मंडली

नेह की पहली पाती

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हमारी स्थिति लगभग वैसे ही थी, जैसे कक्षा दसवीं के बाद होती है। क्या विषय लें, क्या ना लें। गणित में अधिक अंक हैं तो यही ले लेते हैं। नहीं नहीं … बायो ज्यादा इंटरेस्टिंग है, बायो लेते हैं। अंत में परिवार की सहमति से विषय का चुनाव हो जाता है। ‘जो बनना था’ के अनुसार विषय नहीं चुना जाता, चुने हुए विषय से जो बना जा सकता है, वही बनने का अकथित फैसला हो जाता है। ‘बनना क्या है’ पर कोई स्पष्टता कभी होती ही नहीं।

मन:स्थिति चाहे जो भी हो पर ये प्रेम पत्र लिखने का हमें सूझा ही क्यों? यह प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है। पूछिए पर हमने तो कभी यह नहीं पूछा कि प्रेम पत्र लिखा ही क्यों जाता है। क्या प्रेम एक युद्ध है जिसमें प्रेम पत्र का बिगुल बजना आवश्यक है? हमें पता है कि हमारे प्रश्न का उत्तर कठिन है। इसलिए हम आपके प्रश्न का ही उत्तर दे देते हैं। दुनिया जहान की सारी बक-बक सबसे अधिक उनसे करते हैं, वह ‘अकारण’ नहीं है। दिल की अनकही बात भी तो उनसे ही कहेंगे ना। दूसरे से कह नहीं पाएंगे, न ही वह समझ पाएगा।

मुश्किल यह है कि हम उस अनकही को शब्दों में ढाल नहीं पाते। कभी झिझक से और कभी झिझक को झटक भी दें तो शब्दों की कमी सी होने लगती है, गले में कुछ फँस सा जाता है…पता नहीं क्यों। कभी कभी अपने हिन्दी शिक्षक की योग्यता पर ही संदेह होने लगता है तो कभी अपने हिन्दी अध्ययन पर कोफ्त।

पहले सोचा, जाने दो। क्या ही कहना! बिन कहे ‘वो’ समझ न लेंगे? प्यार है तो उन्हें समझना ही होगा। पर दिल कभी इस तरह के तर्क सुनता कहाँ है कमबख़्त!

कहते हैं कि होनी टलती नहीं। हम भी इसे होनी मानकर शब्दों की खोज में जी जान से जुट गए। सोते-जागते, उठते-बैठते। कुछ सूझता तो लगता कि दिल्ली दूर नहीं। सहसा शब्द कम पड़ने लगते और हम ठिठक जाते तो लगता कि दुनिया बेमतलब सी हुई जा रही है। ‘हमसे ना हो पाएगा’ के भाव भी आते जाते रहे।

महीने भर की अथक कोशिशों के बाद ‘यूरेका! यूरेका!’ वाली स्थिति से आमना-सामना हो ही गया। कभी नींद में गणित के कठिन सवाल हल करने वाली ने नींद में ही यह कठिनतम सवाल भी हल कर लिया। आधी रात को बिस्तर से उछल कर हमने काग़ज़ कलम उठाया गया और ‘श्री गणेशाय नमः’ कहते हुए ज़िंदगी का पहला प्रेम पत्र लिखा जाने लगा।

आज ही लगा कि जब ताजमहल की नींव पड़ी होगी तो वो पहली ईंट भी अनजान होगी कि उस पर दुनिया के एक अजूबे का निर्माण होने जा रहा है। वो ईंट अनजान थी, हमारे इन शब्दों को भी कहाँ पता था कि वे मोती बनकर दमकने वाले हैं।

कुछ यूँ थे वो मोती …

मेरी ज़िंदगी,

तुम्हें इससे कम कुछ सोच ही नहीं सकते … हर आती जाती धड़कन की गवाही हो तुम … सबसे प्यारे, सबसे न्यारे और सबसे बुद्धू भी। हाँ, बुद्धू तो हो ही। यूँ ही समझ जाते तो यह कागज काला नहीं करना पड़ता। याद है तुमको कि उस दिन तुम गिर पड़े थे और हम खिलखिलाकर हँसने लगे थे। बाद में मन कचोटता रहा, सोग सा हो गया कि चोट कहीं मगज में न लगी हो, घुटनों के बल गिरे थे ना। कर सकते हो तो याद करने की कोशिश करो कि यह पंच किस उधार का बदला था …

ऐसे ही लिखती रही … दोपहर शाम में बदली और शाम रात में। वो रात शाहकार कर गई मोहब्बत की इबारत की, महीनों के उलझे धागे हरफ दर हरफ सुलझते गए। ये चार-पाँच पंक्तियां बढ़ते बढ़ते कई पन्नों तक चलती रहीं। क्या नहीं लिखा … प्यार, इकरार और तकरार; ताना, बहाना और फसाना; वादा और इरादा … क्या कुछ नहीं था। बोझ सा उतर गया था दिल से। आसमान में उड़ते बादल से हल्के हो चले थे हम। इसे कई बार ऐसे पढ़ा गोया भावार्थ से कोई गूढ़ रहस्य निकलना हो। पढ़ने से मन नहीं भर रहा था पर रुकना तो था ही। अगले मुकाम पर जाने को गुलाबी दिल बने लिफाफे में प्रेम पत्र डालते हुए एक छोटे से टेडी बेयर वाली की-चेन भी साथ रखी गई … कॉम्प्लीमेंटरी।

वो सुबह आने में उस रात बड़ी देर लगा रही थी। सूरज की पहली किरण की लाली कुछ अलग सी ही लग रही थी, जैसे दमकते सोने में नेह की पहली पाती सी सुगंध भर आई हो।

3 thoughts on “नेह की पहली पाती

  1. वाह, बहुत ही सुखद अनुभूति हुई, कुछ पुराने वाक़ए और यादें भी ताज़ा हुई। शुभकामनाएं।

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