संपूर्ण लॉकडाउन – स्पष्ट संकल्प साफ संदेश – मंडली
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संपूर्ण लॉकडाउन – स्पष्ट संकल्प साफ संदेश

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देश में पिछले तीन दिनों में कोरोना पॉजिटव मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है और अब यह 500 के पार करने पहुँच गयी है। कोरोना वायरस का संचरण और नया संक्रमण रोकने के लिए देश के विभिन्न भागों में तरह-तरह के लॉकडाउन किए गए हैं, कई जगहों पर घोषित कर्फ्यू भी है। लॉकडाउन को गंभीरता से नहीं लिए जाने की उच्छृंखल लापरवाही की खबरें भी आयी हैं। देश में आशंका के बादल मँडरा रहे है, अफवाह स्थिति को विकट बना रहे हैं। प्रधानमंत्री एक बार फिर देश के मुखिया को कर्तव्य निभाते हुए नेशनल टीवी पर राष्ट्र को संबोधित करने आए।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन का आरम्भ जनता को ऐतिहासिक ‘जनता कर्फ्यू’ के लिए बधाई देते हुए की। उन्होंने कोरोना के विश्वव्यापी असर को रेखांकित किया और इसका संचरण रोकने के लिए सोशल डिस्टैंसिंग की महत्ता पर फिर बल दिया। साथ ही उन्होंने कोरोना संकट में बरती जा रही लापरवाही के प्रति सचेत किया।

अपने भावुकता भरे भाषण में प्रधानमंत्र ने सबसे महत्पूर्ण घोषणा यह की कि 25 मार्च पूर्वाह्न  12 बजे देश में तीन सप्ताह के लिए संपूर्ण लॉकडाउन किया जाएगा और लोगों का आह्वान किया कि देश में जो जहाँ है, वहाँ ही रहे। इसका सीधा अर्थ यह है कि आवश्यक सेवा कर्मियों को छोड़कर देश में सबके घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसा करना कोरोना से एकमात्र बचाव सोशल डिस्टेंसिंग के लिए आवश्यक था और प्रधानमंत्री ने इसका संकेत 19 मार्च को अपने संबोधन में ‘जनता कर्फ्यू’ का आह्वान करके दे दिया था।

प्रधानमंत्री ने लोगों को आगाह किया कि कोरोना का संक्रमण आग की तरह फैलता है। उन्होंने आँकड़ों से यह समझाने की कोशिश की कि दुनिया में कोरोना संक्रमण की संख्या 1 लाख पहुँचने में 67 दिन लगे, अगले 1 लाख में सिर्फ 11 दिन में और तीसरे 1 लाख सिर्फ 4 दिन। उन्होंने यह भी समझाने की कोशिश की कि अमेरिका, इटली, स्पेन और इंगलैंड की स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतरीन हैं लेकिन उन्हें भी कोरोना पर संघर्ष करना पड़ रहा है। हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ उतनी उन्नत नहीं हैं और हमारी जनसंख्या भी बहुत बड़ी है। इसलिए हमारा संघर्ष भी कठिन हो सकता है। हमारे लिए उम्मीद की किरण है – उन देशों से मिला अनुभव। रास्ता एक ही है कि घर की लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण न करें और बुजुर्गों का ध्यान रखें। घर में रहें और घर में ही रहें – जान है तो जहान है।

प्रधानमंत्री ने एक बार फिर लोगों को आह्वान किया कि अपने घरों में रहकर लोग उन चिकित्साकर्मियों, सफाईकर्मियों, अधिकारियों, आवश्यक सेवा प्रदाता कर्मियों और मीडिया मित्रों के लिए मंगल कामना करें जो संकट की इस घड़ी में अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमारी सेवा में जुटे हुए हैं। उन्होंने इस संकट में गरीबों की चुनौती का भी जिक्र किया और उन्हें हरसंभव सहायता देने की बात कही। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस लॉकडाउन से देश बहुत बड़ी आर्थिक कीमत चुकाएगा लेकिन आज सर्वोच्च प्राथमिकता जान बचाने की है। उन्होंने कोरोना से निबटने के लिए 15000 करोड़ के पैकेज की घोषणा भी की और राज्य सरकारों से स्वास्थ्य सेवाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान किया एवं निजी अस्पतालों और लैब्स के कोरोना संकट से निबटने में भागीदारी की भी बात की।

प्रधानमंत्री ने लोगों से अनुरोध किया कि वे अफवाहों पर कान न दे और अंधविश्वास से बचें। सरकार दैनिक उपयोग की  आवश्यक सामग्री और सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी। अंत में प्रधानमंत्री ने जनता से सरकार और प्रशासन के निर्देशों का पालन करते हुए अपना और अपनों का ख्याल रखने का निवेदन किया।

कोरोना के विश्वव्यापी असर और इस तथ्य के मद्देनजर कि अमेरिका जैसा देश भी कोरोना संकट पर 21 दिन का समग्र लॉकडाउन नहीं कर सका। भारत ने ऐसा किया है जिसके आर्थिक परिणामों से निबटना स्वयं में एक चुनौती होगी लेकिन फिलहाल प्राथमिकता जान की क्षति रोकने की है, माल के नुकसान की भरपाई पर हम बाद में सोचेंगे। स्थिति गंभीर है। नेशनल टीवी पर प्रधानमंत्री का करबद्ध निवेदन और 21 दिन का संपूर्ण लॉकडाउन कोई साधारण बात नहीं है। 21 दिन यूँ बीत जाएंगे, 21 साल पीछे जाने की भरपाई में 21 साल लगेंगे। सनद रहे, रोजगार और व्यापार जीवन के सरोकार हैं, जीवन नहीं।

संपूर्ण लॉकडाउन का निर्णय साहसिक है, कठिन भी लेकिन यह उस निर्णय का स्वागत करने और प्रधानमंत्री की निर्णय क्षमता की प्रशंसा करने का नहीं बल्कि उस लॉकडाउन का समग्रता में पालन करने का है। उच्छृंखल, लापरवाह और आलोचना के लिए आलोचना करने वाले तत्वों के लिए चार सांकेतिक शब्द भी थे प्रधानमंत्री के भाषण में – इसे कर्फ्यू ही समझिए। संदेश साफ है, संकल्प स्पष्ट है। जीवट के समक्ष कोई दूसरा विकल्प नहीं है, जीवन को जीतना ही होगा।

 

 

 

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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