राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का स्मॉग – मंडली
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का स्मॉग

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मत कहो आकाश में कोहरा घना है,

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,

क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है।

क्या दुष्यन्त कुमार के ये शब्द दिल्ली-एनसीआर और आस-पास के क्षेत्रों में छाये स्मॉग के लिए भी प्रयोज्य हैं? यह प्रश्न इसलिए पूछना पड़ रहा है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में छायी धुंध का संभावित कारण बताने पर विभिन्न प्रजातियाँ कुपित हो जाती हैं। हरियाणा सरकार द्वारा पराली दाहकों को धरने-पकड़ने के लिए पुरस्कार की घोषणा के बावजूद दिल्ली के पड़ोसी राज्यों (उप्र, हरियाणा और पंजाब) में पराली जलाए जाने को स्मॉग का कारण बताने पर किसानों के स्वयंभू हितैषी आपको किसान विरोधी बता सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार दीपावली पर ‘न जले’ पटाखों को कारण बताएं तो आप उनलोगों द्वारा अहिन्दू करार दिए जाएंगे जिन्होनें ‘दीपावली का मतलब पटाखे’ पर खूँटा गाड़ रखा है। यदि दिल्ली की राज्य सरकार को प्रदूषण रोकने में विफल बताया जाए तो क्रांतिवीर आपके घोड़े खोल देंगे।

गाड़ियों के धुएँ व घिसते टायर को इस धुंध का कारण बताया तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट को अपना भसुर मानने वाले वे लोग आपको समृद्धि का शत्रु बता देंगे जिन्होंने अपने परिवार के कुल चार लोगों के लिए छह गाडियां पाल रखी हैं। तुर्रा यह है कि यही लोग दीपावली से होली तक प्रदूषण पर पजामे से बाहर भी होते रहते हैं। अनियोजित औद्योगीकरण एवं विकास और पर्यावरण पर तदर्थ नीतियों पर प्रकाश डालें तो आप राइट-सेन्टर-लेफ्ट सबके लपेटे में आ सकते हैं। यदि भूल से भी इसकी कोई जिम्मेदारी आपने केन्द्र सरकार पर डाली तो आपको तरह तरह के नाम दिए जाएंगे। स्मॉग के कारणों पर प्रकाश नहीं डालने पर आपके अज्ञानी समझे जाने का खतरा है।

दिल्ली में दुनिया की एकमात्र प्रदूषणहीन सरकार है। ‘थर्टीन डेज दैट अवेकेन्ड इंडिया’ में वर्णित समुद्र मंथन से निकले विष से वह भ्रष्टाचार के दानव का संहार कर देती है तथा अमृत से भ्रष्टों का पाक-साफ। वह सोशल मीडिया पर शिक्षा का कायाकल्प कर देती है और लिप-सर्विस में स्वास्थ्य को सबके द्वार ला देती है। वह मुफ्त पानी और बिजली के बाद फ्री बस राइड और तीर्थाटन करा रही है। आज फिल्मों की समीक्षा कर रही है, कल सिनेमा का टिकट भी देगी। आप इतना भर नहीं कर सकते कि अपने लिए स्वच्छ हवा का प्रबंध कर लें। एक सप्ताह पहले तक जन भागीदारी से प्रदूषण शून्य होने का दावा करने वाले ‘दिल्ली के मालिक’ हम सब पर उपकार करते हुए मास्क बाँट रहे हैं और ‘ना से भला हाँ’ की तर्ज पर ऑड-इवन का गाया हुआ गीत फिर गा रहे हैं। क्या यही कम है? उधर दिल्ली के उपमालिक पहल करते हुए साइकिल पर दफ्तर जाकर लगभग वैसी ही कॉमेडी कर रहे हैं, जैसी स्वच्छ भारत पर की जाती रही है।

दिल्ली की जनता गैस चेम्बर में घुट रही है, ऐसा कहते ही कुछ लोग दिल्ली के मालिक को कोपचे में लेने की बात करके अनगिनत हैशटैग चला देंगे। फरीदाबाद व गुरुग्राम और गाजियाबाद व नोएडा के दमघोंटू हवा की बात करते ही यही लोग बगले झाँकने लगेंगे। जरा उनसे पूछा जाए कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय ‘दूधभत्ता’ हैं या अनासक्त जो जलते हुए रोम में पुपुही बजा रहे हैं या वे मिस्टर इंडिया की घड़ी पहनकर स्थिति से निबटने के उपाय कर रहे हैं।

स्वतंत्र भारत में सबसे कंसिसटन्ट नीति एक ही रही है – छोटी से छोटी उपलब्धि पर रूमाल फेंककर उसे अपना बता देना और किसी भी खराबी के लिए दूसरों के सिर पर टोपी फेंक देना। स्मॉग पर भी नीतियों की यह कंसिसटेन्सी जारी है। ‘स्मॉग पर तुमने क्या किया’ में हर कवि का एक ही भावार्थ है कि हम कुछ नहीं कर पाए। ऐसा ही माहौल बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब व्यक्ति के हाथ और पैर फेंफरे को प्रदूषण से निबटने की चुनौती देंगे और फेंफरा हाथ और पैर पर प्रदूषण की जिम्मेदारी डालेगा।

शुक्र है कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि छाया हुआ धुंध फॉग है या स्मॉग क्योंकि स्थिति इतनी साफ है कि लोग-बाग ‘स्कोर क्या है’ की तर्ज पर ‘AQI कितना है’ पूछ रहे हैं। स्मॉग रोकने में सरकारें विफल रही हैं, यह कहकर आम जन खुश हो लें क्योंकि वे लोकतंत्र के सिरमौर हैं और लोकतंत्र के साथ साथ पर्यावरण की बैण्ड बजाने का उन्हें लाइसेंस मिला हुआ है। पता नहीं कि वो दिन कब आएगा जब वे यह यह मानेंगे कि हम वैसी ही सरकार डिजर्व करते हैं, जैसे हम हैं और सरकारें जन सरोकार के मुद्दों उतनी ही सजग होंगी जितनी उन्हें ऐसी जनता में दिखेगी।

सरकारें टोपी खेल में व्यस्त हैं पर स्थिति थोड़ी सुधरी है। तेज हवाएं स्मॉग को उड़ा ले जाएं और बारिश उसे धो दे ताकि हम इस समस्या से तात्कालिक रुप से निजात पाकर सुविधाजनक चर्चाओं में फिर से लग जाएं। क्या ही अच्छा होता कि इस समस्या के विभिन्न पहलुओं पर सभी संबद्धों के बीच एक सकारात्मक विमर्श होता। जन भागीदारी और जन दबाव से जन सरोकार के इस वास्तविक मुद्दे पर विभिन्न सरकारें सक्रिय होतीं और उनमें आरोप-प्रत्यारोप की जगह समन्वय भरी सार्थक पहल होतीं। खबर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सक्रिय हुआ है। आशा करें कि इसका दूरगामी प्रभाव सकारात्मक होगा।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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