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नाम में क्या रखा है!

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गुलाब का नाम कुछ और होता तो भी वह सुगंधित ही होता। शायद इसी आधार पर शेक्सपीयर ने कहा कि नाम में कुछ भी नहीं रखा। जिनका शराफत से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं, उनके नाम में शरीफ होना विरोधाभासी है। जो रुप लावण्य के राष्ट्रीय औसत से आठ पायदान नीचे हैं, उनका नाम भला रुप कुमार कैसे हो सकता है। किसी की चाकरी में जीवन व्यतीत कर रहा व्यक्ति आजाद नहीं हो सकता। मन्दबुद्धि और दब्बू का नाम तेजप्रताप कौन डिफेन्ड करेगा? प्रेम नाम है तो प्रेम से वास्ता भी तो हो। जो थाने के पास से गुजरते हुए हनुमान चालीसा पढ़ने लगें, उनका नाम सिपाही, जमादार या दारोगा तो नहीं ही होना चाहिए। ‘दयालु’ जालिम सिंह, ‘मूर्खाधिराज’ चतुर सिंह और ‘कोमल’ क्रूर सिंह जैसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ शेक्सपीयर की बात दिल पर लेकर लोग-बाग कुछ भी नाम रख देते हैं जिससे ‘आँख का अंधा नाम नयनसुख’ जैसा संवैधानिक संकट खड़ा हो जाता है।

नाम तो कुछ ऐसा होना चाहिए कि उसमे व्यक्तित्व और कृतित्व का सारांश झलके। जैसे पटना में एक चिकित्सक हैं – डा. दुखहरण प्रसाद। राज्यसभा में अपने राजनीतिक पौरुष का जौहर दिखाने वाले श्री राजनीति प्रसाद को लोग अब भी नहीं भूले होंगे। एडवोकेट वकील प्रसाद जैसे नामों से आस जगती हैं। इस परम्परा को मजबूती देने की आवश्यकता है। कर्म पर आधारित जाति तो बस कहने भर के लिए ही शेष है। कम से कम नाम में कर्म और आचरण की छाप तो दिखे।

उपरोक्त पैमाने पर किसी बच्चे का नाम रखना दुरुह कार्य हो जाएगा क्योंकि बच्चे के भविष्य का आचरण नामकरण करने वाले को पता नहीं होता। इसलिए हर बच्चे को नामकरण के समय एक प्रोविजनल नाम दिया जा सकता है जो भविष्य में उसके व्यक्तित्व निर्माण और आचरण के आधार पर बदलता रहेगा। इससे उपरोक्त संवैधानिक संकट खड़ा होने की आशंका जाती रहेगी और सृष्टि की हर शै की तरह नाम भी परिवर्तनशील हो जाएगा। हद से हद इसका एक ही नुकसान होगा कि लोग-बाग “… मेरा नाम बदल देना” की घुड़की नहीं दे सकेंगे।

अपनापन या ठिठोली में अनौपचारिक रुप से आज भी नाम रखे जाते हैं। गली-मुहल्ले के विशिष्ट लल्लू-पंजूओं से लेकर खास माननीयों तक के सामयिक, प्रासंगिक और अनौपचारिक नाम होते हैं। इस परम्परा को और लचीला एवं औपचारिक बनाने की आवश्यकता है। हर व्यक्ति के लिए ऐसे नाम आधार से भी अधिक सख्ती से अनिवार्य किए जाएं। ऐसे नाम रखते हुए गिरिजा, चंचल व नवजोत जैसे उभयलिंगी नाम न रखे जाएं ताकि किसी नाम से पहले श्री या सुश्री लगाने में रत्ती भर की दुविधा न हों। ऐसे नाम भी लोगों को न दिएं जिसके धारक ‘गर बदनाम भी हुए तो क्या नाम न होगा’ में यकीन करते हैं। एक व्यक्ति के कई नामों को सुचारु और सुव्यवस्थित रखने के लिए आधार को पैन व बैंक खाते से लिंक करने की तरह एक व्यक्ति के विभिन्न नामों को लिंक करने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस भी बनाया जाना चाहिए।

इस सामाजिक सुधार के विरोधी यह कहकर इसका विरोध करेंगे कि इससे एक व्यक्ति के अनेकों नाम हो जाएंगे। हुह! आज भी राशि का नाम, पुकार का नाम, रिकॉर्ड का नाम एवं प्रेमी प्रेमिकाओं द्वारा एक दूसरे को दिए जाने वाले भाँति भाँति के नाम तो होते ही हैं एक ही व्यक्ति के। इन यथास्थितिवादियों का मुँह बंद करने के लिए नील नीतिन मुकेश का भी उदाहरण दिया जा सकता है जिन्होंने डंके की चोट पर तीन नाम दशकों से अपने नाम कर रखे हैं। दक्षिण भारत में एक नाम में जितने नाम होते हैं, उनसे मुहल्ले भर का नामकरण हो सकता है।

विरोधियों को नजरअंदाज करके यदि प्रस्तावित नामकरण प्रणाली लागू हुई तो देश में नामों की भारी माँग की वजह से नाम गढ़ने वाले पेशेवरों के लिए नामकरण उद्योग एक रोजगारोन्मुख उद्योग बनकर उभरेगा। यह प्रणाली लागू हुई तो हम न सिर्फ समाज सुधार का आम खाएंगे बल्कि आर्थिक तरक्की से गुठलियों का दाम भी पाएंगे।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

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