माइक महारथी बनने का संघर्ष – मंडली
मंडली

माइक महारथी बनने का संघर्ष

शेयर करें

हम अपनी ही नहीं बल्कि दूसरों की सफलता को भी सेलिब्रेट करते हैं। यहाँ यह भी जोड़ देना उचित होगा कि दूसरों की तब, जब वे हमारे जलन की परिधि से बाहर हों। हम महान लोगों की महानता में अपना योगदान देते हुए उनका महिमामंडन करते हैं, कई बार अतिशयोक्तिपूर्ण भी। इस क्रम में महान व्यक्ति के संघर्ष के दिनों को भी याद किया जाता है। कई बार यह संदेह होता है कि संघर्ष के ये किस्से महानता प्राप्त करने के उपक्रम में घटित हैं या महान होने के बाद महिमामंडन के अन्तर्गत रचित।

असफलता से विचलित न होकर कोशिश करते रहने के लिए हम कितने प्रेरक संवाद करते हैं लेकिन असफल हुए या संघर्षरत लोगों पर विरले ही कोई विमर्श होता दिखता है। यह प्रवृति स्वस्थ समाज की सूचक तो नहीं है। वक्तृत्व की बात होती है तो हमें राजनीति और उससे इतर अन्य क्षेत्रों के प्रखर वक्ता याद आने लगते हैं और हम उनका यशगान आरम्भ कर देते हैं। कभी उन वक्ताओं की भी तो चर्चा हो जो भाषण कला में निपुणता के लिए संघर्ष करते रहे। आइए, ऐसी कुछ ‘वूड बी’ विभूतियों को याद करते हुए उनके संघर्ष के किस्से ऑन-रिकॉर्ड करते हैं ताकि इनके विभूति बनने के बाद कोई यह न कहे कि संघर्ष के उनके किस्से गढ़े गये हैं।

सरकारी विद्यालयों में तब स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयन्ती, श्री हनुमत जयन्ती और तुलसी जयंती जैसे कार्यक्रमों में छात्र-छात्राएं अपनी भाषण क्षमता को प्रदर्शित करते थे, निखारते थे और कई बार एक्सपोज भी होते थे। भाषण आम तौर पर किसी और द्वारा लिखे होते थे। मैंने भी अपना पहला भाषण तुलसी जयन्ती समारोह में ही दिया था। गद्य के टेक्स्ट की छोड़िए लेकिन “सुर सूर तुलसी शशि उडगण केशवदास। अब के कवि खद्योतसम जहँ तहँ करत प्रकास।।“ में मैं जरा भी नहीं अटका। सनद रहे, टेक्स्ट छोड़ने की बात स्वयं के लिए पक्षपात करते हुए नहीं बल्कि इसलिए नहीं स्पष्ट की गयी क्योंकि ऐसा करना आपकी बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा होता।

अपने प्राथमिक विद्यालय के स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए बालिका भाषण रटकर आयी थी, “आदरणीय प्रधानाध्यापक महोदय, शिक्षक वृन्द, आगन्तुक अतिथियों और सहपाठी भाईयों एवं बहनों …” उसने भाषण आरम्भ किया, “अरदाना परदाना… मेच्चा* … फेर से** …” दूसरे प्रयास में भी उसे मेच्चा बोलना पड़ा। उसने फिर कोशिश की; “अरदाना परदानाधापक …” तीसरी बार उसे मेच्चा न बोलना पड़े, इसलिए उसने ‘जय हिन्द जय भारत’ कहकर अपना संक्षिप्त व ओजस्वी भाषण समाप्त कर दिया। लोगों ने बालिका के इस साहसिक प्रयास पर ताली बजाने में कंजूसी कर दी। ‘रटन्त विद्या घटन्त बुद्धि’ पर ही हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली टिकी हुई है। इसलिए इस दृश्य ने लोगों के चेहरे पर मुस्कान तो बिखेरा ही।

हमारे यहाँ लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके थे। राजीव गाँधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हो गयी। वहाँ कांग्रेस का संगठन तब भी गदहे के सिंग जैसा ही था लेकिन चुनाव हाल ही में होने और परिणाम न आने के कारण पार्टी प्रत्याशी के समर्थक सक्रिय थे। उन्होंने शोक सभा का आयोजन किया। एक स्थानीय नेता फुल्ल फॉर्म में आ गये। उन्होंने अपने शोक संदेश में प्रखंड कार्यालय में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा तक उठा दिया। भ्रष्टाचार पर भड़ास के बाद बमुश्किल उन्होने दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हुए अपना भाषण समाप्त किया और लोगों ने राहत की साँस ली। उसी चुनाव की एक चुनावी सभा में भाषण करते उसी पार्टी के एक जिला स्तरीय नेता को पीछे से कुर्ता खींचकर बैठाना पड़ा वरना मंच पर बैठे उनसे बड़े नेता भाषण करने से वंचित रह जाते और लोग टमाटर व अंडों की व्यवस्था करने को बाध्य हो जाते।

इसी वर्ष होली मिलन समारोह चल रहा था। एक आमंत्रित की हैसियत से उस सभा में मैं भी था। वक्ताओं की लंबी सूची थी। उन्होने अपने पराक्रम से कानों को कुछ दिन बाद होने वाले चुनावों के चुनावी भाषण के लिए तैयार कर दिया। किसी भी वक्ता के भाषण में होली का ‘हो’ और मिलन का ‘मि’ दुर्लभ था। सभा के अध्यक्ष बन बैठे सज्जन अमीन सयानी के गुरु जैसी फील ले रहे थे। लोगों को दुखमय जीवन से बचाने के लिए ऐसे लोगों के हाथ जीवन में एक बार से अधिक माइक नहीं दिया जाना चाहिए। समारोह के आयोजक का मुझसे अनुराग था। वह पास आकर धीरे से बोले, “आप भी दो शब्द कहिए।“ तुलसी जयन्ती का वाकया मुझे याद था। इसलिए मैने उन्हें विनम्रता से मना कर दिया लेकिन उन सारे वक्ताओं के लिए मुझे दो शब्द कह देना चाहिए था, “ना मनबs।“

उपरोक्त सारी घटनाएं लेखक के अनुभव पर आधारित हैं। पाठक इन्हें रचित बताकर लेखक का चहेटा न कर दें, इसलिए अंत में एक ऐसी घटना बताना आवश्यक है जो पब्लिक डोमेन में है। एक बाबा प्रवचन दे रहे थे। भक्त गण भक्ति रस में विह्वल हुए जा रहे थे। बाबा ने एंटी क्लाइमेटिक गियर लगा दिया और बोले, “मैं जेल जाऊँ?” भक्त समूह एक स्वर में चिल्लाया, “नहीं।“ बाबा और भक्तों के बीच यह संवाद एक-दो बार दुहराया गया। अंत में बाबा ने जैसे अपना निर्णय ही सुना दिया, “मैं तो जाऊँगा।“ शेष इतिहास है।

*मेच्चा मतलब सॉरी (लगभग)

** फेर से मतलब फिर से अर्थात बालिक अपना भाषण फिर से आरम्भ करना चाहती है।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *