्रेम विवाह गलत नहीं है। कम से कम बच्चे माँ-बाप को दोष तो ना देंगे कि कहाँ फँसा दिया और फ़िर इस बात का दोष जीवन भर सर पर लेकर घूमो।”

अगले दिन सुबह, पिताजी जमीन से जुड़े कोर्ट केस के सिलसिले में कचहरी जा रहे थे। मैं दौड़ते हुए उनकी बुलेट के पास गयी कि बुआ ने मुझे पीछे से टोका, “अब बड़ी हो रही हो। हर जगह लिल्ली घोड़ी की तरह दौड़ कर चल देना ठीक नहीं है, अपने पिता जी को जाने दो।” पिता जी ने यह बात सुनी। मैंने उनकी ओर देखा पर उन्होंने कुछ ना कहा। उन्हें मेरे चेहरे को देखकर मेरी उलझन का कारण समझ आया होगा। मैं बचपन से उनकी बुलेट की टंकी पर बैठकर जहाँ भी वह जाते थे, साथ जाती थी। अब पीछे बैठकर क्यों नहीं जा सकती? वो बुआ को जवाब क्यों नहीं देते! उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कह रहे हों कि निर्णय तुम्हारा है बिटिया, साथ चलना है तो चल सकती हो। मेरे लिए तुम सदैव छोटी ही रहोगी। तभी बुआ ने आवाज़ देकर पिताजी से कहा वापस आते वक्त छुटके भाँजे के लिए अजय देवगन के गानों की कैसट ले आना। पिताजी ने पलट कर कहा कि जिज्जी, लड़के को पढ़ाई लिखाई की राह दिखाओ वरना आपके बुढ़ापे में खाने की जगह गानों की कैसट ही मिलेगी। यह कहकर पिताजी बाहर चले गए।

दोपहर को बुआ तख्त पर बैठी माँ से पैरो में तेल लगवा रही थी। मैं ज़मीन पर बैठी घुईंया छीलने लगी। ज़मीन पर उठकुरुआ बैठी थी। बुआ मेरी माँ से बात करते हुए बीच-बीच में मुझे भी घूर देती थीं। टॉप का गला बड़ा था इसलिए मैंने दोनो हाथों से कंधे पर से टॉप पीछे किया और पीठ की तऱफ से एडजस्ट किया। यह देखकर बुआ माँ से बोली,”तुम्हारी लड़की समझदार है और अब बड़ी हो रही है। अब बचपना दिखाने की ज़रूरत नहीं है या तो अपने पास सुलाया करो या बाकी बच्चो के साथ। ज़्यादा पिताजी-पिताजी करना ठीक नहीं है। आदमियों के बीच रहना भी ठीक नहीं है। माँ ने कहा,” इसके पिताजी इसे अपने लिये बहुत भाग्यशाली समझते हैं, इसलिए उन्हें भी सभी बच्चों में इससे अधिक लगाव है”। बुआ ने माँ से कहा कि वो सब ठीक है पर तुम अब ध्यान दो। उनकी बातें मुझ पर ऐसा असर कर रही थीं कि मुझे याद ही नहीं रहा कि कच्ची घुईंया छीलने हाथों में जलन होती है। जो बहुत ज़्यादा बढ़ गयी थी। मैं रोने लगी। बुआ ने पूछा, “इसे पता नहीं था कि इसके हाथ मे घुइंया लगती है।” माँ ने कहा कि पहली बार छील रही थी। बुआ ने आगे कहा कि मेरी बात पर तो नहीं रो रही है। माँ अदब में कुछ ना कहकर झूठमूठ मुस्कुरा दी। मैं कुछ देर में शांत हुई पर बुआ को बुरा ना लगे, इसलिए सर झुकाकर वहीं बैठी रही।

शाम को पिताजी आये, सबकी दुबारा बैठक हुई। आज चचेरे बड़े भैया की बारहवीं का रिजल्ट आया था। भैया दूसरी बार बारहवीं में फेल हुए थे। पिता जी ने ढ़ाढ़स बंधाया और कहा,”पढ़ने में तो तुम ठीक हो तो बार-बार फेल कैसे हो जाते हो”? भैया ने उत्तर दिया,”चाचा साइंस साइड पास करना बहुत मुश्किल होता है, एक बार मे कोई पास नहीं होता।” पिताजी ने कहा,”मैं अपनी बिटिया को साइंस से ही पढ़ाऊंगा और देखना वह पहली बार मे फर्स्ट क्लास पास होगी।” सब सकपका से गए। बुआ ने कहा, “और पढ़ाकर क्या करोगे? कितने पैसे जोड़ रहे हो दहेज के लिए? दसवीं कराओगे तो बारहवीं पास लड़का ढूंढोगे। और बारहवीं कराओगे तो सरकारी नौकर लड़का ढूंढोगे। सरकारी नौकरी वाले को दहेज देने का पैसा कितना जोड़े हो?” पिताजी ने तपाक से उत्तर दिया, “बिटिया को इतना पढ़ाऊंगा कि उसकी शादी के लिए उल्टा लड़के वाले दहेज लेकर आएंगे”। इस बात पर बुआ बहुत नाराज हुईं। उन्होंने माँ से कहा फ़िर बड़ी होकर यह भी उसी लड़की जैसा करेगी तो इसकी गलती मत देना।

पिताजी को बुरा लगा पर कुछ नहीं बोले। अगले दिन उन्हें दूसरे जिले में गेहूँ की फसल कटवाने जाना था, इसलिए वहाँ से उठकर बरामदे में चले गए, बिस्तर लगाया और मुँह घुमा कर लेट गए। मेरे मन में बहुत से ख़याल गूँज रहे थे। पिताजी अगले दिन गेहूँ कटाने जाएंगे तो तीसरे दिन ही लोडिंग कराकर वापस आ पाएंगे। साथ ही मैं यह चाह रही थी कि पिताजी से कहूँ कि ऐसा कभी कोई काम नहीं करूंगी जो अनजाने में भी उनके मान को ठेस पहुँचाये। माँ ने मुझे सोने को कहा। बरामदे से लगे आँगन में बुआ सो रही थी। माँ असहज थीं। छुटका भाई पिताजी के पास सोया था। मैं भी उधर को चली तो बुआ ने तीखी आवाज़ में कहा “उधर कहाँ जा रही हो बिटिया?” पिताजी चौंक गए। मैंने एक पल उनकी ओर देखा, फ़िर बुआ को उत्तर दिया, ” बुआ बचपन से आदत है जब तक मैं पिताजी के पेट पर हाथ रखकर नहीं सोऊँ, मुझे नींद नहीं आती है।“

लेखिका कहानियाँ और मुक्त छन्द कविताएँ लिखती हैं। कथा चरित्रों की सजीव कल्पना से उनकी कहानियाँ जीवन्त और मार्मिक बनती है। कहानियों और कविताओं के अतिरिक्त वह जीवन शैली, फैशन और मनोरंजन आदि विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। फेमिनिस्ट मुद्दों पर उनके आलेख बिना किसी पूर्वाग्रह के होते हैं। लेखिका ने लोपक.इन के लिए कई कहानियां और अन्य आलेख लिखे हैं। वह एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं।

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