मंडली

14 मार्च 1931: जब मूक फिल्मों को आवाज मिली

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भारतीय फिल्मो के बारे में थोड़ी जानकरी रखने वालों से भी यदि पूछा जाए कि पहली फिल्म कौन सी थी तो जवाब आपको मिलेगा ‘राजा हरिश्चंद्र’ जो 3 मई, 1913 को रिलीज़ हुई थी। जवाब इतना आसान नहीं है। यह इतना ही आसान होता तो फिर मैं यह लिखता क्यूँ भला? इस सवाल के जवाब में यह भी पूछा जा सकता है कि क्या सवाल यह है कि पहली मूक फिल्म कौन सी थी या पहली बोलती फिल्म कौन सी थी? मैं यह नहीं कहूँगा कि वो किस्सा किसी और दिन क्योंकि आज एक ख़ास तारीख है जिसकी पृष्ठभूमि में ही वो किसी और दिन वाला किस्सा है। वैसे दिल की बात तो यह है कि जब तक ‘वो किस्सा किसी और दिन’ वाली बात न हो तो मुझे लिखने में मज़ा नहीं आता।

उन दिनों की बात है जब थियेटर में या तो नाटक दिखाए जाते थे या विदेशी फिल्में। तब एक 22 वर्षीय भारतीय ने अपनी फिल्म बनाने सपना देखा। उस युवक का नाम था रामचंद्र गोपाल तोरने यानी दादा साहब तोरने। रामचंद्र गोपाल तोरने एक गरीब मराठी परिवार में पैदा हुए थे। 10 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और बंबई की कॉटन ग्रीन इलेक्ट्रिकल कंपनी में काम करने लगे। वहीं उनका परिचय नाटको की दुनिया से हुआ था जहाँ एक नाटक कंपनी ‘श्रीपद’ नाटक मंचित किया करती थी। तोरने को नाटकों का शौक लग गया। बंबई में जब भी कोई विदेशी पिक्चर लगती तो तोरने सब छोड़ छाड़ कर फिल्म देखने पहुँच जाते ।

तोरने को खटकने लगा था कि ऐसी कोई फिल्म भारत में क्यों नहीं बनती। इस सवाल को तोरने ने थोड़ी अधिक गम्भीरता से ले लिया। आखिरकार उन्होंने अपने एक दोस्त नानासाहब चित्रे को इस जुए पर दाव लगाने के लिए तैयार कर लिया। इस प्रकार भारत में बनी पहली फिल्म के लिए नाना ने पैसे लगाए। एक ब्रिटिश कंपनी से फिल्म के लिए कैमरा मँगाया गया और सिनेमैटोग्राफर बना एक अंग्रेज, जिसका नाम था जॉनसन। फिल्म बनानी किस पर थी, यह अभी तक तय नहीं हुआ था। यहीं पर तोरने साहब का नाटकों का पुराना जूनून फिर सामने आया। तय हुआ कि श्री रामराव कीर्तिकार द्वारा लिखित मराठी नाटक ‘श्री पुंडलीक’ का फिल्मांकन किया जायेगा। यह एक हिंदू संत पर लिखा नाटक था। अपने मित्र नाना चित्रे के साथ मिलकर उन्होंने स्क्रिप्ट तैयार की, स्क्रीनप्ले लिखा, पर डायलाग?

जी हाँ, फिल्म में कोई डॉयलाग नहीं था। ज़माना मूक यानी साइलेंट फिल्मों का हुआ करता था। बंबई के ग्रांट रोड पर यह नाटक मंचित हुआ। इसे डायरेक्ट किया था तोरने साहब ने और उसको कैमरे में रिकॉर्ड किया था जॉनसन ने। इस फिल्म की रिकॉर्डिंग भी एक बार में मुकम्मल नहीं हुई थी। शुरुआत में एक जगह कैमरा लगाकर नॉनस्टॉप रिकार्डिंग की गई किन्तु जब तोरने साहब ने रिकार्डिंग देखी तो उनको पसंद नहीं आयी। उसके बाद उन्होंने एक-एक सीन रिकॉर्ड किया जिसे बाद में जोड़ा गया। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि यह भारत की पहली फिल्म एडिटिंग थी। जब फिल्म की शूटिंग पूरी हो गई तो उन्होंने उसे पॉजिटिव में बदलने के लिए लंदन भेज दिया। कुल 22 मिनट की यह पहली मूक फिल्म गिरगाँव के कोरोनेशन सिनेमैटोग्राफ थिएटर में 18 मई, 1912 को रिलीज हुई थी जहाँ यह दो हफ्ते तक लगी रही थी।

इस प्रकार इसे दादा साहब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ से लगभग एक साल पहले दिखाया गया था। जिसे आप भारत की पहली मूक फिल्म मानते हैं, वह 3 मई, 1913 को रिलीज हुई थी। कुछ दिनों से इस पर विवाद है कि इन दोनों में से किसे भारत की पहली फिल्म माना जाना चाहिए। विवाद इतना बढ गया कि अप्रैल 2013 में ‘इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन’ के डायरेक्टर, विकास पाटिल और तोरने के परिवार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक मुकदमा डाल दिया। विकास पाटिल ने 100 साल पहले के सारे अखबारों की कटिंग सबूत के लिए जुटाई जिनमें ‘श्री पुंडलीक’ की रिलीज से जुड़ी खबरें और रिव्यू भी थे। अब भी यह कंट्रोवर्सी चल ही रही है। इस पर ‘नेशनल फिल्म आर्काइव’ के प्रशांत का कहना हैं कि एक फीचर फिल्म के लिए कुछ खूबियां जरूरी हैं जो ‘श्री पुंडलीक’ ने पूरी नहीं की थी। उनका कहना है कि एक नाटक को कैमरे के जरिए रिकॉर्ड कर लेना फिल्म बनाना नहीं होता। साथ ही इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि इस फिल्म को एक विदेशी कैमरामैन ने रिकॉर्ड किया था और निगेटिव की प्रोसेसिंग लंदन में जाकर हुई थी।

चलिए मूक फिल्मो से आगे बढ़ते हैं और आपसे दूसरा सवाल स्पष्ट तरीके से पूछते हैं – भारत की पहली बोलती फिल्म कौन सी थी? जवाब आयगा – आलम आरा। गलत जवाब! मुंबई की कंपनी ‘इम्पीरियल मूवीटोन’ की ‘आलमआरा’ भारत की पहली बोलती हुई फ़िल्म इसलिए कहलाती है क्योंकि यह सबसे पहले रिलीज़ हुई थी लेकिन भारत में जो बोलती फिल्म सबसे पहले बननी शुरू हुई थी, वो थी कोलकाता की कंपनी ‘माडन थिएटर’ की ‘शीरीं फ़रहाद’। माडन थियेटर की बुनियाद जे.एफ.माडन ने रखी थी।

बात उन्ही दिनों की है जब भारत में पहली बोलती फ़िल्म बनाने की कोशिशें हो रही थी। भारतीयों को इस तकनीक के बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी। ‘शीरीं-फरहाद’ के लिए तकनीशियन यूरोप से बुलवाए गए थे। उन दिनों पारसी थिएटर का बोलबाला हुआ करता था। फ़िल्म ‘शीरीं-फ़रहाद’ के हीरो-हिरोईन भी पारसी नाटकों और साईलेंट फ़िल्मों के स्टार मास्टर निसार और जहाँआरा कज्जन थे। यूरोप के तकनीशियनों का काम करने का तौर-तरीक़ा बिल्कुल अलग था। वक़्त के बेहद पाबंद, सुबह तय वक़्त पर काम शुरू करना और शाम को तय वक़्त पर पैकअप कर देना, यही उनको आता था। बिना किसी ओवरटाइम के, काम सिर्फ एक शिफ्ट में होता था होता था क्योंकि उनके लिए क्लबों, खेलकूद और मौजमस्ती में शामें गुज़ारना भी ज़रूरी था।  फ़िल्म ‘शीरीं-फ़रहाद’ ‘बेहद तेजी’ से बन रही थी और आखिरकार ‘तय अवधि’ में पूरी भी हो गयी।

कुछ दिनों बाद मुंबई में आर्देशीर ईरानी ने भी ‘आलमआरा’ बनानी शुरू कर दी। मुख्य कलाकार थे मास्टर विट्ठल, जुबैदा और पृथ्वीराज कपूर। फ़िल्म ‘आलमआरा’ में भारतीय और विदेशी तकनीशियनों की मिली जुली टीम काम कर रही थी। इस फिल्म की शूटिंग कई शिफ्टों में होती थी जिसकी यह ‘शीरी-फ़रहाद’ से पहले बनकर तैयार हो गयी। इस तरह ‘आलमआरा’ 14 मार्च 1931 को  मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में रिलीज़ हो गयी। फिल्म के निर्माण में लगभग 40 हजार रुपए खर्च हुए थे जो उन दिनों काफी बड़ी रकम समझी जाती थी। 14 मार्च 1931 को मुंबई के मैजिस्टिक सिनेमा हॉल के बाहर दर्शकों का सैलाब जमा था और टिकट खिड़की पर दर्शक टिकट लेने के लिए उमड़ रहे थे। उस रोज़ चार आने के टिकट के लिए दर्शक चार-पाँच रुपए देने के लिए तैयार थे। पाँच रुपये की कीमत तब क्या होती थी, आप गूगल करके देख सकते हैं। आज से पूरे 89 साल पहले आज ही के दिन, यानी 14 मार्च 1931 को हिंदुस्तानी सिनेमा को आवाज़ मिली थी और मूक फ़िल्मों ने बोलना सीखा था। साथ ही इसी दिन ‘शीरीं फ़रहाद’ ने ‘पहली भारतीय टॉकी’ के ताज से हाथ धोया था जिसकी वह हक़दार थी। ‘शीरीं फ़रहाद’ अपने ‘प्रोफेशनलिज्म’ की वजह से क़रीब ढाई महीने बाद 30 मई 1931 को रिलीज़ हो पायी थी।

भारतीय सिनेमा के पितामह आर्देशिर ईरानी के बाकी किस्से किसी और दिन। फिलहाल जश्न मनाइए कि आप अमिताभ को यह कहते हुए सुन पाते हैं, “ये तुम्हारे बाप का घर नहीं, पुलिस स्टेशन है, इसलिए सीधी तरह खड़े रहो।” और साथ में किशोर कुमार को ये बताते हुए भी सुनते हैं कि उनके सामने वाली खिड़की में एक चाँद का टुकड़ा रहता है।

 

लेखक मुख्य रूप से भावनात्मक कहानियाँ और मार्मिक संस्मरण लिखते हैं। उनकी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में होती हैं और उनमें बुंदेलखंड की आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक का मानना है कि उनका लेखन स्वयं की उनकी तलाश की यात्रा है। लेखक ‘मंडली.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी रचनाएँ 'ऑप इंडिया' में भी प्रकाशित होती रही हैं। उनके प्रकाशित उपन्यास का नाम 'रूही - एक पहेली' है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मैं मुन्ना हूँ' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। लेखक एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत हैं।

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