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न्यू ईयर रिजॉल्यूशन

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आठ पहरिया चैनलों के एंकर भयंकर, अखबारों के स्थापित स्तंभकार व मूर्धन्य ट्विटकार पूरे साल के घटनाक्रम को ‘गागर में सागर’ जैसा परोसकर कैलेंडर से बेहतर यह बता रहे हैं कि नया साल दस्तक दे रहा है, उसके स्वागत की तैयारी हो। कुछ तो ऐसे बता रहे हैं, गोया ये बीतते साल की प्रमुख घटनाओं की रैपिंग न करते तो पुराना साल अपमानित महसूस करता और जाने से मना कर देता। इनके कहे बिना लोग नये साल का स्वागत नहीं करते और वह बिदक कर आता ही नहीं। इन लोगों के पराक्रम से अब यह लगभग तय हो चुका है कि नया साल आएगा ही। मैं थोड़ा और आगे बढ़कर आपको नये साल का रेजॉल्यूशन लेने के लिए ‘प्रोवोक’ करना चाहता हूँ जिससे नये साल पर जनमानस की परम्परागत रस्म अदायगी संपन्न हो सके।

‘आशा पर आकाश टिका है’ एक महत्वपूर्ण जीवन दर्शन है किन्तु हमारे आशावाद की इंतिहा नये साल को लेकर ही होती है। लगता है कि 31 दिसंबर की आधी रात को सब कुछ स्मूथ हो जाएगा, गोया पॉजिटिव रिसेट बटन दबने वाला है। कर्जा पट जाएगा, खर्चा घट जाएगा; कड़की हट जाएगी, रईसी सट जाएगी; बवाल रोएगा, कमाल होएगा; चैन करीब होगा, करार नसीब होगा, इत्यादि। नये साल की बधाईयों और शुभकामनाओं से लेकर मनाए जाने वाले जश्न और लिए जाने वाले रिजॉल्यूशन कुछ ऐसी ही आशा लिए होते हैं। नये साल के लिए रिजॉल्यूशन ऐसे लिए जाते हैं जैसे 31 दिसम्बर के बाद हम भीष्म ही बन जाएंगे जिसके पास संकल्प निभाकर जीवन का कायाकल्प करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं होगा। ऐसा करके हम यथार्थ को फताँसी में ढ़केलकर अच्छा फील लेने की हिरिस बुताते हैं। वैसे ‘केतनो करब सिंगार, पियवा त रहीहें उहे’ को थोड़ी देर भूलकर रुमानी होने में कोई नुकसान भी तो नहीं।

तो आइए, दहलीज पर खड़े नये साल का रेजॉल्यूशन लें। झिड़क दीजिए उन्हें जो यह कहें कि यह फॉरेन कॉन्सेप्ट है। हुह! न्यू ईयर कौन सा देसी है। नये साल का रेजॉल्यूशन पहले ही सप्ताह में हाँफने लगता है, इससे डीमोटिवेट होना फिजूल है। आदमी जन्म लेता है और फिर मर जाता है, इसका मतलब यह नहीं कि आदमी जन्म ही न ले। नियम बनते हैं, टूट या शिथिल हो जाते या कर दिये जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि नियम बने ही नहीं। नेता आँखों की पुतली होते हैं, फिर आँख की किरकिरी हो जाते हैं। तो क्या नेता ही न हों? मैं लिख रहा हूँ, आप पढ़ेंगे नहीं। इस कारण मैं लिखना बंद कर दूँ? समझा करिए। जीवन चक्र के लिए जन्म जरुरी है, समाज चलाने के लिए नियम, लोकतांत्रिक तेला-बेला के लिए नेता और साहित्य समृद्धि के लिए लेखन। मिलिए मोटिवेट करने वाले एक करेक्टर से। नये साल पर दारु से तौबा करने का रेजॉल्यूशन लेने वाले एक मित्र दस जनवरी को ही दा पी करते दिख गये। वह बिना किसी अपराध भाव के बोले; “रेजॉल्यूशन पर कायम हूँ। वो थोड़ा छोड़ने की खुशी में कभी कभी …”

प्रश्न यह है कि कौन कैसा रिजॉल्यूशन ले? तो बता देते हैं कि पत्रकार सनसनी और मनी को सच्ची पत्रकारिता के हनी से पटखनी देने का रेजॉल्यूशन ले सकते हैं, ट्विटकार भक्ति और भड़ास से आगे बढ़ने का। माननीय गण जुमलों के जाल में लोगों को हलाल नहीं करने का रेजॉल्यूशन लें। ‘सब मिले हुए हैं जी’ फेम सबमें मिल जाने पर जश्न करने का संकल्प लें, बात-बेबात विदेश जाने वाले सज्जन यह बतानें का प्रण लें कि वह कहाँ और क्यों जाते हैं। मन की बात सुनाने वाले मन की बात सुनने के मोड में आने का निश्चय करें। उद्देश्य नंगा लिए सड़क पर दंगा कर रहे लोग प्रण करें कि मन चंगा करेंगे ताकि कठौती में गंगा बहे। सरकारी बाबू चाय पानी छोड़कर समाज में सानी बनने की प्रतिज्ञा करें। हाकिम लोग हवा हवाई फरमान को अपने कमान से बाहर फेंकने का निश्चय करें। पुलिस वाले यह कहने के लिए हमें बाध्य करने का जतन करें कि पुलिस हो तो ऐसी। इंजीनियर. डॉक्टर और सीए जैसे पेशेवर लोग कमीशन मोड से मिशन मोड में आने का निश्चय करें।

सरकारी शिक्षक गण कोचिंग क्लासेज पर ताले लगना सुनिश्चित करने का प्रण लें। छात्र गण राष्ट्र को ‘भविष्य उज्जवल है’ का संकेत देने का बचन दें।  फिल्मकार, साहित्यकार, लेखक व कलाकार गिरती गुणवत्ता के लिए पाठकों व दर्शकों को कोसना बंद करने की शपथ लें। खिलाड़ी और खेल प्रशासक खेल से खेलना बंद करने का प्रण करें। आलसी लोग आलस छोड़ने का, थके लोग थकाना छोड़कर जकाने का, बेडौल लोग व्यायाम का और सुडौल प्रभु के नाम का रेजॉल्यूशन लें। लास्ट बट नॉट लीस्ट, आम जन सारी बुराईयों के लिए स्वयं को छोड़कर शेष सबको जिम्मेदार मानने से सख्त परहेज करने की भीष्म प्रतिज्ञा करें।

मैं जानता हूँ कि उपर बताए गए सारे रेजॉल्यूशन जीवन से अधिक क्षणभंगूर हैं। फिर भी मैं इनकी वकालत कर रहा हूँ। मन में एक मद्धिम सी आस है कि कहीं चमत्कार वश या भूल से ये रेजॉल्यूशन सच में ले लिए गए तो देश का कायाकल्प हो जाएगा। रेजॉल्यूशन लेकर उसके टूटने से डरने वालों को ढ़ीठ बनने का उपाय उपर बता दिया गया है। और अगर आप कहकर निभाने वाली लुप्तप्राय प्रजाति से आते हैं तो मेरे जैसा चंट बनिए। मैं हर साल रेजॉल्यूशन लेता हूँ क्योंकि ऐसा करना राष्ट्र हित में आवश्यक मानता हूँ। मेरे रेजॉल्यूशन की विशेषता यह है कि यह टूट ही नहीं सकता। हर साल की भाँति इस साल भी मेरा रेजॉल्यूशन है – कोई रेजॉल्यूशन नहीं लेने का रेजॉल्यूशन।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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