मंडली

स्मार्टफोन की शोक सभा

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मोहल्ले में हलचल थी और शर्मा जी के घर में शोक की लहर। शर्मा जी के स्मार्टफोन फोन चल बसे थे। असमय नहीं क्योंकि इन जाना तो साल भर पहले ही ड्यू था। शर्मा जी की थेथरई मिश्रित कड़की में ये कुछ महीने अधिक हुटहुटी पर टान गये थे। लोग शर्मा जी को सांत्वना दे रहे थे। शोकाकुल शर्मा जी शोक के समानान्तर बड़े धूमधाम से अपने प्रिय स्मार्टफोन के लिए धूप-बत्ती युक्त शोक सभा की तैयारी कर रहे थे।

शर्मा जी के स्मार्टफोन फोन की शोक सभा में लगभग 25 लोग पहुँचे। इनमें से अधिकांश वे लोग ही थे जिनके फोन के लिए शोक सभा की आवश्यकता कभी भी पड़ सकती थी। शोक संतप्त आगन्तुक सर्दी से कठुआए और लरुआए तो थे ही, वे प्रकृति से भी शर्मीले थे। शर्मा जी के पड़ोसी वर्मा जी बकैती में पारंगत थे। लिहाजा उन्हें शोक सभा का मुख्य वक्ता बना दिया गया। रूँधे गले से उन्होने अपना स्व-रचित शोक संदेश पढ़ना आरम्भ किया।

ये बहुत अच्छे फोन थे। सजग व चौकन्ने इतने कि कभी चोर-उचक्कों को इन पर हाथ साफ करने का मौका नहीं मिला। इनमे धीरज कूट-कूटकर भरा था। स्क्रीन-टच फोन का प्रयोग शर्मा जी क्यूवर्टी फोन की तरह करते थे, इन्होने कभी उफ्फ तक नहीं कहा। शर्मा जी के गोलू-मोलू ने इन पर अजब-गजब गेम ही नहीं खेला बल्कि गाहे बिगाहे इन्हें एक दूसरे पर फेंक फेंककर मारा भी। इन्होने कभी उह-आउच नहीं किया। भाभी जी का शर्मा जी को बेलन थेरेपी देने से मन नहीं भरता तो वह सौतिया डाह में इन्हें कई बार पटक देतीं, “लुत्ती लागे एह फोन में।” लेकिन इन्हे गुस्सा नहीं आया।

शर्मा जी के पूरे परिवार ने स्मार्ट फोन ‘चलाना’ इन पर ही सीखकर इनकी वह दशा कर दी जो शर्मा जी के दहेजुआ राजदूत मोटरसाइकिल की हुई थी। इसी मोटसाइकिल पर शर्मा जी के सभी रिश्तेदारों और गिने चुने पड़ोसियों तक ने ड्राइविंग सीखी। इनमें कुछ ऐसे भी थे जो यह समझते थे कि मोटसाइकिल में न्यूट्रल गियर के अलावा एक ही गियर होता है। अज्ञानता का परमानन्द लेते हुए वे लोग गदहवा गियर में ही शर्मा जी का दहेजुआ मोटरसाइकिल हाँकते थे।

शर्मा जी ने इन पर साली-सलहज से चिकनी-चुपड़ी बातें कीं, पट्टीदार तक से मुँहबजरा, ढोर्हा-मंगरू तक को मिस्ड कॉल मारे, आड़े-तिरछे ट्वीट्स किए, WA पर सूक्तियों के नाम पर विवेकानन्द से चाणक्य तक को चकित करते हुए लोगों का अभिवादन किया और वैशाखनन्दन तक का फोटो खींचा। इन्होंने कभी बुरा नहीं माना। शर्मा जी ने इन्हें तरह तरह के चार्जर से कमोबेश आठों पहर चार्ज करके सदाबहार ज्वरश्री बनाए रखा लेकिन ये मष्तिष्क से शीतल ही बने रहे। हर दिन इन्हें नये ऐप का कैप पहनाया जाता रहा पर इन्होंने टोपी पहनाए जाने को वैसा ही सहज कर्म समझ लिया जैसा लोकतंत्र में ले-देकर जनता अब समझने लगी है।

अपने समर्पण और सेवा भाव के कारण ये शर्मा जी के जीवन संगी टैप हो चले थे। शर्मा जी का रोना बिलखना यह बताता है कि वह इन्हें कितना मिस्स करेंगे। हालाँकि शर्मा जी नया जीवन संगी लाने के लिए व्यग्र है पर आठ-दस हजार रुपये जुगाड़ना आसान नहीं है। समस्या यह है कि उनका डेबिट कार्ड हाथ खड़े कर चुका है और क्रेडिट कार्ड पर क्रेडिट का बोझ देखकर बैंक के रिकवरी एजेन्ट्स शर्मा जी को कई बार हूल दे चुके हैं।

भाभी जी भी रूआँसी हैं पर इनके जाने के लिए कम और नया आने की संभावना से अधिक। सामाजिक सुधारों के सिद्धांत रुप में पैरोकार शर्मा जी ने इनका मुखड़ा हमेशा पारदर्शी घूँघट में रखा, शेष शरीर को गर्मियों में भी मोटे कपड़े में। कभी इनके तन को खुली धूप नहीं मिली। साँस भी घूँघट के अंदर ही लेने की बाध्यता थी। किन्तु आज घूँघट और कपड़े हटने के बाद चलाचली की इस बेला में इनकी बाँछे तक खिल उठी हैं और ये ‘जस की तस धर दीन्हि चदरिया’ के सच्चे ब्रांड एम्बेसडर लग रहे हैं।

उब और खीज प्रधान इस देश में शर्मा जी ने इनसे उबकर इनको सेकंड हैंड करने के कई असफल प्रयास किए। पर इन्होने शर्मा जी से उबकर कभी भी किसी स्मार्ट मिश्रा जी या श्रीवास्तव जी के पास जाने की कोई इच्छा नहीं जतायी। कसाई के खूँटे से बँधे होने को अपनी नियति मानकर ये कर्म पथ पर आजीवन डटे रहे। फ्री टॉक टाइम या डाटा के चक्कर में शर्मा जी ने लगभग सारी टेलीकॉम कंपनियों के सिम डालने के बहाने दर्जनों बार इनकी माइनर सर्जरी इस तरह से की कि आज फोड़े, फुन्सियों व घावों का इलाज करने वाले झोलापैथ जर्राह शर्मा जी से सर्जरी सीखने आने लगे हैं।

ये सिर्फ कहने को ही चाइनीज थे। जीवन काल खासा लंबा रहा इनका। नेटवर्क सिग्नल के लिए शर्मा जी को जिन्हे लेकर कोने कोने में जाना पड़ता था, उनमें गुजरात में हो रहे चुनावों के ईवीएम का सिग्नल टनाटन आने लगा। स्वयं पर या अपने स्वामी शर्मा जी पर रिगिंग के किसी संभावित आरोप की आशंका से ये काफी तनाव में आ गये। फलस्वरूप दिल का दौरा पड़ा, प्राण पखेरु उड़ चले।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ये प्रखर लोकतंत्रवादी थे। चीन से आए ह्वेनसांग तो फिर भी चीन लौट गये थे पर भारतीयता इनको इतनी भायी कि मुगलों की तरह यह भी भारत में ही रच बस गये। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले दिनों में मुगलों की तरह भारत के प्रति इनके योगदान गिनाए जाएँगे, गढ़े भी जाएँगे। इनके इस आचरण से शर्मा की देशभक्ति पर लगा वह धब्बा भी धूमिल हो चला है जो उन पर चाइनीज फोन खरीदने के कारण लगा था। अपने सुकर्मों के कारण ये अगले जन्म में ये कुलीन सेव या नारंगी फोन बनेंगे। यह भी हो सकता है कि ये मानव तन ही धारण कर लें और पिछले जन्म के अनुभवों से ये महान ट्वीटकार बनें। भगवान इस पुण्यात्मा को शांति और सदगति दें।

भावभीनी श्रद्धांजलि!

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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