मंडली

पलायन

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“सर पर धूप निकल आई थी। बारह बज रहे होंगे”, थकी रचना ने पति सुदामा से कहा। सुदामा बोला, “अभी कहाँ? अभी तो ग्यारह ही बजे होंगे, रुक जाएँ क्या?”

रचना की गोद मे नन्हा मनोज सो गया था। बड़ा बेटा नीलेश पैदल चलते चलते उकता गया था। उकताहट से अधिक थकान थी। चलते हुए आज दूसरा दिन था। सूरज सर पर था, गर्मी से बुरा हाल था। मुश्किल से एक पेड़ मिला था, उसी के नीचे सब बैठ गए। सुदामा टिककर बैठा तो झपकी लगते एक क्षण भी न लगा। झपकी लगते ही वह कई साल पीछे पहुँच गया।

वह कुएँ के पास बैठा हुआ था। रोटी और धनिया मिर्च की चटनी सामने थी। उसने मुट्ठी मार कर प्याज तोड़ी और खाना खाने लगा। बाई पर झल्लाते हुए बोला, “कभी तो कोई तरकारी बना देती।“ बाई कुछ नही बोली। चुपचाप कुएँ से पानी खींचने लगी। इतने मे राजेन्द आता दिखा। उसने काला चश्मा लगाया हुआ था और गले मे गमछा डाला था। भूरे रंग की चमकीली पतलून और गुलाबी बुशर्ट पहने वह बड़े ठाट से चला आ रहा था। राजेन्द दिल्ली मे रहता था। तीज त्यौहार पर गाँव आ जाता था। दिल्ली में करता तो बेलदारी था लेकिन पैसे ज़्यादा कमाता था। गाँव आता तो सब दोस्तों को समोसा कचौड़ी ज़रूर खिलता। सुदामा ने उसके पहुँचने से पहले ही बाई से कहा, “लो आ गया, अब हाँकेगा दुनिया भर की।“

बाई – हाँकने दे, तू रोटी खा।

सुदामा – बाई, तू हमको काहे नही जाने देती दिल्ली। कुछ कमा खा लेंगे। ये चटनी रोटी तो नहीं खानी पड़ेगी।

बाई – हमाई आँखों के सामने रहो, यहीं जो करना है करो।

सुदामा – कब तक चटनी रोटी खाएँगे। तुम्हारा बस चले तो गाँव के आगे की दुनिया देखने ही न दो।

बाई – गाँव के आगे न हम गए, न तुम्हारे दद्दा। अपना गाँव भला।

सुदामा – बस ऐसे ही बाँध के रखे रहो अपने छुड्डा (साडी के पल्लू) से। दोस्त यार सब हँसते हैं। अभी नही कमाएँगे तो कब कमाएँगे। दद्दा ने जिंदगी कच्ची झोपड़ी मे काट दी और हमारी जिंदगी भी ऐसी ही कटेगी।

बाई – छोटा सा सही पर अपना खेत है। जो कुछ हो जाता है काम चल जाता है।

सुदामा – अपना खेत? कुल एक बीघा ज़मीन है। हक जताने वाले चार। कभी फसल होती है, कभी नही होती। आधे साल तो दूसरों के खेत मे मज़दूरी करते हैं। सबके के दो-दो तीन-तीन बच्चे हैं। दद्दा और चाचा तो चला लेते हैं। हम सब बाल बच्चे बड़े होंगे तो यह खेत किस किस का पेट भरेगा?

बाई – फिर भी यहीं कुछ ढूँढ लो। परदेस किसी को नही फलता।

सुदामा – दुनिया जाती है बाई। सब पैसा कमाते हैं। दिल्ली कौन सा परदेस है। कौन सा दिल्ली मे बस जाना है? घर तो यहीं है न। एक बार जाकर देखने दे। फला तो रुक जाएँगे, नही फला तो लौट आएँगे।

बाई- एक बार कह दिया सो मान लो।

इतने मे राजेन्द आ पहुँचा। काकी के पाँव छुए। सुदामा ने भी राजेन्द के पाँव छूते हुए पूछा, “बड़े दिनो मे आए भैया?” “टेम कहाँ मिलता है यार”, राजेन्द ने कहा, “ठेकेदार छुट्टी देते ही नही। बड़ी मुश्किल से त्यौहार पर आ पाए हैं।“

सुदामा – बात तो सही है। अच्छा भैया कैसे जगह है दिल्ली?

राजेन्द – बढ़िया है, चलो कभी साथ मे तो दिखा दें।

सुदामा – बाई छोड़ें जब तो जाएँ।

राजेन्द – जाने दो काकी हमारे साथ। एक बार घूम आएगा। कुछ तो देख लेगा।

सुदामा – बाई न मानेगी। अच्छा ये बताओ व्यवस्था कैसी है दिल्ली में रहने खाने की। सुना है ठगों का शहर है।

राजेन्द – है तो ठगों का राज, लेकिन होशियार बन के रहो तो सब हो जाता है। भूखे सोने की नौबत तो नहीं आती। तुम तो चलो साथ में। व्यवस्था का क्या है, जहाँ हम रहें सो रह लेना।

सुदामा – देखते हैं, मनाते हैं बाई को।

शाम को सुदामा और उसकी बाई की बहस हो रही थी। दद्दा चुपचाप देख रहे थे।

“बाँध के मत रखो बाई, सबसे पहला काम इस झोपड़ी की मरम्मत का करवा देंगे लौटकर. यहाँ कुछ नही रखा।”

“परदेस किसी को नही फलता बेटा। न जाओ।”

दद्दा ने न जाने क्यों सुदामा का पक्ष लेते हुए कहा, “जाने दो कुछ कर ही लेगा। गाँव मे तो क्या रखा है।“

“लेकिन दुख तकलीफ़ में गाँव मे परिवार है। कुछ नहीं तो चटनी रोटी बारह मास मिलती रहेगी। वहाँ कौन देखेगा?”, यह कहते कहते बाई रो पड़ी।

सुदामा ने आवाज़ कड़क करते हुए कहा, “अब टेसुए न बहाओ।“

दूसरे दिन राजेन्द के साथ जाने को, सुदामा तैयार खड़ा था। साथ मे पवन भी हो लिया। पवन सुदामा के चाचा का लड़का था। बाई और चाची ने खूब समझाया, रोते गाते आख़िर मान गयीं। जाते समय रोते रोते दोनो से कहा कि एक दूसरे का साथ मत छोड़ना। परदेस में दोनो एक दूसरे के सहारे हो।

दिल्ली पहुँचते ही राजेन्द उन्हे एक झोपड़ पट्टी मे ले गया। घनी आबादी थी, बहुत छोटी सी झोपड़ी। पन्नी से ढकी हुई। खुले मे रहने वाले लड़कों का साँस लेना भी मुश्किल था। राजेन्द ने दिल्ली की सब बातें बताई थी, रेल, पुल, इमारतें, बाज़ार,मेट्रो, सड़कें और न जाने क्या क्या। लेकिन यह नही बताया था कि वह ऐसी झोपड़ पट्टी मे रहता है जहाँ साँस लेना भी मुश्किल है। दोनो का मन तो हुआ कि उसी क्षण वापस लौट जाएँ लेकिन अपनी ज़िद पर आए थे। बाई को क्या मुँह दिखाएँगे यह सोचकर रह गये।

राजेन्द  ने अगले दिन ठेकेदार से मिलवाया और कुछ दिनों मे दोनों लड़के मज़दूरी में लग गए।  पैसे गाँव से ज़्यादा मिलते थे, ऐब कुछ ख़ास थे नही सो पैसे बचने भी शुरू हो गये। अभी तक राजेन्द के फ़ोन से गाँव में किसी को फ़ोन कर के बाई से बतिया लेते थे। बाई रोज कहती कि लौट आओ। लेकिन अब दोनो लड़के रम गए थे। दिनभर की मजदूरी के बाद शाम को होश ही नहीं रहता और गहरी नींद सो जाते। मन करता तो भंडारे, लंगर में खाना सीख गए थे। कहाँ कब भंडारा मिलेगा, जानकारी उन्होंने जुटा ली थी। जीवन यहाँ अधिक सुगम लगने लगा था। छह महीने बाद जब पहली बार वापस गाँव गये तो दो फ़ोन लेकर गए। एक स्वयं के लिए और एक अपनी बाई के लिए। बाई ने दोनो को खुश देखा तो तसल्ली हो गई, और उसके रोज रोज का रोना गाना बंद हो गया। फ़ोन ने दूरी कुछ और कम कर दी।

फिर एकाध साल बीता तो सुदामा का ब्याह करवा दिया गया। बाई ने कहा कि बहू गाँव मे ही रहेगी तो वह मान गया। सुदामा का झोपड़ पट्टी मे घरवाली को लाने का कोई इरादा नही था। लेकिन ऐसा कब तक चलता। घरवाली ने ज़िद की, सुदामा ने लाख समझाया कि रहने खाने की कोई व्यवस्था नही पर वह नहीं मानी। घरवाली बोली, “रहेंगे तो तुम्हारे ही साथ और हम भी मज़दूरी कर लेंगे एक से भले दो।“ औरत के सामने उसकी न चली। शहर की झोपड़पट्टी में अस्थाई गृहस्थी बस गई। इसी बीच मनोज और नीलेश का जन्म हुआ। मनोज चार साल का हो चुका था और नीलेश छह महीने का।

अचानक सुदामा को कि लगा नीलेश रो रहा है और उसकी झपकी टूट गई। थोड़ी सी देर मे उसने न जाने कितने साल देख लिए थे। उसने नीलेश को अपनी छाती पर लिटाया और थपकी दी। नीलेश सोया तो उसके साथ वो फिर से सो गया। दो दिन पहले की रात उसे फिर दिखने लगी।

दुनिया में महामारी फैल चुकी थी। मज़दूरी मिलनी भी अब बंद हो चुकी थी। गाँव से बाई बार बार कह रही थी कि जी घबरा रहा है, बेटा घर आ जा। कई लोग जा भी रहे थे लेकिन वह रुक गया। सब कुछ बंद हो जाए ऐसी उम्मीद किसको थी। होगा भी तो एक दो दिन उससे ज़्यादा क्या? लेकिन सरकार ने सबकुछ बंद कर दिया था, रेलगाड़ी बंद होने की तो कोई सोच भी नहीं सकता। रेल बंद होते ही सुदामा समझ गया कि समस्या छोटी नहीं है। उधर बाई गाँव में अलग घबरा रही थी। दद्दा ने भी फ़ोन कर के कहा कि बेटा आ ही जाते, मन घबराता है। झोपड़ पट्टी के सब लोग भी डरे हुए थे। जो निकल सकता था, निकल चुका था। बचे लोग भी अपने अपने गाँव जाना चाहते थे। सबको घर याद आने लगा था। लेकिन समाचारों में और टीवी पर पुलिस की सख्ती और सब कुछ बंद होने की खबर के कारण किसी की हिम्मत नही थी निकलने की। उस रात राजेन्द, पवन और सुदामा तीनों बैठे थे।

सुदामा – भैया जी घबरा रहा है, बाई भी परेशान हैं। कुछ जुगाड़ करो घर पहुँचने की।

राजेन्द – सख्ती है पुलिस की, मुश्किल है।

पवन – ये पाँच छह सौ किलोमीटर का रास्ता है, थोड़ा बहुत नही।

सुदामा – लेकिन कैसे काटेंगे इतने दिन ?

राजेन्द  – जैसे तैसे काटने पड़ेंगे।

पवन – राशन की समस्या है।

सुदामा – थोड़े बहुत पैसे तो हैं और प्रधानमंत्री ने कहा भी है कि राशन मिलेगा।

राजेन्द  – लेकिन राशन तो गाँव के राशनकार्ड में आएगा न, यहाँ कौन सा राशन कार्ड है तुम्हारा?

पवन – बात तो सही है।

सुदामा – कुछ तो जुगाड़ करो।

राजेन्द  – जाना तो हम सब चाहते हैं। यहाँ दुख तकलीफ़ मे अपना कौन है। इधर जीना मुश्किल है और पैसे  महीने भर तो नही चल पाएंगे।

सुदामा – जी घबरा रहा है, बीमारी से मर न जाएँ हम सब।

तीनों बातें कर ही रहे थे कि अचानक बिजली चली गई और एक घोषणा शुरू हुई – जिसको अपने अपने गाँव जाना हो उनको दिल्ली की सीमा तक छोड़ने के लिए दिल्ली सरकार की बसें मिल रही हैं। उसके आगे उनके राज्य की सरकारें बसें उपलब्ध करवा रही हैं। जिसे जाना हो बस अड्डे पहुँच जाए। तीनों ने एक स्वर मे कहा कि चलो यही मौका है। आनन फानन में जो बेरिया-बिस्तर बाँधा और आधी रात को ही सब छोड़ छाड़कर निकल गए। पत्नी-बच्चों समेत विस्थापितों जैसे पैदल अपना समान लादे चले जा रहे थे। आज चलते चलते दूसरा दिन था। सड़क सुनसान थी, बस कभी कभी कोई ट्रक या बस निकल जाती, तेज़ी से हॉर्न बजाकर सन्नाटे को चीरते हुए। ऐसे ही एक ट्रक निकला और उसके हॉर्न से सुदामा की नींद खुली।

तीन बजने को आए थे, सबने सुस्ता लिया था। अब फिर से सबको उठकर चल देना था। पवन और राजेन्द पहले से तैयार बैठे थे। सब उठे और चल दिए। आदमी ने कैसी कैसी गाड़ियाँ, रेल, हवाई जहाज़ बना लिए लेकिन आज कुछ भी काम का नही था। छोटे छोटे बच्चे पैदल चल रहे थे।  उन्हे तो पता भी नही था कि वे पैदल क्यों चल रहे हैं। एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते हुए तपती धूप मे, वीरान रास्तों पर। कभी पैदल और कभी किसी छोटी मोटी सवारी को लेते हुए सब आख़िर गाँव के पास पहुँच ही गए। भूखे, प्यासे, थके हुए थे। लेकिन गाँव की सीमा देखते हुए शक्ति से भर गए।  सुदामा सीधा जाकर बाई से लिपट जाना चाहता था। लेकिन गाँव के बाहर पुलिस उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्हें समझ ही नहीं आया कि उनसे कौन सा अपराध हुआ है। सबको थाने ले जाया गया। उनकी जाँच परख हुई और सबको, ठीक से समझा कर चौदह दिन अकेले रहने और गाँव के अन्य लोगों से दूर रहने को कह दिया गया।

जब सुदामा घर पहुँचा तो बाई को देखकर रो पड़ा। डॉक्टरों ने बुजुर्गों से दूर रहने को कहा था, सो बहुत चाहकर भी दूर ही खड़ा रहा। बाई भी रो रही थी, लेकिन ये खुशी के आँसू थे। उसका बेटा घर आ गया था।  दुनिया में अब कुछ भी होता रहे उससे अब कोई मतलब नहीं। उसने आज सब्जी और रोटी बनाकर रखी थी। खाना परोसे जाने पर सुदामा ने कहा – चटनी रोटी ही दे देती बाई।

लेखक – अजय चन्देल (@chandeltweets)

 

4 thoughts on “पलायन

  1. अद्भुत सामय‍िक कहानी … व‍िस्थाप‍ितों का पूरा जीवन ही असमंजस और खुशी के बीच डोलता रहता है… अजय चन्देल ….आपने बहुत ही खूब ल‍िखा …. व‍िस्थाप‍ितों का कारुण‍िक पक्ष

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