मंडली

परलौकिक होमवर्क

शेयर करें

आज 22 मार्च, 2020 कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जनता कर्फ़्यू का दिन। सन्नाटा पसरा है, कोई चहल-पहल नहीं। हवाओं तक में एक अजीब सूनापन है। एक 22 मार्च आया था सन 2012 में … दिन – बहस्पतिवार था, समय दोपहर 12 बजकर 50 मिनट। हमारे जीवन में एक सन्नाटे का सैलाब आ गया था। यमराज मेरे पापा को लेकर चले गए थे … दूर … बहुत दूर … जहाँ से वापसी नहीं होती। ICCU की हार्ट रेट मॉनिटरिंग मशीन की ऊँची-नीची रेखा अब एक सीधी लाइन बन चुकी थी।  उस मशीन की कर्णभेदी टें-टें की आवाज़ अब कोड-ब्लू की सायरन ध्वनि में तब्दील हो चुकी थी।

जिस दिन आप किसी को खोते हैं, उस दिन, उसी क्षण लोग जन्म ले रहे होते है, विवाह कर रहे होते हैं, नौकरी शुरू कर रहे होते हैं, बच्चे को स्कूल से लेने जा रहे होते हैं। फिर कैसे अचानक एक लम्हा, एक दिन आपके सामने खड़ा हो जाता है और अनंत प्रश्न छोड़ जाता है। पिता का जाना भी ऐसा ही कुछ होता है। पंचांग तिथि से उस दिन अमावस्या थी और उस अमावस ने शाब्दिक तौर पर हमारे जीवन जीवन में एक ऐसी काली रात लिख दी जिससे उबरने के लिए आने वाली अनगिनत पूर्णिमाओं की उजास भी कम पड़ गयी। वैसे पापा के जीवन में अमावस्या की बहुत बड़ी भूमिका रही।  उनका जन्म भी अमावस को हुआ था, नौकरी में २-३ पदोन्नतियाँ भी उसी दिन हुई थी। और तो और उन्हें पुत्री-रत्न की प्राप्ति यानि मेरा जन्म भी अमावस्या के ही दिन हुआ था।

कहते है कि हम सभी इस पृथ्वी पर कुछ ऐसे पाठ सीखने आते हैं जिनका सीखा जाना हमारे सतत आध्यात्मिक विकास यात्रा के लिए आवश्यक होता है। पुनर्जन्म जैसे जटिल विषयों पर अनुसंधान करने वाले कुछ विद्वानों का मानना है कि हम पृथ्वी पर बार बार जन्म लेते हैं ताकि हम प्रेम, दया, क्षमा, दान, अपरिग्रह, संतुलित विचारधारा, प्रसन्नता, सहिष्णुता और विवेक जैसी भावनाओं को अपने पिछले जन्म से ज़्यादा परिष्कृत करते जाएँ और मोक्ष प्राप्ति के समय हम इन सभी मानवीय गुणों की प्रति मूर्ति बन जाएँ। सामान्यतः होता इससे बिल्कुल अलग है। जन्म लेने के कुछ समय पश्चात हम भूल जाते हैं कि हमें विधाता ने कुछ पारलौकिक होमवर्क देकर यहाँ इस पृथ्वी पर भेजा है और यहाँ से लौटने के बाद हमें अपने अपने प्रोजेक्ट का पावरपॉइंट प्रेजेन्टेशन उसी परमात्मा को दिखाना है।

इस संसार में आते ही हम तल्लीन हो जाते हैं रोजी – रोटी के चक्कर मे, पैसे कमाने और शादी – ब्याह करके घर बसाने में, स्वास्थ्य और सौन्दर्य बढ़ाने में, व्यायाम करने और शारीरिक सौष्ठव बनाने में, कामयाबी हासिल करने की अंधी दौड़ में, अपने संस्थान के कनिष्ठों से लेकर बॉस तक की बखिया उधेड़ने में, पर-निंदा और पर-चर्चा करने में, गहने बनवाने और गहने तुड़वाने में आदि में जन्म का लगभग क्षय कर देते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि ये सारी गतिविधियाँ जरूरी है जीवन में, पर इनकी सही मात्रा, सही वरीयता और सही अनुपात की जानकारी हो तो सब कुछ ठीक है लेकिन कितनों को याद रहता है भगवान जी का दिया हुआ होमवर्क।

पापा ने अपने होमवर्क को बड़ी गंभीरता से लिया था। अब पीछे मुड़ कर देखती है तो साोचती हूँ कि परमपिता परमात्मा ने पापा को उनके होमवर्क के लिए एक बहुत ही प्यारा सा स्माइली 😊 दिया होगा। पापा सही मायनों में एक सिविल सेवक थे और जीवन के प्रति बड़ा ही सादगी भरा रवैया रखते थे। उन्होंने कभी कुछ भी थोथे शब्दों से नहीं सिखाया बल्कि अपने जीवन में उन सिद्धांतों का अक्षरशः पालन किया। उनकी सारी बातें बड़ी ही स्वाभाविक और बिना लीपा-पोती के होती थीं।

पापा हमेशा कहा करते थे, “एक आदमी की कमाई में सौ लोगों का हिस्सा होता है।” पहले मैं इस बात को नहीं समझती थी। मुझे पापा की बातें समाजवाद के किसी तिलिस्मी सिद्धान्त की तरह पल्ले नहीं पड़ती थी। कभी-कभी लगता था कि शायद वे गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित ‘ट्रस्टीशिप डॉक्टरीन’ की बातें कर रहें हैं। कैसे पिताजी की कमाई पर 100 आदमियों का हक हो सकता है जबकि वो तो पूरी तरह से ” सेल्फ मेड ” मैन हैं। उनके कहने का तात्पर्य था कि अगर मेरे बाबा-दादी ने अपने स्नेह रस से पापा को नहीं सींचा होता, तमाम चाचा, मामा, मौसा और फूफाओं ने समय पर ख़्याल नहीं रखा होती या ज़रूरी मदद नहीं की होती, घर के काम में दादी का हाथ बँटाने वाले सिराज काका ने घर के झाड़ू-बर्तन के साथ पापा के खाने-पीने व उनके स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा होता, प्रेम भैया और प्यारेलाल जी के यहाँ बचपन के यादगार लम्हे नहीं गुजरे होते, अनेक शिक्षकों-व्याख्यातों का अप्रतिम योगदान नहीं रहा होता तो शायद पापा का व्यक्तित्व कुछ और होता। तब मुझे समझ में आया कि कैसे एक व्यक्तित्व को आकार लेने में अनगिनत लोगों का सहयोग रहता है।

पापा अपने समय से काफी आगे के व्यक्ति थे और उन्होंने हमेशा परिवार में गर्ल-चाइल्ड को बढ़ावा दिया। उन्होंने मुझे मेरे बड़े भईया से कहीं ज्यादा स्नेह दिया। नारी शिक्षा और उनके अच्छे जीवन स्तर के लिए पापा ने सच्चे अर्थों में बहुत कार्य किया। पापा के विचारों में ना दुविधा थी ना उलझन और न ही अपने सिद्धांतों, राष्ट्रीय प्रश्नों पर बेबाक़ राय पर तनिक भी छिपाव या लज्जाबोध नहीं।

पापा का स्वरूप सामने वाले व्यक्ति के अनुरूप होता था। यदि सामने पाँच वर्षीय बालक है तो उसके प्राइमरी स्कूल की टीचर की बातें उसी की तोतली जुबान में, सामने कोई ज्योतिषाचार्य बैठा हो तो शनि की महादशा में राहु की अन्तर्दशा और बुध की प्रत्यंत्तर दशा पर चर्चा, सामने अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हो तो किन्स के सिद्धान्त से लेकर 1992 के उदारवादी नीतियों से होते हुए चिदंबरम की चर्चा, सामने कोई साहित्यकार बैठा हो तो बच्चन और निराला की चर्चा और यदि सामने 90 वर्षीय वृद्धा बैठी हों तो रामायण के बाल कांड से लेकर किष्किंधा कांड तक की चर्चा करते। सबसे महत्वपूर्ण यह कि इन चर्चाओं में वह बहुत अच्छे श्रोता भी होते। वह कहते थे कि स्वभाव में अकड़ नहीं रखनी चाहिए क्योंकि बर्फ भी अकडू होता है और हमेशा अपने ही आकार में क़ैद रहता है, हमें पानी के जैसा निर्मल और निराकार रहना चाहिए।

जब मैं अहमदाबाद में दसवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाती थी तो कई बार छात्रों के किसी सामान्य ज्ञान के प्रश्न के उत्तर देने में संशय की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। फिर तुरंत मन करता था कि पापा को फ़ोन लगाकर उतार पूछ लूँ पापा से। वह एनसाइक्लोपिडिया ही थे पर विज्ञान ने इतनी तरक्की नहीं की कि परलोक तक की कनेक्टीविटी मिल जाए।

क्रिकेटर ‘उन्मुक्त चाँद’ पापा के लेटेस्ट क्रेज थे। वह क्रिकेट के ऐसे दिवाने थे कि भले ही भारत मैच हार गया हो लेकिन वह उसका हाईलाइट्स देर रात तक ज़रूर देखते। एशियाड खेलों के समय स्टेडियम में बैठकर सभी स्पर्धाएं देखते। हमेशा हार-जीत को समान दृष्टि से लेना, हमेशा उम्मीद का दीया जलाए रखना और दुनिया को तलहथी पर रखे बेर के समान समझना उनकी खासियत थी।

पापा हास परिहास से भरे रहते थे। उन्हें मैंने कभी भी उदास, खिन्न या चिड़चिड़ा नहीं देख। जीवन के अंतिम सप्ताह में वे मेदान्ता होस्पिटल गुड़गाव में भर्ती थे। हार्ट अटैक आया था। उस अस्पताल के बैलुनिंग विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. बलवीर सिंह उनका इलाज कर रहे थे। मृत्यु के तीन दिन पहले किडनी में गड़बड़ी आ गई थी। पापा बहुत तकलीफ में थे। रात 11.30 बजे I C U  से फ़ोन करके नर्स ने डा. बलबीर सिंह को बुलाया। वह आए और पापा को कुछ दवाएं देकर तसल्ली देने की मंशा से बोले, “Mr. Sahay, मैं आपके साथ ही सो सोऊँ?“ हालाकि पापा हाँफ रहे थे, फिर भी मुस्करा कर बोले, “Many thanks Doctor, but please go home. My gain should not be Sardarni Madam’s loss!” इस पर डा. सिंह भी झेंपकर मुस्कुराए बिना नहीं रह सके।

शाम ७.३० बज रहा था – विजीटींग आवर। ICU में पापा से मिलने पहले मम्मी मिलने गईं, फिर भैया और सबसे बाद मैं। कमरे में कर्ण भेदी टें-टें की हार्ट रेट मॉनिटरिंग मशीन से आती आवाज़ से मेरा मन किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा रहा था। पापा के चेहरे पर चिर परिचित मुस्कान थी। मुझे देखते ही बोले कि बेटी अब तुम अहमदाबाद लौट जाओ, अपनी नौकरी को गंभीरता से लेना सीखो। मैंने पापा की बात को अनसुना करते हुए पुछा, “पापा रात को सोते समय नर्स इस मशीन को बंद तो कर देती है ना? इस नॉयज पॉल्युशन में नींद तो आ नहीं सकती!” इस पर पापा ने मज़ाक़ करते हुए कहा कि अरे बेटा कैसी बातें करती हो, जब तुम्हारी मम्मी के साथ सालों-साल रह लिया तो ये मॉनिटरिंग मशीन की शोर क्या चीज़ है? उस दिन अंतिम बार हम साथ में दिल खोलकर खूब हँसे थे। अगले दिन पापा को ICCU में वेंटिलेटर पर ले ज़ाया गया। अब कोई आवाज़, दृश्य और संवेदना उन्हें परेशान नहीं कर रही थी, सिर्फ़ साँसें भर चल रही थी। अगले दिन पापा जीवन और मौत की लुका- छिपी के खेल से तंग आकर अपने पारलौकिक घर की ओर कूच कर गए।

पापा के स्वर्ग सिधारने पर 10 दिनों तक हर शाम को पंडितजी हमारे घर आते और गरूड़ पुराण का पाठ करते। एक दिन हमें रोता देखकर उन्होंने कहा कि मृतक की आत्मा की सच्ची श्रद्धांजलि यूँ विह्वल होकर नहीं दी जाती। यदि आपको अपने पिता को हमेशा अपने पास रखना हो, उन्हें सच में अमर बनाना हो तो उनकी उन तमाम बातें, व्यवहार और सिद्धांतों को आत्मसात् कर लीजिए जो उन्हें विलक्षण बनाते थे।  मैं अवाक रह गई और पापा का निश्चित, निशब्द, निरंतर स्वरूप दिखने लगा। लगा कि पापा जहाज़ का वो लंगर हैं जो समुद्र की लहरों में हमें टूटने, बिखरने से रोकने के लिए खड़े हैं। पंडित जी की घंटी और ‘आनंद कंद भगवान की जय’ की जयकारे के साथ मेरी तंद्रा टूटी।  घंटी की आवाज़ अनायास ही अस्पताल की मॉनिटरिंग मशीन की याद दिला रही थी और गर्म गर्म आँसू गालों से ढुलक कर ज़मीन पर गिर रहे थे।

लेखिका – हिना प्रसून (@Hena19)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *